Friday, July 20, 2012



***पति,पत्नी और वह अर्थात चूहा***

मित्रो,पति होने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि पत्नी साल में एक बार कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती है...मुझे भी मेरी पत्नी अपने कलेजे पर पत्थर रखकर यह ख़ुशी साल में एकबार देती है...उधर पत्नी ट्रेन पर चढ़ती है,और इधर मेरे घर में एक चूहा प्रवेश करता है...फिर लगभग महीने भर तक मैं और चूहा बड़े आराम से साथ-साथ रहते हैं...मैं बाहर से भोजन लाता हूँ,खुद खाता हूँ और चूहे को भी खिलाता हूँ...मैं भी खुश,चूहा भी खुश...इतने सालों के वैवाहिक जीवन में यह बात मेरी समझ में आ गई है कि चूहे के साथ रहना ज़्यादा आसान है...आपका प्रश्न मैं समझ रहा हूँ...आप यही पूछना चाहते हैं न कि पत्नी के रहते चूहा घर में क्यों नहीं आता...तो मैं बता दूँ कि अव्वल तो वह मेरी पत्नी से डरता है,क्योंकि मैं भी डरता हूँ...और दूसरे,पत्नी को घर में पराये मर्द जाति का प्रवेश पसंद नहीं...

चूहा सारे घर में इधर से उधर दौड़ता रहता है जैसे यह उसके ताऊ का घर हो...अपने दांतों की वर्जिश के लिए कभी वह तार कुतरता है,कभी काग़ज़...पत्नी ने जहाँ-जहाँ भी खाने का सामान छुपाया होता है,मुझे चूहे की मदद से ही उसका पता चलता है...मैं और चूहा मिल बाँट के खाते हैं...बस,चूहे की एक ही बात मुझे पसंद नहीं कि वह जगह जगह मल विसर्जन कर देता है...मैं निरंकार भाव से सोचता हूँ तो इसमे चूहे की गलती नज़र नहीं आती...बल्कि वह मुझे बहुत खुद्दार लगता है...एकदम वीतरागी भी...क्या लेकर आया था, क्या लेकर जाऊंगा...! जो कुछ भी है,वह इसी घर का है...

चूहा मेरे लिए अलार्म घडी का काम भी करता है...चाय का समय होते ही मुझे जगा देता है...इसके लिए उसने बड़ा अच्छा तरीका निकाल लिया है...वह अपनी पूंछ को मेरी नाक और कान में घुसेड़ता है...यदि इस पर भी मैं न जगा तो मुझ पर अपना शिवाम्बु छिड़कता है...मैं उठकर चाय बनाता हूँ और उसको बिस्कुट खिलाता हूँ...दरवाज़ा खोलता हूँ तो वह समाचार-पत्र को घसीटता हुआ घर के भीतर ले आता है...मुझे खुश देखकर वह भी खुश रहता है...कभी पैरो पर खड़ा होकर अभिवादन सा करता है,आभार का प्रदर्शन करता है...कभी किलकारियां मारता हुआ इधर से उधर दौड़ता है...मुझे उसमे गज़ब का सामाजिक सरोकार नज़र आता है...वह चालाक भी है...कामवाली आती है तो छुप जाता है..वह जानता है कि कामवाली घरमालकिन से चुगली कर देगी...और मैं परेशानी में पड़ जाऊंगा...

इस बार भी चूहे के साथ बहुत अच्छे दिन बीते...पर नियति से पतियों का सुख कब देखा जाता है...पत्नी मायके से लौटी और आते ही पूछा..''फिर चूहा आया था क्या? ज़रूर आया होगा...तुमने ज़रूर दरवाज़ा खुला छोड़ दिया होगा...मैं तुम्हे जानती हूँ!''...पता नहीं आजकल की पत्नियों को क्या होता जा रहा है...उन्हें पति के चरित्र पर इतना भरोसा नहीं होना चाहिए...चूहे के बारे में जानने से पहले उन्हें इस बात का पता लगाना चाहिए कि उनकी गैरहाजिरी में कोई चुहिया तो नहीं घुस आई थी...मैंने पत्नी से कहा, '' तुम्हारे जाते ही मैंने बोर्ड लगा दिया था कि 'चूहों का प्रवेश यहाँ वर्जित है !'...फिर भला वह कैसे आता...!''...पत्नी को भरोसा नहीं हुआ,और उसने खोजबीन शुरू कर दी...अब बुद्धिहीन चूहे को चाहिए था कि पत्नी के आते ही वह अंतर्ध्यान हो जाता...पर वह पड़ गया लालच में...और एक दिन पत्नी ने उसे देख ही लिया...मेरी शामत आ गयी...वह बड़बड़ाने लगी..'' मैं जानती थी कि चूहा घुसा है...तुम्हारे रहते चूहा न घुसे,यह तो हो नहीं सकता...तुम्हे तो होश ही नहीं रहता..चूहे के साथ तुम्हे क्या मज़ा आता,मेरी समझ में नहीं आता...घर का सब सामन खा गया चूहा...पूरे घर को गन्दा कर रखा है...तुमने उसे भगाया क्यों नहीं?'' मैंने कहा,''मुझे कैसे मालूम होगा कि वह घर में घुसा है...इतना छोटा सा तो होता है...और तुम तो जानती ही हो कि मेरे चश्मे का नंबर भी बदल गया है...पर एक बात तो मानोगी न कि इस बार मैंने घर में बन्दर नहीं घुसने दिया...!'' पत्नी ने ताना मारा, ''बन्दर घुस जाता तो ठीक था,पर चूहा क्यों घुसा?''

दो-चार दिन तक घर में हर ओर चूहा छाया रहा...चूहा...चूहा...और चूहा...मुझे लगा जैसे मैं भी एक चूहा बन गया हूँ और यदि चूहा नहीं मिला तो पत्नी मुझे ही घर से खदेड़ देगी...फिर तलाश शुरू हुई चूहे को पकड़ने के लिए चूहेदानी की...हमारे मोहल्ले में एक ऐतिहासिक चूहेदानी है...बाबा-आदम के ज़माने की...चूहों ने पूरा मुहल्ला कुतर डाला पर चूहेदानी को नहीं कुतर पाए हैं...उसे छिपा भी नहीं पाए हैं...हर बार किसी न किसी के घर में चूहेदानी मिल ही जाती है...इस बार भी मिल गई ...और पत्नी की चालाकी के आगे चूहा विवश हो फंस गया...मैं चूहेदानी में फंसे चूहे को बाहर ले जा रहा था तो उसने बड़ी कातर निगाहों से मुझे देखा...मैंने भी आँखों आँखों में कहा कि यार,मुझे माफ़ करना...मुझे तेरी ज़रूरत तो है,पर पत्नी से मेरी शादी हुई है यार...!

पत्नी को मेरे घर आने पर भी कभी इतनी ख़ुशी नहीं होती,जितनी उसे चूहे के घर से बाहर जाने पर हुई...उसने घर में खीर-पूड़ी बनाई...अब मैं पत्नी के साथ हूँ...लगभग ग्यारह महीनों का साथ...फिर यह मायके जाएगी और मैं चूहे को एक माह का अतिथि बनाऊंगा...एक माह ऐसे प्राणी के साथ रहूँगा जो इंसानों से ज्यादा सामाजिक है...***श्रवण***

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