आज मैं सिर्फ़
चरित्र की बात करूँगा।
जानता हूँ कि आज
के ज़माने में चरित्र की बातें करना मुझे शोभा नहीं देता। आज आदमी बड़ा है और उसका
चरित्र छोटा। पहले धोती-लंगोटी वाले बड़े चरित्र वाले छोटे क़द-काठी के लोग हुआ करते
थे। न जाने कहाँ खो
गए वे चरित्र ।
चरित्र की बात
चली है तो क्यों न ख़ुद से ही शुरुआत करूँ। मुझे अपना चरित्र हमेशा संदेहास्पद लगा
है। क्योंकि मुझे चारित्रिक प्रमाण-पत्र देने वालों के चरित्र हमेशा संदेहास्पद
रहे हैं।
हमें प्राथमिक
पाठशाला में ही बता दिया गया था कि चरित्र को ऊपर उठाओ, उसे नीचे मत
गिरने दो। शिक्षकों का चरित्र बहुत ऊँचा था। इतना ऊँचा कि वे स्कूल को मिलने वाला
दूध और दलिया इस ख्याल से बाज़ार में बेच आते थे, ताकि उनका सेवन
कर बच्चों का स्वास्थ्य ख़राब न हो। ऐसे चरित्रवान
शिक्षक छात्रों के चरित्र का पतन बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। वे छात्रों के चरित्र
की रक्षा के लिए छात्रों की ऐसी धुनाई करते थे कि छात्र तो अधमरे हो जाते थे, पर उनके चरित्र
बहुत ऊपर उठ जाते थे। हमारे हेड मास्टर जी ने तो चारित्रिक प्रमाण-पत्र देने के
एवज में कुछ सुविधा-शुल्क भी हमारे पिताजी से रखवा लिया था।
अब आप मेरे
चरित्र की बुनियाद का अंदाज़ ख़ुद ही लगा लीजिये।
मिडिल स्कूल में
आठवीं कक्षा तक आते आते हमारे चरित्र अपने आप ऊपर उठने लगे थे। प्रतिदिन प्रार्थना
के बाद कोई न कोई शिक्षक कुछ उपदेश देते और फिर मैडमों से चुहलबाज़ियों में व्यस्त
हो जाते। छात्रों के चरित्रों को मौका ही नहीं मिल पाता था कि वे नीचे गिरें।
अर्थशास्त्र और
चरित्र में इतना गहरा सम्बन्ध मैंने पहले कभी नहीं देखा था। जो छात्र मास्टरों से
ट्यूशन पढ़ते थे, उनका चरित्र
हमेशा उत्तम आंका जाता था। ट्यूशन न पढ़ पाने की विवशता ओढ़े छात्र चरित्रहीन होने
को बाध्य थे।
प्रधानाध्यापक
बहुत ही अनुशासनप्रिय थे। शैतानी करने वाले छात्रों की पिटाई वे अपने कर-कमलों से
करते थे। और छात्रों को मारने-पीटने एवं शिक्षकों के साथ पोलिटिक्स खेलने से जो
समय बचता, उसे मैडमों के
साथ अपने चरित्र का उर्ध्वगमन कराने में बिताते। वे छात्रों के शुभचिंतक थे और
परीक्षा के समय उनके घर सब्जी-दूध पहुँचाने वाले छात्रों को उत्तर बता दिया करते
थे। जिन छात्रों को उत्तर नहीं बताते थे, वे छात्र बहुत स्वावलंबी हो गए थे। वे अपने
चरित्र के सहारे चुटकों के बल पर नक़ल करना सीख गए थे।
चारित्रिक विकास
का असली मौक़ा मिला हाईस्कूल में। तब तक हमारा चरित्र भी हमारे साथ वयस्क हो चुका
था। प्रिंसिपल साहब का चरित्र इतना ऊँचा था कि वह उनकी पहुँच से भी ऊपर उठ गया था।
गर्ल्स स्कूल की मादा प्रिंसिपल के इर्द-गिर्द हमारे प्रिंसिपल का चरित्र
संभावनाएं तलाशता रहता था।
लगभग सभी
व्याख्याताओं को धनी घरों के बिगडैल लड़कों और छात्राओं से विशेष लगाव था।
गुरु-शिष्य परंपरा अपने चरम पर थी। प्रैक्टिकल की कॉपियां जांचने के लिए शिक्षक
