मौसमों के पंछी निरंतर उड़ते रहते हैं और समय बीतता रहता है.कुछ मौसम बेहद शालीन होते हैं जो इत्मीनान से हमारे ऊपर से गुजर जाते हैं.पर यह जो नासपीटा वसंत है,यह हमारे ऊपर से इतना धीरे-धीरे गुजरता है,जैसे पंद्रह टन का बोझ लादे कोई ट्रक गुज़र रहा हो हमारे ऊपर से.
तन-मन में एक अजीब-सी टीस जगाता हुआ आता है वसंत.वासंती बयार जब अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाती है,तो समूचा वातावरण इस क़दर रोमांटिक हो उठता है कि यदि शुद्ध साहित्यिक भाषा में कहा जाये,तो अपने-अपने हिस्से कि गधी भी परी नज़र आने लगती है.भाईयो,यह अतिशयोक्ति नहीं है.गधी में परी कि संभावनाएं खोजना एक अनूठे किस्म का सौंदर्य-बोध है.वसंत ही इस सौंदर्य-बोध का विटामिन है.
सचमुच की परियां तो परी-कथाओं में ही होती हैं.चंद्रमुखी और मृगलोचनी भी केशवदास जी के ज़माने में हुआ करती थीं जो उन्हें 'बाबा' कहकर चिढ़ाया करती थीं.आधुनिक काल में परियों की दो ही प्रजातियाँ बच रही हैं : मां-रूपा परी और बेटी-रूपा परी.हमारे भीतर प्रवेश कर वसंत हमें आवारा किस्म के छैला का रूप दे देता है,और हम इन परियों का पीछा करने लगते हैं.मज़े ले-लेकर ये परियां आपस में चुहल करती हैं और एक दुसरे से कहती हैं,"जानती है,संध्या डीयर,आजकल वसंत चौबीसों घंटे मेरे पीछे पड़ा रहता है ! सच्ची यार,बड़ा ही क्यूट है ! और परसों तो मैंने उसे डांट ही दिया कि क्यों गधों कि तरह मेरे पीछे पड़े रहते हो !''
हो गया न सारा सौंदर्य-बोध चौपट ! जब इन परियों को हम गधे नज़र आते हैं तो हम तो गए काम से.हम सहनशीलता ओढ़े गधी को परी समझ रहे हैं और परियां इस क़दर अहसान-फ़रामोश कि वे हमें गधे की श्रेणी में रख रही हैं.खैर,सौंदर्य-बोध की यह सुविधा सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो बंधनों की बंदिशों से मुक्त हैं.शादी के बाद जब पत्नी-बोध होता है तो सारा सौंदर्य-बोध भाग खड़ा होता है.और इस खुशनुमा,मनभावन एवं चिरप्रतीक्षित वसंत में बस एक ही बोध बच रहता है : इन्कम-टैक्स रूपी सुरसा के मुंह का फैलता आकार,सभी कुछ निगल जाने को बेताब !
काली और घनी बदलियों के बीच से धीरे-धीरे निकलता हुआ भरा-पूरा चाँद कितना सुखदायक लगता है.पर वसंत के क्षितिज पर धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ इन्कम-टैक्स का गंजा चाँद ज्यों-ज्यों बढ़ता है;यह विषपायी मन डूबने लगता है.अपने आंचल में इन्कम-टैक्स की पीड़ा छिपाए रहता है यह वसंत.ऐसे में गुलमोहर और अमलतास भी मुसीबतों के दरख़्त बन जाते हैं जो दर्द के फूल लुटाने लगते हैं.
लगभग परंपरा ही बन गयी है कि मार्च का हरजाई महीना;मधुर छंदों से पूर्ण मनोहारी वसंत के बाद ही आता है.और दरख्तों से पत्ते धीरे-धीरे झड़ना शुरू हो जाते हैं.कवि-ह्रदय पति,पत्नी से कहता है,"सुप्रिये,वसंत अपनी अंगनाई में चहलकदमी कर रहा है ! मेरा फागुन मन तुम्हे देखकर बौराने लगा है,क्योंकि तुम्हारा महुआ-तन वनकन्या का श्रृंगार ओढ़े हुए है.पर बच्चों कि पढ़ाई सर पर है.परीक्षा-फीस के मेंढक टर्राने लगे है.और वह देखो,आंगन के नीम कि कुछ पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं !''
देश में शिक्षा का स्तर इतना उर्ध्व-गमन कर चुका है कि साल भर में इतने दिन कक्षाएं नहीं लगतीं,जितनी बार फ़ीस देनी पड़ती है.शिक्षण-संस्थाओं का स्तर सुधर रहा है,मास्टर-मास्टरनियां अपनी हैसियत सुधार रही हैं.छात्र-छात्राएं ज्ञान में कम,परीक्षा पास करने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं.
