Thursday, May 26, 2011

एक शाट-सर्किट हमारे दफ्तर में भी...

हाल के वर्षों में अपने देश में शाट-सर्किट बड़ी तेज़ी से सक्रिय हुआ है.इसकी वज़ह से बहुमंजिली इमारतों में आग लग जाया करती है.आग भी उसी इमारत में लगती है जहाँ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ रखे होते हैं.आग लगने के बाद जब सब कुछ जलकर राख हो जाता है तब अग्नि-शमन दल मौका-ए-वारदात पर पहुंचकर बड़ी खूबी से आग पर काबू पा लेता है.इसके बाद बाकायदा आग लगने के कारणों की जाँच होती है, जिसमे हर बार बेचारा शाट-सर्किट गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

अब कुछ मूढ़ और शक्की किस्म के लोग तो हमारे समाज में होते ही हैं,जो इस शाट-सर्किट वाली थ्योरी को पचा नहीं पाते.ऐसे लोग कब्ज़ से पीड़ित होते हैं और ठीक से अपना खाना भी नहीं पचा पाते.ये लोग हो-हल्ला मचाते हैं कि दाल में कुछ काला है;आग जानबूझकर लगायी गयी है ताकि घपले वाले रिकॉर्ड नष्ट किये जा सकें.पर कहीं कोई भी प्रमाण नहीं मिलते और अंततः शाट-सर्किट ही दोषी पाया जाता है.ऐसे मूढ़ लोगों के लिए प्रस्तुत है हमारे दफ़्तर की शाट-सर्किट कथा ताकि इन्हें शाट-सर्किट की करतूतों पर भरोसा हो जाये:

"जो गर्व और ख़ुशी 'हार की जीत' वाले बाबा भारती को अपना ऊँचा-पूरा घोड़ा देखकर होती रही होगी,कुछ वैसी ही ख़ुशी छलकने लगती थी हमारे टकले और कुम्भकर्णी सूरत वाले बॉस के मुखमंडल पर जब वे अपनी व्यक्तिगत सहायक मिस चंद्रमुखी को देख लेते थे.बाबा भारती प्यार से अपने घोड़े की पीठ थपथपा सकते थे;स्नेह से उसे पुचकार सकते थे और सुबह-शाम उसकी सवारी कर सकते थे.दुर्भाग्य से बॉस को मिस चंद्रमुखी के मामले में ऐसी सुविधाएँ नहीं थीं जिससे उनके भीतर हीनता की भावना उत्पन्न होती थी.उस हीनता से बचने के लिए बॉस द्रौपदी के चीर जैसे लम्बे लम्बे डिक्टेशन देते थे ताकि मिस चंद्रमुखी का अधिकाधिक सानिद्ध्य पाया जा सके.

बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच भावनाओं और विचारों का तारतम्य अभी ठीक से जम नहीं पाया था,इसलिए दोनों ध्रुवों के बीच सर्किट पूरा नहीं हो पा रहा था.परिणामस्वरूप करेंट जो था वह दोनों के बीच बह नहीं पा रहा था.उधर बॉस प्रयास कर रहे थे कि वे अपने पूरे हार्सपावर को वोल्टेज में बदल लें.इसके लिए वे अपने मातहतों को इतनी जोर से डाँटते थे कि मातहतों के द्वारा मूत्रालय का ज्यादा से ज्यादा उपयोग होने लगा था.बॉस का वोल्टेज बढ़ रहा था और लोग अटकलें लगा रहे थे कि जल्दी ही बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच विद्युत्-धारा प्रवाहित होने लगेगी.पर दो प्राणी रूपी ध्रुवों के बीच क्या यह इतना आसान है!इतिहास बताता है कि जब भी पुरुष और नारी के बीच सर्किट पूरा होने लगता है,कोई न कोई बीच में घुसकर उत्पात मचने लगता है.

प्रेमी और प्रेमिका के बीच जुड़े हुए तार पर प्रेमी का बाप कैंची चला देता है.बेटे-बहू के बीच पनपने वाले सर्किट का फ्यूज पत्नी की सास पूरी जिम्मेदारी से उड़ा देती है.इतिहास गवाह है कि हीर-राँझा,शीरी-फ़रहाद,ससी-पुन्नो,सोनी-महिवाल इत्यादि किसी भी जोड़े का सर्किट कभी पूरा नहीं हो पाया.हमारे दफ़्तर में भी इतिहास अपने आप को दुहराने लगा.बॉस का मुंह लगा चपरासी था बाबू लाल जिसे अभिजात्य का टच देने के लिए प्यून कहा जाता था.एक दो बार उसे बिजली का झटका लग चुका था,इसलिए उसे वोल्टेज और करेंट से बहुत डर लगता था.जब उसे पता चला कि बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच करेंट बहने ही वाला है तो वह सर्किट को शाट करने के लिए तैयार हो गया.

