Friday, June 17, 2011

छपास और पारिश्रमिक की जुगलबंदी

इस असार संसार में प्रतिभावान मनुष्यों के लिए असंख्य क्षेत्र है.जैसे की डाक्टर बनकर बीमारियों को भुनाया जा सकता है या इंजीनियर बनकर किसी अंतहीन सरकारी परियोजना में बहता पैसा खींचा जा सकता है.यदि मरीजों और देश के सौभाग्य से डाक्टर या इंजिनीयर न बन पाए,तो कम से कम वकील बनकर कानून और संविधान का दोहन तो किया ही जा सकता है.पर यदि इनमे से कोई कुछ भी न बन पाए तो ऐसी विभूतियों के लिए तुलसी दस जी पहले ही कह गए हैं :-''सकल पदारथ हैं जग माहीं,करमहीन नर पावत नाहीं''.

मैं अपने को करमहीन मानकर,अपनी इस काया को धरती का बोझ बनाये हुए निश्चिंत था.मैं अपनी तसल्ली के लिए दास मलूका की ये पंक्तियाँ दिन में एकाध बार गुनगुना लिया करता था :-''अजगर करे न चाकरी,पंछी करें न काम,दास मलूका कह गए,सबके दाता राम!'' पर मैं क्या जानूं कि ''होइहैं वही जो राम रचि राखा!'' इसलिए न जाने किस मनहूस घड़ी में,मेरी इस जन्म-जन्मान्तरों से अतृप्त और अभिशप्त आत्मा में लेखन रूपी महामारी के कीटाणु प्रवेश कर गए.मेरी आत्मा जो है,वह लेखन के कलंक से कलुषित हो गयी.

इस नाचीज़ कि लाइफ में न कोई ट्रेजिडी रही न कामेडी;न कहीं कोई कुंठा या संत्रास और न ही कोई प्यार-व्यार का चक्कर!मेरी सीधी-सादी ज़िंदगी में न कोई घुटन थी न कोई पीड़ा;न कोई सन्नाटा या अकेलापन!यहाँ तक कि किसी लेखक का डोनेट किया हुआ खून भी मेरे इस नश्वर शरीर में कभी नहीं चढ़ाया गया.फिर भी न जाने कैसे लेखन के निष्ठुर और निर्मोही कीटाणु मेरे भीटर घुसपैठ कर गए.

ज्यों-ज्यों इन कीटाणुओं कि हरकतें बढ़ती गयीं,मैं लेखन रूपी बेताल को अपनी आत्मा के कन्धों पर ढोने लगा. मेरे लेखन कि शुरुआत भी श्रृंगार-रस की कविताओं से हुई.अकाद बार ज्यादा श्रृंगार-रस के चक्कर में जब पिटने की नौबत आई,तो मन में विरह-बोध जागा.और विरह-बोध के बाद तो मैं साहित्य के सभी रस-भेद-रूपी बंदरों को सफल मदारी की तरह नचाने लगा.होते-हवाते मेरे भीतर का लेखक साहित्य की उन ऊँचाइयों को छूने लगा,जहाँ कवि की बदजात आत्मा वीर-रस में विरह-गीत और वीभत्स-रस में प्रेम-गीत का सृजन करने लगती है!

मुझे चारो और कविता के मंच ही मंच नज़र आने लगे.किसी मंच पर मैं निराला जी के कान(क्षमा याचना सहित) काट लेता,और किसी मंच पर अपना कविता-पढ़ कर पन्त जी की(क्षमा याचना सहित) नाक कुतर लेता.मेरी औघड़ प्रतिभा को देखकर एक संपादक नामक निकृष्ट जीव मेरे साहित्यिक जीवन में प्रविष्ट होते भये.

उन संपादक का अखबार छोटा था इसलिए सुविधाजनक था.क्योंकि छोटे अख़बारों में संपादन,कम्पोजिंग,प्रूफ-रीडिंग और छपाई से लेकर अखबार बांटने तक का सारा काम एक ही आदमी करता है.ऐसे अखबारों के संपादक बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं.

