Friday, May 20, 2011

एक पत्र कुम्भकर्ण भैया के नाम

प्रिय भैया कुम्भकर्ण जी,
एक विशालकाय नमस्कार!
अत्र कुशलं तत्रास्तु.यदि आप जागृतावस्था में हुए तो इस अकिंचन का पत्र आपको स्वस्थ एवं सानंद पायेगा क्योंकि आप श्रीलंका के माल-पानी और ढोर-ढंगरों को उदरस्थ कर रहे होंगे.और यदि आप गहन निंद्रा में हुए तो मेरा पत्र निश्चय ही श्रीलंका के चर-अचर को कुशलपूर्वक पायेगा.

भैया,अभी हाल ही में मैंने दूरदर्शन द्वारा प्रसारित ''रामायण'' नमक सीरियल में आपका रोल देखा था.आप गहन निद्रा में थे और चूँकि श्रीलंका में राम-रावण युद्ध की वजह से इमरजेंसी की घोषणा हो चुकी थी,इसलिए आपको जगाया जा रहा था.इस चक्कर में रामानंद सागर जी को दूरदर्शन के पूरे आधे घंटे बर्बाद करने पड़े.बड़ी मुश्किल से आप जागे भी तो भोजन-सामग्रियों की ख़ुशबू से.और जागते ही आप बिना ब्रश किये भोजन पर पिल पड़े.आपके टूथ-ब्रश का साइज़ देखने की तमन्ना मन में ही रह गयी

आप की प्रतिभा को देखकर ही मैं आपको पत्र लिखने के लिए विवश हो गया हूँ.आप जैसे महान नींद-प्रेमी को पत्र लिखकर मैं अपने आप को धन्य महसूस कर रहा हूँ.हम भारतवासियों ने सुना है की आप जनवरी से जून तक सोते हैं और जुलाई से दिसम्बर तक निरंतर अपनी उदरपूर्ति में लीन रहते हैं.इन जागृतावस्था वाले छः महीनों में तो आप श्रीलंका की आधी आबादी खा जाते होंगे?

मैं आपके अग्रज रावण जी को बहुत बुद्धिमान नहीं मानता था.पर जबसे सुना है कि उन्होंने आपकी छः महीनों की नींद का वरदान माँगा था,तबसे मैं उनसे बुरी तरह प्रभावित हूँ.उन्होंने सगे भाई की लम्बी नींद का वरदान मांगकर श्रीलंकावासियों की खाद्द्य-समस्या सुलझा ली.यदि आपको इन बातों की जानकारी न हो तो कृपया श्रीलंका की पुरानी फाईलें देख लें.

एक राज़ की बात कहना चाहूँगा.रावण जी के सिद्धांत भले ही बहुत ऊँचे हों,पर बहुत कच्चे हैं.राजनीतिक समीकरणों से एकदम उल्टे.वे भाई का पेट काटकर जनता का ख़याल रखते हैं.अपने इधर ऐसा ग़लत रिवाज़ नहीं है.हमारे देश के स्वनामधन्य राजा पहले अपने वन्धु-वान्धवों का पेट भरते हैं.जनता के हाथ सिर्फ़ जूठन ही आ पाती है.हमारे यहाँ राजा को इतनी फ़ुर्सत ही नहीं कि वह जनता के बारे में सोचे.

रावण जी की बस एक ही उच्च कोटि की नीति हमारे देश में पसंद की जाती है और वह स्वस्थ नीति है दूसरों की जवान और सुन्दर बीबियों को अपने देश में स्मगल करना.हमारा देश अभी इस सीमा तक प्रगतिशील नहीं हुआ है इसलिए हमारी स्मगलिंग नशीले पदार्थों तक ही सीमित है.हमारे देश का नशा-उन्मूलन दल ही इन पदार्थों का ज्यादा सेवन करता है.

खैर,इन मुद्दों को जाने दीजिये.मैं असली मुद्दे पर आता हूँ.आप हमारे यहाँ अपनी महान नींद की वज़ह से जाने जाते हैं.आप गहरी और लम्बी नींद का पर्याय बन गए हैं.कुम्भकर्णी नींद एक परंपरा बन गयी है और हमारे देश ने इस परंपरा को कला के स्तर तक पंहुचा दिया है.मैं आपके रेफरेंस के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ.