गुरुदक्षिणा तभी स्वीकार करते थे जब वह उनकी घटिया औकात के हिसाब से हो। आठ-दस शिक्षकों को छोड़कर बाक़ी सोमरस को छूते भी नहीं
थे। स्कूल के जो सबसे सीधे-सादे और बुज़ुर्ग शिक्षक थे और जिनकी हम सब बहुत इज्ज़त
करते थे; उनके लिए एक दिन
स्कूल के प्रांगण में दो जवान महिलाएं आपस में हाथापाई करती हुई पाई गयीं।
एकाधिकार का प्रश्न था और दोनों पतिव्रताएं उन बुज़ुर्ग शिक्षक को अपना-अपना पति
साबित कर रही थीं।
एक और सीधे-सौम्य
शिक्षक एक दिन अचानक भाग गए। उन्होंने भी भागने की परंपरा का निर्वाह किया और साथ
में हमारी कक्षा की सबसे सुन्दर छात्रा को भी भगा ले गए। इस घटना पर स्कूल के बाकी
शिक्षकों ने बहुत रोष प्रकट किया, क्यों कि उनमे से कई और भी उस होनहार छात्रा के
साथ भागना चाहते थे। कुछ दिनों बाद भगोड़े शिक्षक छात्रा के साथ विवाह कर लौट आये।
दोनों ने एक दूसरे के साथ मुंह काला किया था, पर छात्रा की मांग में सिन्दूर देखकर सब कुछ
उजला हो गया और चरित्र स्थापित हो गया। सभी ने उस विवाह को मान्यता दे दी, सिवाय उन शिक्षक की प्रथम
पत्नी के।
हमारे चरित्र यदि
उस माहौल में भी ऊपर न उठते तो यह हमारे लिए शर्म की बात होती। अतः हमने अवसर नहीं
गंवाया और ऐसा कुछ किया कि हमारा चरित्र एक (निम्न) स्तर से नीचे गिर ही नहीं सकता
था।
कॉलेज पहुंचे तो
वहां देखा की चारों ओर चरित्र ही चरित्र बिखरा पड़ा है। कुछ व्याख्याता पांच-पंद्रह
का फ़ॉर्मूला इस्तेमाल करते थे ताकि स्टूडेंट्स को पढ़ाने में समय न बर्बाद करना
पड़े। कक्षा मे पांच मिनट पहले जाओ, स्टूडेंट्स वहां नहीं होंगे। पंद्रह मिनट बाद
जाओ तो स्टूडेंट्स यह सोचकर जा चुके होंगे कि शिक्षक नहीं आएंगे। छात्र और शिक्षक
दोनों को यह प्रणाली बहुत माफ़िक आती थी। दोनों वर्ग एक दूसरे से मुंह चुराते थे
ताकि शिक्षा के स्तर पर बट्टा न लगे।
एकमात्र मैडम की
क्लॉस में छात्रों की उपस्थिति शत-प्रतिशत हुआ करती थी, क्योंकि मैडम जी
को पढ़ाने का शऊर नहीं था, जो उनके रूप-लावण्य के आगे क्षम्य था। उनकी कक्षा में बैठकर, उनके सौन्दर्य की
विवेचना में हम सभी स्टूडेंट्स के चरित्र को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ।
कॉलेज के
स्पोर्ट्स के इंचार्ज प्रतिवर्ष खिलाड़ियों के लिए ख़रीदे जाने वाले किट्स में से
कुछ जोड़े खा जाते थे। पुस्तकालय में किताबों को खाने के लिए दीमकों को मेहनत नहीं
करनी पड़ती थी। यह शुभ कार्य पुस्तकालयाध्यक्ष की देख-रेख में पुस्तकालय इंचार्ज के
द्वारा संपन्न होता था। एक प्रगतिशील शिक्षक शहर में छेड़खानी करते हुए पिटकर कॉलेज
की नाक ऊँची कर चुके थे। उन्हें इस पर भी तसल्ली नहीं हुई तो एक बार वे छात्रों से
भी पिटे।
कॉलेज के
प्रिंसिपल बड़े सिद्धांतवादी थे। वे ''पूअर ब्यायज़ फण्ड'' का पैसा भी धनवान
घरों के छात्रों को ही दिलवाते थे। उन्होंने भैंसें भी पाल रखी थीं जो कॉलेज की शस्य-श्यामला