मेरे विधाता संपादक ने मुझसे कहा,''बरखुरदार,कविता के क्षेत्र में तो तुम अब स्थापित हो ही गए हो,इसलिए कहानियों पर जोर-आजमाइश करो !'' उनकी सलाह मानकर मैं कहानियां लिखने लगा.अब उनका कमाल देखिये कि वे इतनी खूबी से मेरी कहानियों की काट-छांट करते कि बेचारी कहानियां व्यंग्य में बदल जातीं.मुझे हैरान-परेशान देखकर वे मुझसे प्रायः कहते,''बरखुरदार,कहानी-वहानी तुम्हारे वश कि बात नहीं!तुम तो व्यंग्य लिखो,व्यंग्य!तुम्हारे भीतर मैं व्यंग्य-लेखन की जन्मजात प्रतिभा देखता हूँ!दूसरों को गाली देना और हर मामले में अपनी नाक घुसेड़ना ,ये इस देश में सबसे बड़ी प्रतिभाएं हैं!बस,देखते जाओ!हरिशंकर परसाई(क्षमा याचना सहित) के ऊपर उठने के पहले ही मैंने तुम्हे ऊपर न उठा दिया,तो कहना!''

अपनी छपास की तृप्ति होते देख मैं भी व्यंग्य में उसी तरह घुसने लगा जैसे अरहर के खेत में भैंसा घुसता है. धीरे-धीरे यह साबित होने लगा कि मैं सच्चे अर्थों में भारतीय हूँ. क्योंकि दूसरों कि छीछालेदर एवं दह-संस्कार में मुझे आत्मिक सुख मिलने लगा.मेरे संपादक संतुष्ट नज़र आये और बोले,''बहुत खूब,बरखुरदार!तुम तो पूरे शहर में काले मेघों की तरह छाते जा रहे हो! बस,समझ लो कि देश के सारे व्यंग्यकार अब गए तेल लेने!''

मेरा प्रशंसा-लोलुप क्षुद्र मन द्रुत गति से वक्री होकर हवा में उड़ने लगा.पर अपने इस अधम शरीर में स्थित,तीन ताल में निबद्ध,इस आत्मा का मैं क्या करता?यह बेचारी निरंतर दुखी रहने लगी,ठीक उस सास की तरह,जो अपनी बहू को अपनी नाक के नीचे फलता-फूलता हुआ देखकर दुखी रहती है.एक दिन मैंने अपनी आत्मा से प्रश्न किया,''अरी पगली,आत्मा!अपने क्लेश का कारण मुझसे कह तो जरा?भगवद्गीता के अनुसार तो तू नश्वर है.न तो अग्नि तुझे जला सकती है न शस्त्र तुझे छेद सकते हैं.तेरे तो मज़े ही मज़े हैं फिर इस दुःख का प्रयोजन क्या है?''

मेरी आत्मा मुझे धिक्कारते हुए बोली,''तेरे जैसे मूर्ख के शरीर में किराये का मकान लेने के तो दुःख ही अनंत हैं!अरे,नराधम,छपास की तृप्ति से ही तो पेट नहीं भरता न?साथ में पारिश्रमिक का गुड़ भी तो चाहिए!देखता नहीं,वह नरपिशाच संपादक किस तरह से तेरी रचनाओं को भुना रहा है.तू भी उससे पारिश्रमिक मांग,बुद्धू!''

आत्मा की प्रेरणा ले मैं संपादक के पास पहुंचा.मुझे देखते ही वे चहक पड़े,''वाह भाई,वाह!अपने पिछले व्यंग्य में क्या खूब करारी चोट की है तुमने!पूरा पुलिस-महकमा सन्न है!छा गए, बरखुरदार,तुम अब छा गए!साहित्याकाश अब तुम्हारे विचरण के लिए खुला हुआ है!''

मेरी आत्मा ने नेपथ्य से मेरा हौसला बढ़ाया कि मूर्ख,इसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में मत आ!अपना पारिश्रमिक मांग,पारिश्रमिक!अपने फेफड़ों में मैंने हवा भरकर कहा,''संपादक महोदय,मेरी छपास पर बड़ी तेजी से पारिश्रमिक हावी हो रहा है!मेरी आत्मा चाहती है कि मुझे पारिश्रमिक भी मिले!और चूँकि धन मिलने का मामला है,इसलिए अपनी आत्मा की बात न मानना मुझे शोभा नहीं देता!''

