Saturday, February 11, 2012

फिर वही निर्मोही बसंत...

फिर वही मनभावन बसंत है.मादकता का सन्देश लिए यहाँ-वहां भटकती फिरती फिर वही बासंती हवाएं है.वातावरण में एकबार फिर से चाहत के भौंरे और अनुरागों की तितलियाँ मंडराने लगी हैं.माहौल इतना स्नेहिल हो उठा है कि ह्रदय में उमंगों की सरिता निरंतर प्रवाहित होने लगी है.ऐसे में यह विषपायी मन बसंत की उंगली पकड़ स्नेह की संभावनाएं तलाशने लगा है.

मुसीबत यह है कि फिर एकबार आसन्न संकट की तरह वैलेंटाइन-डे का घटोत्कच सामने खड़ा है.इस प्रीति-दिवस को सेलेब्रेट करने की पीड़ा घनी होती जा रही है.करूँ क्या? मैं तो अपने इस निगोड़े मन के हाथों विवश हूँ.

मैं दुनिया से भले जीत जाऊं पर अपने मन से ही हारा हूँ.अपने इस नामाकूल मन को मैंने कई बार समझाया कि देख रे मन,आज के ज़माने में इतना छिछोरापन ठीक नहीं...मंहगाई का ज़माना है...भरे बसंत में लोग प्याज़ भी नहीं खा पा रहे हैं...ऐसे में तू इतनी सारी प्रेमिका रूपी छिपकलियाँ पाल रहा है...यार! तू तो मेरे इस नश्वर शरीर का दीवाला निकालकर ही दम लेगा!

पर अब यह निखट्टू मन मेरे वश में नहीं रहा. कभी अलका से चिपक लेता है तो कभी गज़ाला से...कभी मारिया से टांका भिड़ा लेता है तो कभी परमिंदर के सौन्दर्य जाल में उलझ लेता है...कमला-विमला,रमोला-पमोला,वनिता-अनिता,शेफाली-रुपाली इत्यादि न जाने कितनी पीड़ाएं इस मन ने पाल रखी हैं.

मेरा लम्पट मन इस मामले में पूरा धर्मनिरपेक्ष है और यथोचित आरक्षण का ख़याल भी रखता है.यदि परिभाषित करना चाहूं तो मुंबई की किसी चाल जैसा ही हो गया है मेरा यह कास्मोपालिटन मन.अपने आप को इसने एक धर्मशाला में तब्दील कर लिया है.या यूँ कहूँ कि इसने ख़ुद को प्रेमिकाओं का एक शरणार्थी-शिविर बना लिया है.

अपने मन को मैं आगाह करता हूँ तो यह मुझे ही डांट देता है,''हे मेरे स्थूल शरीर,तू क्यों इतना परेशान होता है? यदि मैं अपनी क़ाबलियत के बल पर अपने भीतर इतनी प्रेमिकाओं को एकोमोडेट कर लेता हूँ, तो इसमे तेरा क्या जाता है? अरे,तुझे तो गर्व होना चाहिए कि तेरी इस नश्वर काया में मेरे जैसा रसिक मन घुसा हुआ है.''

मेरा लुच्चा मन तो समझने से रहा,इसलिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.उधर नॉटी बसंत अपने पूरे शबाब पर है और ऐसे में मुझे लग रहा है कि ये सुरसामुखी बालाएं मेरी और ताड़का-दृष्टि से निहार रही हैं.ऐसा लगता है जैसे उनके दिलों में वैलेंटाइन-डे के एवज में मुझे लूटने-खसोटने की खिचड़ी पक रही है.

मन के हवामहल के हर छज्जे से एक चपल प्रेमिका टकटकी लगाये निहार रही है.सबकी आँखों में डाकुओं वाली चमक है.सभी ने अपनी लूट-खसोट की योजना को मुझ पर टिका रखा है.खीझकर अपने अधम मन को फिर कोसता हूँ,''अबे मन,तेरी अकल पर तो पाला पड़ गया है! इतनी सारी प्रेमिकाएं पालने से तो अच्छा था कि तू बकरियां पाल लेता! वे किसी काम तो आतीं.ये मुफ़्तखोर प्रेमिकाएं तो एक लाइबिलिटी होती हैं रे,पगले! न काम की न काज की...बस रोज-रोज बर्गर-पिज़ा-चाऊमीन जैसे अनाज की! इतनी सारी प्रेमिकाएं तो मुझे सच में लूट लेंगी,यार...यदि तू अपना और मेरा भला चाहता है तो इस वैलेंटाइन-डे के लिए किसी एक प्रेमिका को चुन ले,भाई!''