हमारे देश का शासन जो संस्था चलाती है उसे सरकार कहते हैं.संभवतः सरोकार से उपजा यह शब्द नींद का श्रृंगार पाकर ऊँघने का पर्याय बन गया है.जनतारुपी महासागर को चुनाव के पर्वत से मथने पर सरकार का आविर्भाव होता है.इस मंथन से भ्रष्टाचार नामक रत्न भी निकलता है जिसे जनप्रतिनिधियों में अमृत की तरह बाँट दिया जाता है.सत्ता में आने के बाद सरकार पांच सालों के लिए कुम्भकर्णी नींद ओढ़कर सो जाती है.

सरकार का मुखिया,विभिन्न क्षेत्रों से चुनकर आए,अपने नाम दादागिरी और गुंडागर्दी का कीर्तिमान रखनेवाले जनप्रतिनिधियों को प्रमुख विभागों का कार्यभार सौंपकर निश्चिन्त हो जाता है.इसके बाद मुखिया दूसरे देशों की समस्याएं सुलझाने में व्यस्त हो जाता है.

इसके बाद गृह-मंत्री गृह-कलह के योगदान और निदान में व्यस्त हो जाता है.रक्षा-मंत्री के सौजन्य से रक्षा-सौदे चलते रहते हैं.अर्थ-मंत्री अनर्थ के घोटालों में उलझ जाता है.हमारे देश में रेल-कर्मियों की सतर्कता से नियमित रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं,जो रेल-मंत्री को व्यस्त रखती हैं.वन-मंत्री वृक्षारोपण करवाता रहता है;ताकि उनके रिश्तेदारों के लिए,जिन्हें जंगल काटने के ठेके मिले हैं,पेड़ कम न पड़ने पायें.

खाद्य-मंत्री के संरक्षण में देश के जमाखोर और कालाबाजारिये अनाज के गोदामों में ताला मारकर सो जाते हैं.हमारे देश में मानसून भी सो जाता है ताकि सूखा पड़ सके.परिवार-नियोजन मंत्री बच्चों की पैदाइश में मशगूल रहता है.वैसे भी परिवार-नियोजन कार्यक्रम हमारे देश में बहुत सफल है.आठ-दस बच्चे होने के बाद लोग नसबंदी करवा ही लेते हैं.मंत्रियों के विकास के लिए हमारे यहाँ एक विकास-मंत्रालय भी है.

हमारे यहाँ कानून और व्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि कभी-कभी तो हत्या,बलात्कार,आगजनी और लूटपाट की वारदातें एकदम कम हो जाती हैं.बीच-बीच में सत्ता के ग्रीष्मकालीन,वर्षाकालीन,शीतकालीन या अकालीन अधिवेशन होते रहते हैं.इनमे जनप्रतिनिधि आकर गहरी नींद सो जाते हैं और उन्हें जगाने के लिए वही प्रयास करने पड़ते हैं जो रामानंद सागर जी ने आपको जगाने के लिए किये थे.कभी-कभी आपस में एक दूसरे पर चरण-पादुकाएं फेंककर या शाश्वत गालियों का आदान-प्रदान कर जनप्रतिनिधि जनता को विश्वास दिलाते रहते हैं कि सत्ता सोयी नहीं है.

देश कई राज्यों में बंटा हुआ है और राज्य-सरकारें भी तभी जागती हैं जब बाढें आती हैं,सूखे पड़ते हैं और राहत-कार्यों का सुख नज़र आता है.राहत कार्यों से सभी जनप्रतिनिधियों क़ी आत्माओं को बहुत राहत मिलती है.राहत-कार्यों को आंवटित राशि कहाँ चली जाती है उसे कोई नहीं जानता.इस पर हमारे एक प्रसिद्द शायर दुष्यंत कुमार जी ने बड़ा ही प्यारा शे'र कहा है,कुम्भकर्ण भाई,आप भी सुनिए:''यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ ,मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!''यह रहस्य दुष्यंत भाई अपने साथ ही ले गए.

