Sunday, June 12, 2011

तलाश एक अदद वल्दियत की

वर्षा-ऋतु की भीनी भीनी फुहारों का आनंद लेने वाले भारतमाता की सभी वल्दियतविहीन संतानों को मेरा शत शत नमन.प्यारे भारतवासियो,तुम क्या जानो की यह बात कहते हुए मैं कितनी पीड़ा और दीनभावना से भरा
हुआ हूँ. कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है. यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता.पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है.इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है.

कहानी यह है की मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!).वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन सेपागलहै.पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है.मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज्यदा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!).कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला-''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''

पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला-''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है?मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है?हम सब भारतवासियों का बाप कौन है?जल्दी बताओ?बोलते क्यों नहीं?'' मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया,पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है.हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं की हम सब भारतमाता की संतानें हैं.जब माता है तो बाप भी होना ही चाहिए.पर बाप आखिर है कहाँ?चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया.उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की.हो सकता है,उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही,बापू कि संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!

अब समझ में आया न भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है.अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी कि वल्दियत को?सभी मुझे बिना बाप की संतानें नज़र
आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं.मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा.मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज्यदा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है.

यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है.पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे,इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है.सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह अनुसूचित बन जाता था.शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे.इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा.मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था.मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला-''यार,कुछ भी कहो,इन अंग्रेजों को रहने का सलीका आता था! देखो न,कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह!और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है.व्हाट अ डर्टी पीपल,यार!''

उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया.इसे अंग्रेजों के बनवाए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं.ऐसा लगना स्वाभाविक भी है,क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा
है.अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है.मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी-''यार,डाक्टर,तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी.पर अभी मुझे बाकि लोगों की वल्दियत तलाश करनी है,इसलिए चलूँ.''

अपने एक चिड़ीमार एक दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा-''ददुआ,तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है!तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है!अरे,आज के ज़माने में अपनी सोच,अपनी!जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़,समझा?इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद बाप ढूंढ़ रखा है.और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है.तू भी बाप तलाश कर बहती गंगा में हाथ धो.''

मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया-''निकल बे,क्या है तेरे पास?जल्दी कर!''मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा-''भाई,मुझे माफ़ करना.तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.अभी तो मेरा एक अदद बाप भी तैयार नहीं हुआ है.मैं बहुत ही निर्धन हूँ,मेरे दोस्त.पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा,तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है.है न?''

मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला-''अरे! राम! राम!! बाप का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है.अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ.तू भी उन्ही कि शरण में चला जा.जो जाकी सरनन गहे,ताहि ताहि कि लाज!'' मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया-''साहिबजी,मैं आपको अपना बाप बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ.कई दुखी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन कि बंसी बजा रहे हैं.मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये?''

वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले-''ठीक है,ठीक है!ज्यादा पट-पट करने का नईं,क्या?पहले बता,तुझे चोरी-वोरी,लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस,कोई पुराना रिकार्ड?''मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला-''सब कुछ सीख लूँगा,माई-बाप!बस,आपका आशीर्वाद चाहिए!सर पर किसी बाप का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है,सर जी!''

उद्दंड सिंह जी बोले-''क्यों बे,हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या?हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते.क्या समझा?तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय गृहमंत्री के पास चला जा.वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं.शायद वे तुझे शरण दे दें.''

मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा.वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे.एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति कि-''माननीय,आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं!सच्चा,सस्ता और टिकाऊ बाप बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं.अस्तु आप स्वयं को मेरा बाप घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें,आर्य?नहीं तो मेरा जीवन,बस समझिये कि गया तेल लेने.''

जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले-''वत्स,यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है.विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है!माननीय मुख्यमंत्री जी बहुत नाराज़ हैं.वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे,तो कैबरे कहाँ देखेंगे.अब तुम्ही कहो,वत्स,जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो,वह तुम्हारा पूजनीय बाप कैसे बन सकता है?''मैंने पूछा-''तो आप कुछ तो रह सुझाइए?कहें तो मैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पास चला जाऊं?''

वे गंभीर होकर बोले-''नहीं वत्स,वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है.तात,इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे,'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया.पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं.सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं.सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं.इसलिए तू भी यहीं कहीं कोई लोकल बाप तलाश ले.ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती,वत्स!''

जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया-''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना बाप तलाशते फिर रहे हो?बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह!और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं?याद रक्खो,यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना बाप नहीं बनाया,तो हम तुम्हे
ऐसा बना देंगे कि तुम बाप रखने लायक ही न रहो!''

भय के मरे मैं विपक्ष कि शरण में जाने कि सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और धमका गए-''बरखुरदार,हम तुम पर बराबर नज़र रखे हुए हैं!यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए,तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''

तो इस तरह,हे मेरे प्यारे देशवासियो,मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ.इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती.सभी के अपने अपने बाप हैं;अपनी अपनी बपौती है.कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता.बुरा हो उस साले पागल दोस्त का,जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया.

अभी हल ही में फिर मिला था वह पागल दोस्त.मुझे देखते ही चहककर बोला-''वाह भाई वाह,खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का बाप?आखिर नहीं मिला न?हुंह!चला था बाप खोजने!अपने को बहुत होशियार समझता है,है न?अरे,मैं तो सालों से एक अदद बाप की आस लगाये बैठा हूँ!जब मुझे अभी तक नहीं मिला,तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी बाप,बोल?अब बोल,असली पागल कौन,तू कि मैं?''

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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