एक दिन वह सभी के सामने मिस चंद्रमुखी से बोला,''चद्रमुखी बाई जी,इत्ते लम्बे-लम्बे डिटेक्शन न लिया करो.सच्ची,इतना न थकाया करो अपनी काया को.!''मिस चंद्रमुखी हंसकर बोली,"अरे बुद्धू,'डिटेक्शन' नहीं,इसे 'डिक्टेशन' कहते हैं.पर तू क्यों परेशान होता है?तू तो बस बीड़ियाँ फूंक और मस्त रह."

बाबू लाल ने सभी को सुनाकर कहा,"हम क्यों परेशान होंगे,मैडम जी.हमको क्या करना है.अब तो जो कुछ करेगा,बॉस ही करेगा." सभी हंस पड़े तो मिस चंद्रमुखी को बुरा लगा.एक पिद्दी से चपरासी की इतनी मजाल!उसके भीतर का वोल्टेज सुगबुगाया और बाबू लाल का कटाक्ष मीडियम-वेव पर बॉस के कानों तक पंहुच गया.बॉस ने बाबू लाल को अपने केबिन में बुलाकर हडकाया.बॉस के केबिन से गुस्से में भरा हुआ बाबू लाल निकला और तीर की तरह मिस चंद्रमुखी के पास पहुंचकर बोला,"जे अच्छा नहीं किया तुमने,मैडम!इस लफंगे बॉस से तुमने मुझे डांट खिलवायी?तुम समझती क्या हो मुझे?हम भी चपरासी हैं,चपरासी! कौनो अफ़सर नहीं हैं जो तुम्हरे बॉस से डरें!" इसके बाद बॉस और चंद्रमुखी के बीच फिर रेडियो-लिंक स्थापित हुआ और अगले ही दिन बाबू लाल के नाम 'कारण बताओ नोटिस' जरी हो गया.

बाबूलाल फिर मिस चंद्रमुखी से मुखातिब होकर बोला,"मेरा सम्मन निकलवा दिया न उस उल्लू के पट्ठे से!हो गयी तुम्हारी तसल्ली?अब देखो तुम दोनों की मैं कैसे तुम दोनों की तसल्ली करता हूँ.ऐसा कारण बताऊंगा की वह तकला भी याद रखेगा और तुम भी!" बाबू लाल का लिखित जवाब पा कर बॉस बौखलाया.उसका नाम सीधे-सीधे मिस चंद्रमुखी से जोड़ा गया था.बॉस ने भी पैंतरा बदला.उसने मिस चंद्रमुखी से बयान ले लिया कि बाबू लाल ने उस(मिस चंद्रमुखी) के साथ बदतमीजी की.इसी आधार पर बॉस ने बाबू लाल को चार्ज-शीट दे दी.

बाबू लाल ने फिर प्रेमपूर्वक मिस चंद्रमुखी को फटकारा,"बड़ा ऊँचा खेल खेल रही हो,मैडम!डिटेक्शन के बहने जब वह बुड्ढा दिनभर तुम्हे अपने केबिन में छेड़ता रहता है,तब तो तुमने कभी उसके खिलाफ लिखकर नहीं दिया?और मुझ जैसे इज्जतदार को मुफ्त में फंसवा रही हो?छेड़-छाड़ का असली मज़ा तो तुम अब लोगी,मैडम!मैं अब बदनाम तो हो ही गया हूँ!'' इस बार बाबू लाल की तरफ से कर्मचारी यूनियन ने जवाब दिया.प्रबंधन पर बाबू लाल को परेशान करने के आरोप लगाये गए.बॉस पर आरोप लगा की वह जब-तब मातहतों को गन्दी-गन्दी गलियां देता है.और बाबू लाल से वह दारू मंगवाता है.इमानदार बाबू लाल जब न कहता है तो बॉस उसे तंग करता है.