मन ने प्रतिवाद किया,''हे मेरे भोंडे शरीर,तू ही बता कि मैं किसे हाँ कहूँ और किसे न कहूँ? मेरे लिए तो सभी एक जैसी झकास हैं! न,मेरे से यह नहीं होने वाला.इसलिए,हे मेरे अधम शरीर,क्योंकि तुझे ज्यादा ही चिंता हो रही है,अतः किसी एक का चुनाव तू ही कर दे.तू जिसे डिसाइड करेगा,मैं उसी के साथ वैलेंटाइन-डे मना लूँगा.''

मैंने सोचा,अपने मन के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ,इसलिए मैंने हाँ कर दी.सर्वप्रथम,मैंने सभी मुफ़्तखोर जानखाऊ और कानखाऊ ललनाओं की एक सूची तैयार की और फिर शार्टलिस्टिंग में जुट गया.

पहले बकबक-कानखाऊ वर्ग को अलग कर उन्हें खंगाला और ठोंका-बजाया तो मुझे लगा की ये नहीं चलेंगी.बक-बक कर कान खाने वाली ये प्रमदाएं अपनी चख-चख से वैलेंटाइन-डे को भी पका देंगी.उस प्रीति भरे माहौल में जब अनुराग भरा मन प्रेममय सन्नाटों और खामोशियों की मधुर आवाज़ सुनना चाहेगा, तो ये कर्कशा बालाएं अपनी पटर-पटर से प्यार-स्नेह की गरिमा को धाराशाई कर देंगी.

अब बारी आयी खाऊ और जेब-हलकी कराऊ श्रेणी की बालाओं की.इन पर गंभीरता से विचार करने पर मुझे लगा कि ये उदर-आश्रित पेटू किस्म की कन्यायें भी नहीं चलेंगी.धरती की बोझ ये बालिकाएं सिर्फ़ अपने पेट की ख़ातिर ज़िंदा हैं.ये तो पैदा ही हुई हैं ताकि धरती का उत्पाद उदरस्थ कर सकें.पवित्र वैलेंटाइन-डे पर भी ये हर तरफ लार टपकाती हुई फिरेंगी.कभी चाट-पकौड़ी तो कभी पानी-पूड़ी...कभी बर्गर-पिज़ा तो कभी इडली-डोसा...कभी रसमलाई तो कभी आइसक्रीम.ऐसी बालाओं का प्यार-स्नेह भी इनके पेट से ही उपजता है.ये भुक्खड़ बालिकाएं प्रीति-पर्व को एक महाभोज में बदल देंगी.इससे खिलाने वाले की जेब पर डाका तो पड़ेगा ही.इसलिए भलाई इसी में है कि इनसे भी दूर ही रहा जाये.

गिफ़्ट-झटकू वर्ग का विश्लेषण किया तो मैं दंग रह गया.इन कामनियों को तो बस उपहार चाहिए...प्यार मिले न मिले पर उपहार ज़रुर मिले.इनके लिए स्नेह के सन्दर्भ गौण हैं, गिफ़्ट के सरोकार प्रमुख हैं.ऐसी प्रेमिकाएं जेबों पर अतिरिक्त भारी पड़ती हैं.उपहारों के एवज में ये प्यार-स्नेह का सौदा करती है...इस हाथ दे,उस हाथ ले.बाबा वैलेंटाइन ने तो ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि प्रीति-पर्व उपहार-झटकू पर्व बन जायेगा.ऐसी षोडशियों से हज़ार बार तौबा.