संपादक ने तुरंत रंग बदला,''यार,तुम्हारे घर पर अख़बार की मुफ्त प्रति भिजवा तो रहे हैं!वैसे भी इधर तुमने पुलिस-महकमे पर ज्यादा व्यंग्य लिखे हैं,जिससे शहर की पुलिस तेज़ी से इमानदार हो रही है.इसकी वज़ह से शहर में चोरी और राहजनी की घटनाएं कम होने लगी हैं!तुम समझते क्यों नहीं की इससे हमारी न्यूज़-आइटमें घटने लगी हैं!''

विना विचलित हुए मैंने कहा,''महोदय,यदि मेरा व्यक्तिगत मामला होता,तो कोई और बात थी!पर सवाल मेरी आत्मा का है!मैं उसके मामले में दखल नहीं दे सकता!पारिश्रमिक तो मुझे जरुर चाहिए,चाहे आप रोकर दें या गाकर!समझे?''

संपादक व्यंग्य से मुस्कराए,''ठीक है,बंधू!जब पारिश्रमिक के बदले तुम अपनी आत्मा को गिरवी रखना ही चाहते हो,तो मैं क्या करूँ?पर एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा,बरखुरदार!तुम्हारे व्यंग्य क़ाबिले-तारीफ़ तो हो गए हैं,पर क़ाबिले-पारिश्रमिक नहीं हुए हैं अभी!इसलिए अपने व्यंग्यों में ज़रा और पैनापन लाओ!ज़रा और नुकीला बनाओ अपने व्यंग्यों को!समझे,बरखुरदार?''

मैं कुछ दिनों तक पशोपेश में रहा.ऐसा क्या करूँ की व्यंग्यों में अतिरिक्त नुकीलापन आए?मैंने अपनी दुविधा आत्मा को बताई,तो आत्मा बोली,''अरे,उल्लू के चरखे,वह संपादक तुझे उल्लू बना रहा है!रे खल-कामी,इतना तो समझ कि इस देश के भेजों में नुकीली सुई चुभाना व्यर्थ है!इन भेजों के लिए तो वज़नदार हथौड़े चाहिए!फिर भी तू कोशिश कर के देख!निखालिस गालियां लिख,गालियां!अपने देश की देशी और स्थापित गालियां!जितनी पैनी गालियां,उतना ही व्यंग्य में पैनापन!''

मैं फिर आत्मा की बात मान हर भाषा और हर तहजीव की गालियां अपने व्यंग्यों में फिट करने लगा.अगली बार मिलते ही संपादक ने गले लगा लिया,''तुमने तो कमाल कर दिया,यार!क्या खींचा है सभी को!यत्र-तत्र-सर्वत्र सभी क्षत-विक्षत होकर तिलमिला रहे हैं!अब तो तुम सुपर व्यंग्यकार हो गए,बरखुरदार!''

मैंने धीरे से पूछा,''तो क्या अब मेरे व्यंग्य क़ाबिले-पारिश्रमिक हो गए हैं?'संपादक जी का जैसे अचानक फ्यूज उड़ गया.वे बोले,''बरखुरदार,तुम्हारी इतनी तारीफ़ें,इतना नाम,फिर भी तुम पारिश्रमिक जैसी तुच्छ चीज़ के पीछे पड़े हो!अरे अभी तो राजनीतिक पुट आया ही नहीं तुम्हारे व्यंग्यों में!बिना इसके भी कोई व्यंग्यकार कभी पूर्ण माना जा सकता है भला!इसलिए जाओ और अपने व्यंग्यों को थोडा पालिटिकल बनाओ!''

मैं परेशान होकर फिर आत्मा की शरण में गया.आत्मा ने समझाया,''घबरा मत,निशाचर!पहले जमकर सत्ता-पक्ष के खिलाफ लिख!वे मारने-पीटने आयें,तो उनसे कुछ ले-देकर विपक्ष को भ्रष्टाचारी साबित कर! यही तो इस देश में राजनीतिक व्यंग्य कहलाता है,पगले!''

