Wednesday, May 18, 2011

ओ हरजाई,मानसून!

न्यूटन के ज़माने में सेब ऊपर से नीचे गिरा करते थे.आज भी स्थिति वैसी ही है.कभी हवाई जहाज के पहिये आसमान से गिर पड़ते हैं.कभी पूरा का पूरा जहाज अधोमुखी हो जाता है.लेकिन यह मानसून अपवाद है.यह न्यूटन के सिद्धांत को नहीं मानता.यह हर साल मई-जून के महीने में,भारत वर्ष के नक़्शे में,नीचे से ऊपर की ओर गिरता है.
प्रचंड ग्रीष्म में यह बेचारा विषपायी मन तपन की अनुभूति ढोते-ढोते राम के वनवास जैसा हो जाता है.घर के कुत्ते-बिल्ली तक मानसून के इंतजार में टेलीविजन के परदे पर अपनी नज़रें गड़ाए रहते हैं.
पसीने से तर शहरी प्रेमी,अपनी प्रेमिका के आगे घुटने टेककर याचना भरे शब्दों में कहता है,''हे प्रिये,कहो तो तुम्हारे लिए आसमान से तारे तोड़कर ला दूँ?''
प्रेमिका अपने चेहरे पर चुह-चुहा आयी पसीने की बूंदों से अपने अधरों की लिपस्टिक को बचाते हुए कहती है,''मेरे बौड़म प्रेमी,यदि मुझसे इतना ही प्यार है तो मेरे लिए तन-मन को भिगोने वाला मनभावन मानसून ला दो.क्योंकि बिना मानसून के मेरी छतरी बेकार पड़ी है!''
प्रेमी निराश हो जाता है.कहाँ से लाये वह निष्ठुर मानसून को?ऊपर से इस चिलचिलाती गर्मी में उसकी प्रेमिका आइसक्रीम खा-खाकर उसकी जेब को भी ख़ुश्क किये दे रही है.मानसून है कि आने का नाम ही नहीं ले रहा है.
मानसून की लेट-लतीफी अब इस हद तक प्रसिद्धि पा चुकी है कि पत्नियाँ पतियों को हिदायत देने लगी हैं,''ए जी,शाम को दफ़्तर से जल्दी घर लौट आना.कहीं मानसून कि तरह लेट न हो जाना,समझे?''
समस्त चर-अचर और नर-निशाचर मानसून की आस लगाये बैठे हैं,पर यह निर्मोही मानसून न हुआ,भोपाल के गैस-कांड पीड़ितों का मुआवज़ा हो गया
दूरदर्शन पर सजी-धजी समाचार-वाचिका घोषणा करती है कि मानसून अब भारत की ओर चल पड़ा है;तो थोड़ी तसल्ली बंधती है.
एक-दो दिनों के बाद फिर उद्घोषणा होती है कि मानसून कन्याकुमारी के तट पर पहुँच चुका है,और वहां कुंवारी कन्याओं को भावविभोर कर रहा है.सभी के दिल की धडकनें बढ़ने लगती हैं.
ज्यों-ज्यों मानसून भारत के नक़्शे पर ऊपर क़ी ओर घुसता है,समस्त जनमानस उतावला होने लगता है.रास्ते में दो-चार पुलों को तबाह करता हुआ जब मानसून मुम्बई में एक-दो इमारतों को धराशायी करता है,तो लोगों को यकीन होने लगता है कि अब मानसून किसी भी वक़्त उनके दरवाज़ों कि सांकल खड़का सकता है.
सच्ची विरहिणी भी अपनी विरह-व्यथा से आकुल-व्याकुल होकर मानसून की बाट जोह रही है.और जब उसकी आंख के साथ-साथ उसका घर भी चूने लगता है,तो वह समझ जाती है कि मानसून आ गया.करे क्या विरहिणी?उसका परदेशी तो परदेश का होकर रह गया है.वह घर लौटे तो विरहिणी की विरह-ज्वाला मिटे.पर परदेशी समझदार है.वह घर लौटकर विरहिणी की विरह-वेदना में विघ्न नहीं डालना चाहता.
विरहिणी भी कम समझदार नहीं है.उसे अपने परदेशी का नहीं,बल्कि उसके द्वारा भेजे गए मनीआर्डर का ज्यादा इंतज़ार रहता है.मनीआर्डर पाने के बाद वह बसंत-ऋतु में किसी बसंत लाल से या शीत-ऋतु में किसी शिशिर मोहन से अपनी विरह-व्यथा बाँट लेती है.उधर परदेशी भी परदेश में किसी कामचलाऊ विरहिणी की तलाश कर लेता है.
कृषि-प्रधान देश में किसानों का जीवन तो प्रतीक्षाओं से ही भरा है.सरकार घोषणा कर देती है कि किसानों को मुफ़्त बीज बांटे जायेंगे.पर विकास अधिकारी सरपंच के सहयोग से बीज दबाये बैठा रहता है.बड़ी मुश्किल से इन बाज़ के पंजों से बीज छटकता है,तो खाद नहीं मिलती.बीज और खाद मिल गए तो ट्रैक्टर का डीज़ल ख़तम हो जाता है.
