Monday, September 17, 2012


                                    ***जोशी जी जवान हुए***

 

हमारा मोहल्ला इस देश का प्रतिनिधि मोहल्ला है.हमारे मोहल्ले का इतिहास गवाह है कि यहाँ के लोगों ने तरह-तरह से मोहल्ले का नाम रोशन किया है. टंडन जी के घर पड़ने वाला छापा हो या परसाद जी के घर पर होने वाले नास्तिक व बनावटी भजन-कीर्तन,बहू-बेटियों के सात्विक कारनामे हों या सास- बहुओं की कर्कश यश-गाथाएं,पति-पत्नी के बीच के मधुर द्वंदात्मक सम्बन्ध हों या कुत्तों की नस्ल के साथ मनुष्य के नस्ल की समन्वय-किवदंतियां, हमारा मोहल्ला हमेशा कुख्यात रहा है.इन बातों को लेकर हमारा देश हमारे मोहल्ले पर गर्व कर सकता है.

इस बार मोहल्ले को गौरवान्वित किया है स्वनामधन्य जोशी परिवार ने.वैसे तो मोहल्ले की नाक है जोशी परिवार, पर मोहल्ले के कुछ तथाकथित इतिहासकारों का मत है कि जोशी परिवार को नाक से ज़्यादा 'मोहल्ले के कान' और 'मोहल्ले की ज़ुबान' कहना ज़्यादा सार्थक होगा.ऐसा इसलिए,क्योंकि मोहल्ले में सारी लगाई-बुझाई का ज़िम्मा इस परिवार ने ले रखा है.

 जोशी-दम्पति के बारे में लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं.दोनों की जोड़ी ज़रा हटकर है.दोनों ''नॉट मेड फॉर ईच अदर'' की मिसाल लगते हैं. '' जबरन एक दूसरे के गले मढ़ देना'' कहावत संभवतः इनकी शादी के बाद ही चलन में आई होगी.इस जोड़ी में वैसे तो हर तरह का विरोधाभास नज़र आता है, पर दोनों में उम्र का फ़ासला स्पष्ट दिखता है.या तो जोशी जी की शादी ज़रा देर से हुई और श्रीमती जोशी जल्दी व्याह दी गईं. नतीजा यह हुआ कि श्रीमती जोशी जवानी की दहलीज़ के भीतर रह गईं और जोशी जी जवानी की बाउंडरी पार कर गए. या हो सकता है कि अपवादस्वरूप यह जोशी जी की तीसरी शादी हो. यह भी हो सकता है कि जोशी जी ने अपने बाल धूप में पकाकर सफ़ेद कर लिए हों.

बहरहाल 'आदर्श जोड़ी' की परिभाषा को जोशी-दम्पति पर ख़र्च नहीं किया जा सकता है.ऐसी ही जोड़ियों के लिए हमारे सभ्य समाज में ''अंधे के हाथ बटेर'', ''हूर के गले में लंगूर'' या ''भगवान् बनाई जोड़ी, इक लंगड़ा इक कोढ़ी'' जैसी शाश्वत कहावतें प्रचलित हैं.

पति बूढ़ा दिखे और पत्नी जवान,तो मोहल्ले की खोजी निगाहें उन्हें ताड़ने लगती हैं. उन निगाहों से बचने के लिए जोशी-दम्पति लोगों के सामने आपसी प्यार का प्रदर्शन करते हैं, पर लोग भ्रमित नहीं होते. वे अपना पहरा और कड़ा कर देते हैं. लोग अनुभवी हैं और समझते हैं कि बेमेल जोड़ों में समझौते का बहुत बड़ा योगदान हुआ करता है. यदा-कदा लोगों की गिद्ध-दृष्टियों को श्रीमती जोशी आश्वस्त करती रहती हैं, ''वो क्या है न कि जोशी जी बदल-बदल कर तेल लगाया करते थे न, इसीलिए इनके बाल जल्दी सफ़ेद हो गए.''  जब उनकी सहेलियों की तसल्ली नहीं होती तो श्रीमती जोशी अपना बयान बदल देती हैं,''बहन, इनके परिवार में ही कुछ ऐसा है कि मर्दों के बाल जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं. इनकी वंश-परंपरा ही कुछ ऐसी है!''

 श्रीमती जोशी का यह तर्क ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि हमारे परिवार में मर्दों की मूंछें होती हैं और औरतों की मूछें नहीं होती हैं. हमारी वंश परंपरा ही कुछ ऐसी है!