मैं एकबार फिर अपनी कलम लेकर सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पिल पड़ा.कमीशन के हिसाब से मैं दोनों पक्षों के बीच पेंडुलम बन गया.संपादक इस बार मिलते ही सीधे मेरे पैरों पर गिरकर बोले,''बरखुरदार,तुम तो गुरु निकले!मुझे अपने चरणों की रज ले ही लेने दो!अब,तो बस समझ लो कि स्थापित हो गए तुम!''

मेरी आत्मा ने मुझे उत्साहित किया,''अबे लपड़बोंग,तू पारिश्रमिक मांग!संपादक कि चापलूसी को भाड़ में जाने दे!''मैंने संपादक की धूर्त आँखों में ऑंखें डालकर कहा,''तो अब तो पारिश्रमिक मिलेगा न मुझे?''

संपादक तिलमिला गए,''इतना बड़ा संपादक तुम्हारे पैरों की धूल अपने माथे से लगा रहा है!इससे बड़ा पारिश्रमिक और तुम्हे क्या चाहिए,बरखुरदार?''

मेरी आत्मा ने मुझे ललकारा,''बेटा,आज तू सारे लाज के बंधन तोड़ दे और इस संपादक के हलक़ से पारिश्रमिक उगलवा ले!आज अपना सारा दब्बूपन,सारे संस्कार,सारी सभ्यता और सारा आक्रोश अपने भीतर से निकालकर पटक दे इस संपादक पर!''मैं अपने व्यंग्यों से भी ज्यादा नुकीला बनकर चीख़ा,''संपादक के बच्चे,मुझे पारिश्रमिक चाहिए,समझे?वर्ना अपने व्यंग्यों का पैनापन आज तेरे भीतर घुसेड़ न दिया,तो कहना!''

संपादक आहिस्ता से उठे.फिर उन्होंने अपने माथे पर लगी मेरी चरण-रज को झाडा.फिर इत्मीनान से बोले,''बरखुरदार,यदि पारिश्रमिक ही देना होता,तो इस शहर में क्या तुम्ही एक लेखक हो?एक से बढ़कर एक लेखक मेरे अखबार में लिखने के लिए तरस रहे हैं! तुम्हारे घटिया व्यंग्यों ने तो मेरे अख़बार का स्तर ही चौपट कर दिया है!हुंह!ऊपर से पारिश्रमिक भी दूँ,है न?अरे,तुम्हारे जैसे लोभी लेखकों ने ही साहित्य को बदनाम कर राखा है!"

मुझे हतप्रभ छोड़ संपादक चले गए.मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा और गुनगुनाता रहा :''वो देखो मुझसे रूठकर,मेरा पारिश्रमिक जा रहा है!''

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Sunday, June 12, 2011

तलाश एक अदद वल्दियत की

वर्षा-ऋतु की भीनी भीनी फुहारों का आनंद लेने वाले भारतमाता की सभी वल्दियतविहीन संतानों को मेरा शत शत नमन.प्यारे भारतवासियो,तुम क्या जानो की यह बात कहते हुए मैं कितनी पीड़ा और दीनभावना से भरा
हुआ हूँ. कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है. यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता.पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है.इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है.

कहानी यह है की मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!).वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन सेपागलहै.पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है.मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज्यदा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!).कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला-''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''

पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला-''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है?मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है?हम सब भारतवासियों का बाप कौन है?जल्दी बताओ?बोलते क्यों नहीं?'' मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया,पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है.हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं की हम सब भारतमाता की संतानें हैं.जब माता है तो बाप भी होना ही चाहिए.पर बाप आखिर है कहाँ?चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया.उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की.हो सकता है,उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही,बापू कि संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!

अब समझ में आया न भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है.अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी कि वल्दियत को?सभी मुझे बिना बाप की संतानें नज़र
आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं.मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा.मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज्यदा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है.

यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है.पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे,इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है.सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह अनुसूचित बन जाता था.शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे.इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा.मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था.मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला-''यार,कुछ भी कहो,इन अंग्रेजों को रहने का सलीका आता था! देखो न,कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह!और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है.व्हाट अ डर्टी पीपल,यार!''

उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया.इसे अंग्रेजों के बनवाए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं.ऐसा लगना स्वाभाविक भी है,क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा
है.अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है.मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी-''यार,डाक्टर,तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी.पर अभी मुझे बाकि लोगों की वल्दियत तलाश करनी है,इसलिए चलूँ.''

अपने एक चिड़ीमार एक दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा-''ददुआ,तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है!तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है!अरे,आज के ज़माने में अपनी सोच,अपनी!जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़,समझा?इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद बाप ढूंढ़ रखा है.और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है.तू भी बाप तलाश कर बहती गंगा में हाथ धो.''

मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया-''निकल बे,क्या है तेरे पास?जल्दी कर!''मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा-''भाई,मुझे माफ़ करना.तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.अभी तो मेरा एक अदद बाप भी तैयार नहीं हुआ है.मैं बहुत ही निर्धन हूँ,मेरे दोस्त.पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा,तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है.है न?''

मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला-''अरे! राम! राम!! बाप का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है.अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ.तू भी उन्ही कि शरण में चला जा.जो जाकी सरनन गहे,ताहि ताहि कि लाज!'' मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया-''साहिबजी,मैं आपको अपना बाप बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ.कई दुखी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन कि बंसी बजा रहे हैं.मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये?''

वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले-''ठीक है,ठीक है!ज्यादा पट-पट करने का नईं,क्या?पहले बता,तुझे चोरी-वोरी,लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस,कोई पुराना रिकार्ड?''मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला-''सब कुछ सीख लूँगा,माई-बाप!बस,आपका आशीर्वाद चाहिए!सर पर किसी बाप का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है,सर जी!''

उद्दंड सिंह जी बोले-''क्यों बे,हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या?हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते.क्या समझा?तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय गृहमंत्री के पास चला जा.वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं.शायद वे तुझे शरण दे दें.''

मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा.वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे.एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति कि-''माननीय,आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं!सच्चा,सस्ता और टिकाऊ बाप बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं.अस्तु आप स्वयं को मेरा बाप घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें,आर्य?नहीं तो मेरा जीवन,बस समझिये कि गया तेल लेने.''

जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले-''वत्स,यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है.विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है!माननीय मुख्यमंत्री जी बहुत नाराज़ हैं.वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे,तो कैबरे कहाँ देखेंगे.अब तुम्ही कहो,वत्स,जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो,वह तुम्हारा पूजनीय बाप कैसे बन सकता है?''मैंने पूछा-''तो आप कुछ तो रह सुझाइए?कहें तो मैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पास चला जाऊं?''

वे गंभीर होकर बोले-''नहीं वत्स,वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है.तात,इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे,'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया.पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं.सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं.सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं.इसलिए तू भी यहीं कहीं कोई लोकल बाप तलाश ले.ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती,वत्स!''

जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया-''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना बाप तलाशते फिर रहे हो?बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह!और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं?याद रक्खो,यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना बाप नहीं बनाया,तो हम तुम्हे
ऐसा बना देंगे कि तुम बाप रखने लायक ही न रहो!''

भय के मरे मैं विपक्ष कि शरण में जाने कि सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और धमका गए-''बरखुरदार,हम तुम पर बराबर नज़र रखे हुए हैं!यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए,तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''

तो इस तरह,हे मेरे प्यारे देशवासियो,मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ.इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती.सभी के अपने अपने बाप हैं;अपनी अपनी बपौती है.कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता.बुरा हो उस साले पागल दोस्त का,जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया.

अभी हल ही में फिर मिला था वह पागल दोस्त.मुझे देखते ही चहककर बोला-''वाह भाई वाह,खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का बाप?आखिर नहीं मिला न?हुंह!चला था बाप खोजने!अपने को बहुत होशियार समझता है,है न?अरे,मैं तो सालों से एक अदद बाप की आस लगाये बैठा हूँ!जब मुझे अभी तक नहीं मिला,तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी बाप,बोल?अब बोल,असली पागल कौन,तू कि मैं?''

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)