गार्डेन की घास चरा करती थीं। हर हफ़्ते का भैंसों को दुहने के लिए प्रमोशनोन्मुख
व्याख्याताओं का ड्यूटी-चार्ट भी हुआ करता था। एक बार प्रिंसिपल साहब की एक भैंस
मर गई तो कॉलेज में सभी ने दो मिनट का मौन रखा, भैंस को भावभीनी
श्रद्धांजलि दी गई और सार्वजानिक अवकाश की घोषणा की गई।
प्रिंसिपल साहब
के सौजन्य से हम सभी का इतना चारित्रिक विकास हो चुका था कि नौकरी के हर
विज्ञापन में हमारे कॉलेज का उल्लेख हुआ करता था। उस उल्लेख को देखकर हम बहुर
गौरवान्वित होते थे। हर विज्ञापन में लिखा होता था की फलां(हमारे) अभियांत्रिक
महाविद्यालय के विद्वान स्टूडेंट्स आवेदन भेजकर हमें कृतार्थ करने की ज़हमत न
उठायें।
चरित्र के नाना
आयामों से भयाक्रांत जब इस व्यावहारिक संसार में हमारा गृह-प्रवेश हुआ तो हमारे
पास चरित्र के सिवाय कुछ भी नहीं था। जैसे हमारे देश में मध्यमवर्गीय के पास इज्ज़त
के सिवाय कुछ भी नहीं होता है। चरित्र का बोझ और मुफ़लिसी। नौकरी की तलाश में
दर-ब-दर होते हुए हम। भटकनें ही भटकनें। पहली बार मालूम हुआ की जिनके पास चरित्र
होता है वे समाज में बहुत बकलोल समझे जाते हैं। पहली बार ऑस्कर वाइल्ड का कथन समझ
में आया...''सधे हुए
तौर-तरीके नैतिकताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।''
जब भी अपने
चरित्र की टोह लेता हूँ तो बड़ी आत्मग्लानि होती है। मेरा अपना चरित्र तो कभी रहा
ही नहीं। चारित्रिक प्रमाण-पत्र की शक्ल में मेरा चरित्र हमेशा चरित्रहीनों का
मोह्ताज़ रहा है। नतीजा यह हुआ है कि अपने को चरित्रवान समझने का दम भरने वाला मैं
किराये के मकान में रह रहा हूँ, और चरित्र की
झंझट न पालने वाले कई-कई किरायेदार पाल रहे हैं।
इधर देश में हर
तरह के आरक्षण प्रकाश में आ रहे हैं। सोचता हूँ कि एक आन्दोलन चलाया जाय, जिसमे उन
चरित्रवानों की बात की जाय जिन्हें करैक्टर-सर्टिफिकेट देने वाले अव्वल दर्ज़े के
करैक्टर-लेस थे।
अंत में अपनी
व्यथा-कथा बता दूँ कि इतना गिरने के बावज़ूद मेरे चरित्र ने मुझे एक बार धोखा दे ही
दिया। मेरे एक परिचित, जो एक चरित्रवान
जवान बेटी का पिता होने की हैसियत रखते थे, उन्होंने मुझे अपने घर पर
निमंत्रित किया। जब मैं उनके साथ उनके घर जा रहा था, उन्होंने बताया कि उनकी
इकलौती पत्नी मुझसे मिलने को विशेष उत्सुक हैं। वे जानना चाहती हैं कि मेरे जैसे
निकृष्ट जीव का चरित्र भला कैसा होगा?
चरित्र की छानबीन
करने वालों से मुझे हमेशा भय लगता है। मुझे बन्दर और मगर की कहानी याद आ गयी।
मैंने कहा, ''अंकल जी ! चरित्र तो मैं
जामुन के पेड़ पर ही छोड़ आया ! अब आंटी जी को क्या दिखाऊंगा ?''
वे बोले, ''बरखुरदार, तुमने ठीक ही
किया। हमारा घर बहुत छोटा है। उसमे हम मियां-बीबी और बच्ची ही बहुत मुश्किल से रह
पाते हैं। चरित्र के लिए इस घर में जगह ही नहीं है।''
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(व्यंग्य-संग्रह 'लक्ष्मीजी
मृत्युलोक में' से )