कुछ कुटिल-खल-कामी प्रियम्वदाओं को निरखा-परखा तो बड़ी निराशा हाथ लगी.आईसक्रीम किसी से खायेंगी और पिक्चर किसी और के साथ देखेंगी.चाट-पकौड़ी का सेवन किसी और के ज़िम्मे और प्यार न्योछावर करेंगी किसी और पर.रसमलाई का बजट किसी और के हिस्से और गले लगेंगी अन्य चपड़गंजुओं के.नहीं,वैलेंटाइन-डे ऐसी कृतघ्न कुमारियों के लिए नहीं है.ये तो प्रीति-पर्व की पवित्रता को भी कलंकित कर देंगी.

इस तरह सर्वगुणसंपन्न तथाकथित प्रेमिकाओं ने मुझे भ्रमित कर डाला.वैलेंटाइन-डे के लिए सुपात्र चुनने के चक्कर में मेरे मन ने मुझे अच्छी-ख़ासी मुसीबत में फंसा दिया था.किसका चुनाव करूँ...कोई क्लियोपेट्रा कि तरह सुन्दर है तो अपने भीतर ज़हर भरे हुए है...'विषरसभरा कनकघट' मुहावरे को चरितार्थ करती हुई.कोई चटोरी है तो कोई छिछोरी.कोई लाज-शर्म से परहेज करने वाली तो कोई नैतिकता को अपने पर्स के कारागार में क़ैद किये हुए.कोई स्वार्थी है तो कोई अत्यधिक आधुनिकता के चलते चरित्र का बोझ नहीं उठा पा रही है.

आखिर मैंने अपने मन को दुत्कारा,''तू बड़ा ही अहमक है,घोंचू! मुझे तो अब तुझ पर शर्म आ रही है.तूने यह कैसी भीड़ जुटा रखी है,यार? मुझे एक भी ऐसी नहीं मिली जिसके साथ तू वैलेंटाइन-डे का स्नेह-पर्व सेलिब्रेट कर सके.''

मेरे मन ने धड़कते हुए कहा,'' मेरे प्यारे शरीर, तुम इसी लिए स्थूल कहलाते हो क्योंकि तुम चीज़ों को ठीक से अनालाईज नहीं कर पाते.तुम्हे भी मेरी प्रेमिकाओं का सिर्फ़ स्थूल शरीर ही दिखता है.अरे,तुम उस सौम्या बेबी को भूल गए? कौन सा गुण है जो उसमे नहीं. मेरे ख्याल से वह मेरी परफेक्ट वैलेंटाइन बन सकती है.ज़रा उसका भी जायज़ा लो,मेरे स्थूल आका!''

मैंने सौम्या नामक प्रियतमा के बायो-डाटा का अध्ययन किया, तो धन्य हो गया.वह हर कोण और दृष्टिकोण से श्रेष्ठ और सुटेबल लगी.सीधी-सादी...छल-कपट रहित...पूर्ण रूप से निस्वार्थ...ढोंग और छलावे से कोसों दूर.समर्पण का ऐसा आलम कि इसके सामने मेरा अवसरवादी मन बेईमान लगे.चरित्र की ऐसी पक्की कि इसकी तुलना में मेरा मन लुच्चों का सरदार लगे.शालीनता का ऐसा रूप जिसके सामने मेरा निगोड़ा मन पक्का गंवार लगे.

सौम्या पर मैं और मेरा मन सहमत हुए तो लगा जैसे बसंत सार्थक हो गया हो.अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाने वाली बसंती बयार मन में आकाँक्षाओं के गाँव बसाने लगी.पूरे वातायन में व्याप्त शीत और ऊष्मा के मिले-जुले रेशे चाहत का इन्द्रधनुष रंगने लगे.साल भर का बैरागी मन अनुराग भरे रंगों से सराबोर होने लगा.सपनों ने पंख पहन लिए और विस्तृत आकाश में स्नेह के सन्दर्भ तलाशने लगे.

जैसे-जैसे वैलेंटाइन-डे करीब आता जा रहा था,मेरे मन में भावनाओं की अंगड़ाईयां बढ़ती जा रही थीं.बसंत ने वातावरण में चारो ओर कामना और चाहत के दूत तैनात कर दिए थे.मन में बढ़ती अंगड़ाईयां तनहाईयों की जनसँख्या में इज़ाफा कर रही थीं.मन को हर तरफ सौम्या बेबी की परछाईयां नज़र आने लगी थीं.