यदि गलती से खेती के सारे संयोग जुट भी गए तो यह मुआ मानसून आंख-मिचौली खेलने लगता है.निहारते रहो टकटकी बांधे बाँझ आसमान को.पर आसमान टी.वी. के 'रूकावट के लिए खेद है' कार्यक्रम की तरह एकदम साफ.किसान समझ जाते हैं की सूखा लेकर मानसून आ गया.
अपने देश में,धन्य हैं वे लोग जो मानसून का सुख भोगते हैं.भाग्यवान हैं वे लोग जो नदियों के किनारे रहते हैं और बाढ़ की संभावनाएं ढोते हैं.स्वर्गीय दुष्यंत कुमार भी लगता है इनमे से एक थे.तभी तो उन्होंने अपने और अपने ग्रामवासियों के सुख का इतना सुन्दर चित्रण किया है:''बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,और नदियों के किनारे घर बने हैं."
सच,कितनी सुखद होती होगी वह अनुभूति कि टी.वी. पर मानसून के आने कि घोषणा हो गयी है.घनघोर घटाओं ने मूसलाधार बारिश का रूप ले लिया है.घर में कोई बिल्ली भी घुसती है तो लगता है जैसे पानी घुस रहा है.घर का हर प्राणी दम साधे है.सबकी कल्पनाओं में नदी उफन रही है और सभी कुछ बहाए लिए जा रही है.यह अनुभूति और गहन होती है और घर के मवेशी पानी में बहने लगते हैं.घर भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ता है और चरम अनुभूति के पलों में लोग-बाग़ पानी में डूबने-उतराने लगते है.
यह नज़ारा टी.वी. के माध्यम से जन-जन तक प्रसारित होता है.समाचार-वाचिका मुस्करा कर कह देती है...''बाढ़ ने सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है.''बाढ़ में कोई डूबे,किनारे लगे या बह जाये..उसकी बला से.
अपनी तो इस जन्म में ख्वाइश ही रह गयी कि हम भी किसी 'कोसी प्रोजेक्ट' या 'गंडक परियोजना' से जुड़े होते.कितना अपनत्व होता चारो ओर.अपना घर,अपनी नदी,अपना प्रोजेक्ट और ठीक नदी के किनारे बना हुआ उस प्रोजेक्ट का अपना दफ़्तर.हम नदी को बड़ी अपनत्व भरी निगाहों से देखते.नदी भी हमारे प्रेम का मान रखती.वह पहली ही बरसात में हमारा दफ़्तर बहा ले जाती.पहले दफ़्तर बहता,फिर प्रोजेक्ट के अधबने अवशेष बहते.दफ़्तर के साथ परियोजना कि फाईलें भी बह जातीं.
लोग-बाग़ और प्रेस वाले यदि हल्ला मचाते कि फाईलें जानबूझकर बहाई गयी हैं,तो परियोजना-सूत्रों से स्पष्टीकरण दे दिया जाता कि जब इतनी भयंकर बाढ़ में अधबना बांध बह गया तो फाईलें किस खेत कि मूली थीं.
ठण्ड और गर्मी में तन-मन से परियोजना को चूसने के बाद हम बड़ी बेसब्री से मानसून का इंतज़ार करते.मानसून आता और हमारी सारी काली-कलूटी करतूतें बहाकर ले जाता.भूल-चूक लेनी-देनी!
पर काश!ऐसा हो पाता,तब न!नदी की तो बात दूर,अपने दफ़्तर के आस-पास तो कोई छोटा-मोटा नाला भी नहीं है.हमें अपनी काली करतूतें छिपाने के लिए 'शाट-सर्किट' का सहारा लेना पड़ता है.आग में जब सबकुछ जलकर राख़ हो जाता है तब कहीं फायर-ब्रिगेड वाले आते हैं और मलबे में से फाईलों की क्षत-विक्षत लाशें तलाशी जाती हैं.
चाचा ग़ालिब के ज़माने में भी,लगता है फायर-ब्रिगेड हुआ करती थीं.तभी तो उन्होंने लिखा था:''जला है ज़िस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा,कुरेदते हो राख़,ये अंदाज़-ए-जुस्तजू क्या है?''
इसलिए,हे हरजाई मानसून,तुझे आना है तो आ,या भाड़ में जा!विसंगतियों से भरे इस शहर में न तेरे आने की ख़ुशी है न तेरे न आने का मलाल.
(shrawan Kumar Urmalia)

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