हमारे यहाँ दफ़्तरों में भी सोने क़ी समुचित व्यवस्था है.साहब तो साहब,उनका चपरासी तक सोता रहता है.चपरासी पांच के हरे पत्ते क़ी खुशबू से उसी तरह जाग जाता है जैसे आप भोजन क़ी खुशबू से जागे थे.साहब को जगाने के लिए लिफ़ाफ़ा-अस्त्र का प्रयोग किया जाता है.यह साहबों को जगाने का अमोघास्त्र होता है.लिफ़ाफ़े को टेबल के नीचे से साहब के हाथों में पकड़ाया जाता है और इसके स्पर्श से साहब के शरीर में रक्त संचार शुरू हो जाता है.

सडकों,पुलों और भवनों के निर्माण का ठेका ठेकेदारों को देकर सम्बंधित अधिकारी भी गहन निद्रा में सो जाते हैं.साहबों को ठेकेदारों क़ी ईमानदारी पर शतप्रतिशत भरोसा होता है क्योंकि वह साहबों का विश्वास जीतने के लिए दारू समेत जिन्दा-मुर्दा गोश्त का इंतजाम करता रहता है.ठेकेदारों का काम इतनी उच्चकोटि का होता है कि सड़कें पहली बरसात में ही उखड़ जाती हैं.पुल भी पहली बाढ़ में ही बह जाते हैं.अलबत्ता इमारतें अपेक्षाकृत मजबूत होती हैं.वे तभी ढहती हैं जब उनमे रहने वाले लोग आ जाते हैं.

मरीज़ मरते रहते हैं और अस्पतालों में डाक्टर-नर्स सोते रहते हैं.कहीं-कहीं तो डाक्टर-नर्स साथ-साथ(अलग-अलग बिस्तरों पर) सोते हुए पाए गए हैं.अस्पताल वाले शरीर कि नश्वरता का लोहा मानते हैं.शरीर को तो एक न एक दिन मरना ही है.कभी-कभी डाक्टरों के सोने के फ़ायदे भी देखने को मिल जाते हैं.कई मरीज़ डाक्टरों की तवज्जो न मिल पाने कि वज़ह से अपने आप ठीक हो जाते हैं.

कहाँ तक गिनाऊँ,कुम्भकर्ण भैया.गली-मोहल्लों में रात के चौकीदार सोते रहते हैं.ख़ाकी वर्दियों को आजतक सिर्फ़ अपराधियों ने ही जागते हुए देखा है.हालात इतने सक्षम हैं कि चोर चोरी करने के लिए घर में घुसता है और वहीँ सो जाता है.ड्रायवर बस चलाते हुए सो जाता है.यहाँ तक कि हमारे यहाँ उल्लू तक सोता हुआ पाया जाता है.

हमारा देश आपका बड़ा ऋणी है,कुम्भकर्ण भाई.आपने हमें इतना बड़ा शयनरुपी आदर्श जो दिया है.सोते रहना हमारी संस्कृति बन चुका है.कभी समय निकालकर आप इधर आइये और देखिये.सच कहता हूँ,आप अपनी सोने कि कला पर शर्मिंदा न हो जाएँ,तो कहियेगा!बस,एक ही बात का दुःख है,भैया.उधर लंका में सिर्फ़ आप अकेले इतनी गहरी और लम्बी नींद सोते हैं.हमारे यहाँ तो देश की पूरी जनता सोयी पड़ी है.आपके अग्रज ने आपके लिए छः महीनों तक की नींद मांगी थी.हमारे यहाँ जनता के लिए पूरे पांच वर्षों की नींद का वरदान माँगा जाता है. न जाने कब जागेगी हमारे देश की जनता?न जाने कब नींद से जागकर हमारी जनता सत्ता और सत्ता के सिपाहियों को झिन्झोड़ेगी?

शेष कुशलता है.मुझे भी नींद आ रही है इसलिए पत्रांत करना चाहूँगा.बस,अंत में एक बेहद व्यक्तिगत व नाज़ुक सवाल पूछना चाहूँगा.आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे?जिज्ञासा यह है की जब आप छः महीनों तक सो रहे होते हैं,तो इतना लम्बा समय भाभी जी कैसे काटती हैं?

गहन निद्रा के लिए मेरी शुभकामनायें...

शुभाकांक्षी
आपका ही निद्राजीवी अनुज

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