बॉस भी हार मानने वाला नहीं था.उसने फिर चंद्रमुखी से लिखित में लिया की बाबू लाल चंद्रमुखी को अब खुले आम आंख मारता है और अश्लील हरकतें करता है.इतना ही नहीं,बल्कि उसने चंद्रमुखी को देख लेने की धमकी भी दी है और चंद्रमुखी की जान को खतरा है.इस आधार पर एक और चार्ज-शीट मिल गयी बाबूलाल को.इस बार बाबू लाल मिस चंद्रमुखी के सुन्दर चेहरे पर बीड़ी का धुआं फेंकते हुए बोला,"बहुत ही भोली हो तुम,मैडम.मेरे से पंगा ले रही हो,तो सावधान रहना.तुम्हे तो नहीं पर तुम्हारे खूसट बॉस को जरुर मारूंगा!मेरी नौकरी जाये या रहे,पर मैं तुम दोनों के बीच कभी कनेक्शन नहीं होने दूंगा,समझी?जाके कह दो अपने टकलू से."

इस बार यूनियन ने भी बाबू लाल से लिखवा लिया और जवाब में लिखा की असल में धमकी तो बाबू लाल जैसे मेहनती और इमानदार कामगार को बॉस ने दी है.बॉस से उसकी पी. एस. मिस चंद्रमुखी की इज्ज़त को खतरा है और बाबूलाल एक जागरूक नागरिक होने के नाते एक बहन की इज्ज़त बचाना चाहता है.इसीलिए बॉस उससे चिढ़ता है और उसे धमकाता है.यूनियन ने जवाब की एक कापी लेबर कमिश्नर को भी भेज दी.

किसी भी दफ़्तर में जब इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल निकालता है तो टी.वी. के विज्ञापनों की तरह कभी ख़त्म ही नहीं होता.देखते ही देखते बाबू लाल के इस केस की फाईल भी बहुत मोटी हो गयी.कभी बॉस-चन्द्रमुखी का पलड़ा भारी हो जाता और लगता कि उनके बीच सर्किट पूरा हो जायेगा,साथ ही बाबू लाल की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.कभी लगता कि यूनियन की वज़ह से बाबू लाल भारी पड़ रहा है.आखिर खेल ख़त्म करने के लिए बाबू लाल ने पैंतरा फेंका.उसने घोषणा की की चंद्रमुखी जैसी बहन की इज्ज़त बचाने के लिए और बॉस की ज्यादतियों के खिलाफ वह आत्मदाह करेगा.बात प्रशासन और प्रेस तक पहुंचा दी गयी.मामला गंभीर हो गया.बॉस का वोल्टेज थोड़ा कम हुआ.लगा की वह समझौते के मूड में आ गया है.उधर इस वातावरण को थोड़ा अमली जामा पहनाने के लिए मिस चंद्रमुखी ने अपना मेक-अप कम कर दिया.अब वह बॉस की पी.एस. कम,उनकी बेटी ज्यादा नज़र आने लगी.

एक दिन मिस चंद्रमुखी बाबू लाल से उदास हो कर बोली,"बाबू लाल भैया,इस बहन की इज्जत और कितना उछालोगे,बोलो तो?एक प्यारे भाई का आत्मदाह मैं कैसे देख पाऊँगी?'' मिस चंद्रमुखी की आंख में पानी आ गया.बाबू लाल ठहरा चपरासी.अपनी बीबी के उदास होने पर वह चाहे कभी न पिघला हो,पर मिस चंद्रमुखी के सामने वह मोम बनकर बोला,"अब तो इस भाई की नौकरी तुम्ही बचा सकती हो,बहन.बॉस से कहो की वह जमीन पर आ जाये और मैं भी सभी कुछ भूल जाने को तैयार हूँ."

इस तरह दफ़्तर में बॉस,मिस चंद्रमुखी,बाबू लाल और यूनियन सभी मामले को रफा-दफा करने को तैयार हो गए.पर मामला रफा-दफा हो कैसे?केस की मोटी फाईल बीच में तंग अड़ाने लगी.विद्वान कहते हैं की आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है.माईकल फैराडे ने विद्युत् का अविष्कार कर डाला पर उसने सपनों में भी नहीं सोचा होगा की आगे बचल्कर सर्किट की जगह शाट-सर्किट ज्यादा उपयोगी सिद्ध होगा.अचानक एक शाम दफ़्तर के सर्किटों में वोल्टेज बढ़ गया.शाट-सर्किट की वज़ह से आग लग गयी.कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जल गए.बाबू लाल की फाईल को तो जलना ही था."

आशा है यह वृतांत पढ़कर उन तमाम शक्की मूढों की तसल्ली हो जाएगी.

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