प्रतीक्षा समाप्त हुई.मैंने अपने नश्वर शरीर का गहन प्रक्षालन किया,सुगन्धित लेप लगाया और करीने से बाल काढ़े.बड़ी सफाई से मैंने अपना वेश-विन्यास किया और कपड़ों पर शीला के द्वारा गिफ़्ट किया हुआ स्प्रे छिड़का.इसके बाद मैंने ख़ुद को आईने में निहारा तो ख़ुद पर ही मोहित हो गया.अपने मन से मैंने कहा,''चल डीयर,अब मैं तैयार हूँ.चलकर सौम्या के साथ वैलेंटाइन-डे को सार्थक करते हैं.''

मेरे मन ने बड़े आत्मविश्वास से कहा,''जाना कहाँ,यार?अपनी कुड़ी इत्थे ही आयेगी.बस आती ही होगी.इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा और सही.'' मैं प्रतीक्षा करने लगा.मेरे सामने से समय के सिपाही एक-एक कर गुज़रने लगे.कई बार मैं बाहर तक देख आया.दूर-दूर तक सौम्या का पता न था.बाहर दूसरे जोड़े बाँहों में बाहें डाले हर तरफ डोलने लगे थे.

एक बड़ा काल-खंड हमारे सामने से गुज़र गया पर सौम्या अवतरित नहीं हुई.मेरा वाचाल मन अवाक था.इंतज़ार की सांसें उखड़ने लगी थीं.मन का बसंत पतझड़ के हवाले होने लगा था.मैंने मन को डाँटते हुए पूछा,''क्या हुआ,बे! कहाँ रह गयी सौम्या?तू तो इस सौम्या की बड़ी तारीफ़ें कर रहा था...बड़ी सीधी है,सरल है,बुद्धिमान है,चरित्रवान है...और भी न जाने क्या-क्या! क्या हुआ बे,अभागे?"

इसके पहले की मन कुछ कहता,मैंने अपने बसंत को झुलसते हुए देखा.मेरा पलाशवन धू-धू कर जलने लगा.हवा में पतझड़ के संकेत दिखने लगे.मैंने बालकनी से देखा की सौम्या...हाँ,वही सीधी-सादी चरित्रवान सौम्या दुश्मन की बाँहों में वैलेंटाइन-डे मना रही थी.मुझे लगा जैसे भरे बसंत में मेरी बाहें बाँझ हो गयी हों.

मेरा मन अपनी हीन भावना का प्रदर्शन करते हुए भुनभुनाया,''मेरे स्थूल आका,सब तुम्हारी ग़लती है.इससे तो कोई चटोरी-लुटेरी ही अच्छी थी.कम से कम आज के दिन नसीब तो हो जाती.''

तभी मुस्कराती हुई,इठलाती हुई,बलखाती हुई और अपना पर्स हिलाती हुई कुरूप-व्यक्तित्वा सुदर्शना प्रगट हुई और ठुनकते हुए बोली,''सौम्या तो गई,बच्चे! मैंने कहा था कि ज्यादा चरित्र के पीछे मत भागो! चरित्र ही बचाना होता तो ये वैलेंटाइन-डे हमारे देश में घुसता ही क्यों,बोल बच्चू? अब बोल,मेरे साथ आता है क्या...मेरे साथ वैलेंटाइन-डे सजाता है क्या?या जाऊं? उधर मंकी-चंकी-डंकी सब मेरी राह देख रहे हैं!''

मैंने मन से पूछा,''क्या बोलता तू? यह चल जाएगी? सोच ले...यह कहाँ तक गिरी है,अभी इसका अंदाज़ नहीं लग पाया है!'' मन ने कहा,''यार स्थूल आका,आज के दिन तो तू नैतिकता को ताक पर रख दे! मेरा वैलेंटाइन-डे ख़राब मत कर,भाई!''

अचानक फिर से बसंत जवान हो गया और मेरा मन नैतिकता के जाल से मुक्त हो अपनी कुलटा-कुरूपा वैलेंटाइन में खो गया.
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

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