Saturday, May 28, 2011

मन की ऑंखें खोल,बाबा!

मैंने अपने गुरु के आगे शंका प्रकट की,"प्रभु,ये जो हमें जागती आँखों से दिखता है,वह सत्य है या सपना?"

गुरु अपने चेहरे पर अनुभव की अतिरिक्त झुर्रियां ओढ़ते हुए बोले,"मेरे होनहार शिष्य,अपनी लघु शंका का समाधान सुन!अरे मूर्ख,यदि देखना ही है तो अपनी ऑंखें बंद करके देख.अपनी मन की ऑंखें खोल और अपने ज्ञान-चक्षुओं का सदुपयोग कर.खुली आँखों से तो हर ऐरा-गैरा देख लेता है,पगले!"

चूँकि अपने देश में गुरु को गोविन्द से बड़ा मानने की परंपरा रही है,इसलिए मैंने अपने गुरु का मार्गदर्शन स्वीकार कर प्रैक्टिस शुरू कर दी.मैं अपने ज्ञान-चक्षुओं का उपयोग कर सभी कुछ देखने का प्रयास करने लगा.देखते ही देखते कुछ दिनों के अभ्यास से मेरी अंतर्दृष्टि खुल गयी.अब मुझे ऑंखें बंद करने के बाद भी ज्ञान-चक्षुओं के स्क्रीन पर सभी कुछ साफ-साफ नज़र आने लगा.

मुहल्ले के एक परिचित सज्जन मिले और अतिरिक्त उत्साह से बोले,"देखा आपने,भाई साहब!मैं जानता था कि एक दिन ऐसा होकर रहेगा!आखिर बनवारीलाल कि बिटिया उस लफंगे के साथ भाग ही गयी न?"उनके चेहरे पर इस बात का गहरा अफ़सोस झलक रहा था कि वह लड़की इनके साथ क्यों नहीं भागी.मैंने कहा,"हाँ भाई,यह तो देखा मैंने.पर पिछले हफ़्ते आपकी जवान बेटी भी तो रातभर घर से गायब रही थी?वह बात तो आपने किसी को नहीं बताई होगी?" वे सज्जन बोले,"यार,बैंक का ज़रूरी काम याद आ गया.मैं चलता हूँ." कहकर वे उड़नछू हो गए.

पड़ोस के ही एक और सज्जन मेरे पास आए और बोले,"घोर कलयुग आ गया है,भैया!अब तो देखा नहीं जाता!मुहल्ले में बहुत बड़ा अनर्थ हो रहा है.वो बबुआइन है न ससुरी,उस दूधवाले से नैन-मटक्का कर रही है!साला,क्या ज़माना आ गया है.भैया,अपने से तो यह सब देखा नहीं जाता!" मैंने कहा,"नहीं देखा जाता तो अपनी ऑंखें फोड़ लीजिये!" वे उदास होकर बोले,"हम सब बुद्धिजीवियों को मिलकर ही तो समाज कि इन बुराइयों को दूर करना है.मुहल्ले में सभी बहू-बेटियों वाले इज्ज़तदार लोग हैं.हमें तो इन बुराइयों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए." मैंने मुस्कराते हुए कहा,"भाई साहब,वही दूधवाला तो आपके घर में भी दूध देता है न?मैं तो अपने ज्ञान-चक्षुओं के माध्यम से स्पष्ट देख रहा हूँ कि उस दूधवाले से नैन-मटक्का करने के लिए बबुआइन और आपकी जोरू में होड़ लगी है." मेरी बात सुनकर वे सज्जन भी समाज की बुराइयाँ भूलकर भाग खड़े हुए.