बच्चों कि फ़ीस से फारिग होकर पति का कवि-मन कहता है,''हे प्राण-सुधे,हमारा सपना कि इस निर्मोही शहर में 'एक बंगला बने न्यारा' अब साकार हो गया है.अपने इस नीड़ में हम तोता-मैना कि तरह खुश हैं.अपना घर खरीदकर हमने मकान-मालिकों के नखरों को दुलत्ती मार दी है.पर नगर-निगम कि मांदों से चीते निकालने ही वाले हैं,ताकि हाउस-टैक्स के नाखूनों से हमें क्षत-विक्षत कर सकें ! सारा वसंत ही लहू-लुहान होने वाला है,प्रिये !''
'होम,माय स्वीट होम !' मुहावरा विदेशों से आयात किया हुआ लगता है.यहाँ तो टैक्स भरने के बाद मन सोचता है कि काश ! यह मुआ मकान अपना न होता ! करें क्या,वसंत को तो धीरे-धीरे पतझड़ के हाथों रेहन होना ही है.
कुछ निश्चिन्त होकर पति की कोमल आत्मा कहती है,''हे रस-माधुरी,घर में रोशनी का जश्न देखता हूँ,तो तुम्हारी झील-सी गहरी आँखों में एक साथ कई-कई दीपक जल उठते हैं.पर शहर के रोशनी के ठेकेदार नींद से जागने ही वाले हैं.कहीं ऐसा न हो कि बिजली के बिलों में घुसे हुए चूहे हमारा कनेक्शन काट दें !''
इस मौसम में यदि किसी को फांसी का सम्मन मिल जाये तो वह जरा भी नहीं घबराएगा.पर बिजली का बिल देखकर आत्मा चीख़ उठती है.रोशनी का भर ढोता हुआ हर व्यथित मन वसंत कि जगह पतझड़ का बोझ ढोने लगता है अपने कन्धों पर.
अभी भी पेड़ों पर कुछ पत्तियां शेष हैं.पति अपनी पत्नी को पुचकारता है,''हे सहभागिनी,माना कि सारा साल तूने पास के हैण्ड-पम्प से बाल्टियाँ भर-भर कर तीसरी मंजिल तक चढ़ाया है,और तुझे भीगी साड़ी में देखकर मेरा चंचल मन कई-कई बार झरने-झरने हुआ है.पर कारपोरशन का पानी का बिल तो अछे-अच्छों को पानी पिला देता है.वह देखो,अब नीम के पेड़ पर कुछ ही पत्तियां रह गयी हैं.यदि पानी का बिल नहीं दिया,तो हे प्राणबल्लभे,बरसात में हम नल से गन्दगी,कीचड और केंचुओं का आनंद कैसे लेंगे ?''
सिसीफस कि तरह जब किसी तरह हम पत्थर को पहाड़ के ऊपर तक ले जाते हैं,तभी रास्ता रोक लेता है इनकम-टैक्स का तिलिस्म.जितनी आय है उससे कही ज्यादा व्यय.पर गनीमत है कि आय पर ही टैक्स लगता है.व्यय पर तो मंहगाई का टैक्स है ही ! इनकम-टैक्स के बाद सिसीफस के हाथों से फिसलकर पत्थर फिर लुढ़ककर नीचे आ जाता है.वसंत धराशायी हो जाता है और पतझड़ की बेटियां एकदम जवान नज़र आने लगती हैं.
आकंठ परिस्थितियों में डूबा पति-मन उद्गार प्रकट करता है,"हे सौंदर्य-विहीने,देखो अब नीम की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं.मैं भी अब नंगे ठूंठ की तरह दिखने लगा हूँ.अहा ! पलाश-वन अब दहकने लगे हैं !काश,हमारे वसंत में आग लगाने वाले खलनायकों का मुंह भी किंशुक-कुसुम की तरह झुलस जाता तो कितना अच्छा होता !''
प्रसाशन सजग है.ऐसे नाजुक समय में मुग़ल-गार्डेन खोल दिया जाता है ताकि जले पर नमक छिड़का जा सके.जनता की छाती पर जितने तरह के टैक्स,उससे भी ज्यादा किस्मों के दिलफरेब रंग-बिरंगे फूल.सर पर मंडराते कर्जों की याद दिलाते हरजाई फव्वारे.किसी विधवा का श्रृंगार भी क्या इतना ख़ूबसूरत होता होगा?
इसलिए,माय डीयर वसंत,अब न तेरा आना अच्छा लगता है न तेरा जाना.तुझे बुरा मानना है तो मान ले.पद्माकर महाशय को हर तरफ वसंत-ऋतु में हरियाली दिखलाई पड़ती थी.यदि उन्हें इनकम-टैक्स देना पड़ता न,तो उन्हें मालूम पड़ता की यह 'बनन और बागन में' बसंत नहीं बगरो है बल्कि चहुँओर पतझड़ ही पतझड़ पसरो है !
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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