एक तीसरे सज्जन मिले और बहुत अधिक ख़ुशी व्यक्त करते हुए बोले,"सुना आपने?यह तो गज़ब ही हो गया!मुहल्ले की भूरी कुतिया ने एक साथ पांच पिल्लों को जन्म दिया है!" अपने बच्चों के जन्म पर भी इनके चेहरे पर कभी इतनी ख़ुशी नहीं देखी गयी.मैंने कहा,"कुतिया ने पांच पिल्ले जने,इसमें आपकी परेशानी का तो कोई कारण नहीं होना चाहिए?" वे निराश होकर बोले,"भाई,आप भी हद करते हैं!अरे,यह अपने मुहल्ले का मामला है.कहीं पेपर-वेपर में छपवाइए न!चलिए,पहले देखकर आते हैं." मैं बोला,"मुझे कहीं आने-जाने की ज़रूरत नहीं.मैं तो यहाँ से बैठे-बैठे ही सब कुछ देख रहा हूँ." वे आश्चर्यचकित हुए.मैं भला बैठे-बैठे ही सब कुछ कैसे देख रहा हूँ?कहीं मेरी अंतर्दृष्टि तो नहीं जागृत हो गयी?वे सज्जन इस बात का प्रचार करने मुहल्ले वालों के पास चले गए.

मुहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गयी.सबने जान लिया की मेरे गत-चक्षु सजग हो गए हैं.मेरे एक मित्र मुझसे बोले,"सुना है तुम आजकल अपने ज्ञान-चक्षुओं से देख रहे हो?" "तुमने बिलकुल ठीक सुना है." मैंने कहा,"क्योंकि मैं कुछ भी देखने के लिए इस देश में पूर्णरूप से स्वतंत्र हूँ." वे शंकित होते हुए बोले,"अच्छा बताओ तो,मेरे घर में इस समय क्या हो रहा है?" अपनी आँखों को मूंदते हुए मैंने कहना शुरू किया,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी बच्ची को गोद में लिए आपकी नौकरानी पड़ोसी के नौकर से ऑंखें लड़ा रही है.और घर पर आपकी पतिव्रता धर्मपत्नी अपने जवान अलसेशियन कुत्ते को अपनी गोद में बिठाकर बड़े प्यार से बिस्कुट खिला रही है." उन्हें मेरे ज्ञान-चक्षुओं पर भरोसा हो गया और वे चुपचाप खिसक गए.

मास्टर रामचरण जी मेरे पास आए और उन्होंने पूछा,"आज आपने अपनी अंतर्दृष्टि से क्या-क्या देखा?" मैंने उन्हें बताया,"आज मैंने देखा कि आप जब स्कूल से घर लौटे,तो आपकी बीबी ने आपको चाय नहीं दी.क्योंकि आपके घर में चीनी ख़त्म हो गयी है.घर में तेल,आटा और दाल भी ख़त्म हो गए हैं.आपकी बेटियों ने कपड़ों के लिए तकाज़ा भी किया.पर आप कोई आश्वासन नहीं दे पाए क्योंकि तनख्वाह वाला दिन अभी दूर है.परिवार के प्रति मानसिक संवेदनाएं आपको इन दिनों परेशान कर रही हैं.ऐसे में अपनी कक्षा की छात्राओं में आप सुकून तलाश रहे हैं." मास्टर जी को भी पक्का भरोसा हो गया कि मैं अंतर्यामी हो गया हूँ.वे भी डरकर भाग खड़े हुए.

एक निम्न-मध्यमवर्गीय भी आए और पूछने लगे,"इधर आप क्या कुछ नया देख रहे हैं?" मैंने वीतरागी मुद्रा धारण करते हुए कहा,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी होनहार बेटी माँ बनाने वाली है,और आप नाना बनने के कगार पर हैं.पर आप बेहद चिंतित हैं क्योंकि आपकी लाड़ली बेटी अविवाहित है." वे भी उड़न-छू हो गए.अब मेरे पास कोई नहीं आता.सभी बेहद डरे हुए हैं.उनके भय का कारण है कि मैं अपनी दिव्यदृष्टि से वह सब देख रहा हूँ जो लोग छिपाना चाहते हैं.अभी परसों की ही बात है.मेरी एक तथाकथित भाभी हैं जो सौंदर्य के मामले में पिकासो के नारी-चित्रों का मुक़ाबला करती हैं.मैंने उन्हें गहनों से लदा हुआ देखा तो पूछ बैठा," भाभी,लगता है भाई साहब आजकल धड़ाधड़ ठेकेदारों का बिल पास कर रहे हैं.और ये आपके झुमके तो कमाल हैं!" भाभी चहकते हुए बोलीं,"ठीक समझे,देवर जी.ये झुमके उन्होंने ही लाकर दिए हैं.पुरे डेढ़ तोले के हैं.अच्छे हैं न?बताओ भला,तुम्हारी अंतर्दृष्टि क्या कहती है?"

मैंने कहा,"मेरी अंतर्दृष्टि तो कहती है कि अपने दफ़्तर की एक महिला टाईपिस्ट को भैया ने पूरे दो तोले के झुमके दिलवाए हैं.इतना ही नहीं,बल्कि वह बेचारी तो उन झुमकों की कीमत भी चुका रही है.अब इतना तो आप समझती ही हैं न कि वह कीमत कैसे चुका रही होगी?" मेरी बातें सुनकर पहले भाभी के नथुने फूले,फिर उनकी भृकुटियाँ तन गयीं.और फिर क्रोध से उनका चेहरा एम.एफ़.हुसैन के घोड़ों जैसा हो गया.वे अपने पति कि ख़बर लेने के लिए घर कि तरफ भागीं.

शाम को भाभी के धर्मपति तशरीफ़ लाये.आते ही बिफर उठे,"क्या मजाक लगा रखा है,यार!बीबियों को भड़काते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती?खैर,जा हहरी बीबी को हमारे बारे में बताया है तो कुछ हमें भी हमारी बीबी के बारे में बताओ?" मैंने उन्हें बताया,"अब इसके बारे में तो तुम्हे घूंस देने वाले ठेकेदार ही बताएँगे,जिनके साथ वे पिक्चर देखती हैं." मेरे मित्र भी अपने नथुने फड़काते हुए अपनी बीबी की ख़बर लेने चल पड़े.

बात मुहल्ले तक ही रहती तो अच्छा होता.पर धीरे-धीरे मेरी अंतर्दृष्टि की ख्याति पूरे शहर में फ़ैल गयी.शीघ्र ही इस ख्याति के परिणाम आने भी शुरू हो गए.अधि रात को इलाके का सबसे बड़ा डाकू मेरे घर आया और धमकाकर बोला,"पंडित जी,हमें सेठ किरोड़ीमल के यहाँ डाका डालना है.आप अपनी ज्ञान-चक्षुओं से देखकर बताइए की माल कहाँ-कहाँ पर छिपा कर रखा गया है?डकैती में मिलने वाले माल का एक-चौथाई आप को बतौर कमीशन दिया जायेगा." मैंने डकैत को सही-सही जानकारी दे दी और लूट के माल का एक-चौथाई ले लिया.

डकैती का पता लगाने के लिए पुलिस भी मेरे पास आई.मैंने डाकू का पता-ठिकाना बताकर सरकारी इनाम भी झटक लिया.ठीक लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं की तरह जो पहले दंगे करवाते हैं और फिर उन्हें शांत करवाकर यश लूट लेते हैं.

मेरी मुसीबतें थोडा और आगे बढीं.एक रात कुछ दादा टाइप के लोग मेरे घर में घुस आए.वे सभी समाजवादी पहनावा पहने हुए थे.उनके मुखिया ने पण की जुगाली करते हुए कहा,"हम लोग दद्दा भाऊ के दल के हैं.हाल ही में हम लोगों ने एक बलात्कार किया हैगा.तन्ने कुछ देक्खा तो नहीं?" मई बोला,"कहो तो वह जगह भी बता दूँ,जहाँ पर आप लोगों ने लड़की की लाश को गदा है?" दल का एक सदस्य उखड़ गया और मुझे धमकाते हुए बोला,"बता के देख तो भला,उल्लू के चरखे?कसम दद्दा भाऊ की,तेरी भी लाश को वहीँ न दफना दिया तो कहना!यदि भला चाहता है तो अपनी जबान बंद ही रखना,नहीं तो तेरी अंतर्दृष्टि हम तेरे भीतर घुसेड देंगे,समझा?" वे चले गए पर मैं बुरी तरह से घबड़ा गया.

बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.दिनों-दिन मेरे हालात बदतर होते गए.एक रात नगर-सेठ लल्लूमल-कल्लूदास के यहाँ छापा पड़ गया.मेरे पास कुछ लोकतान्त्रिक किस्म के गुंडे आए और मुझे धमका गए,"बेटा,हम जानते हैं कि सेठ जी के गोदामों की जानकारी तूने ही शासन को दी है.हम तुझे देख लेंगे!"

नगर के शराब के अड्डों पर छापे मारे गए.ख़ाकी वर्दियों वाले आए और धमकाकर चले गए,"अबे,आजकल तू बहुत देखने लगा है!स्साले,तूने तो हमारा पूरा धंधा ही चौपट कर दिया.तूने हमारी ऊपरी आमदनी और मुफ़्त की दारू,दोनों बंद करवा दी.हम तुझे चैन से जीने नहीं देंगे!"

शहर के रेड-लाइट एरिया में छापे पड़े और वैश्यालय बंद करवा दिए गए. 'नारी सरंक्षण समिति' के परोपकारी लफंगे भी आकर मेरा पानी उतार गए,"यह क्या कर दिया आपने,पंडित जी?इतनी सारी माँ-बहनों के पेटपर अपनी दिव्य-दृष्टि के सहारे लात मरवा दी आपने?इस देश में नारियों का उद्धार क्या आप का बाप करेगा,बोलिए?लगता है,हमें आप का दाह-संस्कार करना ही पड़ेगा,पंडित जी!"

इन सब घटनाओं से ऊबकर मैंने सोचा कि मौन साध लूँ.मैंने कोशिश भी की पर विपक्ष वाले मुझे झिंझोड़ने लगे,"पंडित जी,आजकल आप चोरों,कालाबाजारियों और असामाजिक तत्वों की सूचना सरकार को न देकर देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं." सत्ता-पक्ष वाले भी लगातार मुझे कोंचने लगे,"पंडित जी,आप को रहना हमारे ही शासन में है,समझे?देश जाये ऐसी-कम-तैसी में!यदि आपने हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था से खिलवाड़ किया तो हम विपक्ष वालों की तरह आपका जीना भी मुश्किल कर देंगे!"

हालत कुछ ऐसे हो गए कि मैं विपक्ष के आश्वासनों और सत्ता-पक्ष की धमकियों के बीच त्रिशंकु बन गया.मेरे ज्ञान-चक्षु मेरे लिए अभिशाप बन गए.मुझे फिर आपने गुरु की याद आई.मैंने उनसे गुहार लगायी,"गुरुवर,इस अंतर्दृष्टि ने तो मेरी नींद हराम कर दी है!मुझे इस संकट से उबारिये,गुरुदेव!"

गुरु ने मुझे धिक्कारते हुए कहा,"मूर्ख शिष्य,मैं देख रहा हूँ कि तू सचमुच मुश्किलों में फंस गया है.तेरी अंतर्दृष्टि की वज़ह से देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है.जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई चोरी न कर सके,डाके न डाल सके;बलात्कार न कर सके,कालाबाजारी न कर सके;शराब,जुएँ और वैश्यावृत्ति के अड्डे न चला सके-किस काम का ऐसा लोकतंत्र!अतः,हे शिष्य तू आपने ज्ञान-चक्षुओं को क्लोज कर ले.जो कुछ खुली आँखों से दिखता है,तू भी वही देख.इस देश में सच्चा लोकतान्त्रिक बनकर जीने में ही भलाई है,पगले!"

गुरु ने मेरी समस्या सुलझा दी.मैंने उनके चरण छुए तो उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में मुझसे मेरा अंगूठा माँगा.सच्चा लोकतान्त्रिक होने की वज़ह से मैंने उन्हें अपना ठेंगा(अंगूठा) दिखा दिया.

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@

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