श्रीमती जोशी अपने पति के सफ़ेद बालों को अपने घटिया तर्कों से ढंकने की भरसक कोशिश करती रहती हैं, पर कोई न कोई बात ऐसी हो ही जाती है जो उन्हें परेशान कर देती है. एक दिन वे अपने पति के साथ बाज़ार जा रही थीं कि उनकी एक नई सहेली ने देख लिया. उस सहेली ने उनके पति जोशी जी को नहीं देखा था. उस सहेली ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया,''सुशीला,तुम्हारे पिताजी आये हुए हैं क्या?''

 ''नहीं तो...'', श्रीमती जोशी ने स्पष्टीकरण दिया. पर सहेली ने ज़ोर दे कर कहा, ''हाँ ,मैंने तो देखा कि तुम उनके साथ मार्केट की तरफ जा रही थी!''

झेंप मिटाते हुए श्रीमती जोशी बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे पति हैं...ऐसा है न डीयर कि उनके बाल ज़रा जल्दी सफ़ेद हो गए हैं...!''  मन ही मन वे अपने पति पर बड़बड़ाईं...' कई बार कहा इस घोंचू को कि खुद को थोडा मेंटेन करे,पर नासपीटा सुनता ही नहीं...! बुड्ढा कहीं का...!'

अभी अपनी सहेली के आघात से श्रीमती जोशी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि किसी और ने पूछ लिया, ''मिसेज जोशी, आपके बड़े भाई आये हुए हैं क्या? मैंने तुम दोनों को साथ-साथ देखा...तुम्हारे तो चेहरे भी मिलते हैं...!'' श्रीमती जोशी मन ही मन कुढ़ते हुए बोलीं, ''नहीं मिसेज वर्मा, वे मेरे पति हैं.''  मिसेज वर्मा ने उन्हें धराशायी करते हुए कहा, ''अरे,नहीं...! ऐसा कैसे हो सकता है? वे तो बड़े बुजुर्ग से दिखते हैं?लगता है आपने खुद को इतनी अच्छी तरह से मेंटेन किया है कि आप उनके सामने बहुत यंग नज़र आती हैं...!''

श्रीमती जोशी ने फिर वही रटा रटाया तर्क देकर मिसेज वर्मा से जान छुड़ाई और मन ही मन उन्होंने अपने पति को फिर कोसा...'यह घटिया पति मेरी इज्ज़त को मिट्टी में मिलाकर ही रहेगा...!'

श्रीमती जोशी समस्या से निबटने के बारे में सोच ही रही थीं कि उनकी मुहफट सहेली ने पूछ लिया, ''क्यों री! तूने बताया नहीं कि तेरे ससुर आये हुए हैं...कल देर शाम देखा मैंने...तेरे घर से निकल रहे थे?'' श्रीमती जोशी बोलीं, ''यार,क्यों मज़ाक कर रही है? तूने उन्हें पहचाना नहीं क्या? अरे वे मिस्टर जोशी रहे होंगे...!''

सहेली बोली, ''अच्छा, पर वे तो बहुत बूढ़े दिखने लगे, यार!'' श्रीमती जोशी ने शरारत से कहा, ''बाल ही तो सफ़ेद हुए हैं उनके.दिल से तो वे जवान हैं!'' सहेली ने उन्हें ज़मीन पर ला पटका, ''दिल की जवानी को तो यार, तू ही जाने, पर ज़रा बाहर से उनकी मरम्मत करवा दे. तू उनके साथ ऐसी लगेगी जैसे दो अलग-अलग पीढियां साथ-साथ चल रही हों!''

श्रीमती जोशी ने मन ही मन सोचा...'इस खूसट पति का कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, वर्ना यह मुझे भी भरी जवानी में बूढ़ा कर देगा...!' उन्हें लगने लगा कि मोहल्ले की हर आंख उन्हें घूर रही है. जैसे उनसे कहना चाहती हों कि उनका पति बूढ़ा है.श्रीमती जोशी ने बहुत सोच विचार किया, अपनी किटी-पार्टी की सहेलियों से विचार विमर्श किया और जोशी जी की नश्वर काया पर जवानी लाने के प्रोजेक्ट पर जुट गईं.

 श्रीमती जोशी ने अपने पति को डांट कर कहा, ''तुम्हारे इन पके बालों ने मेरी नाक काटकर रख दी है.कितनी बार कहा कि इन्हें काले कर लो, पर तुम मेरी सुनते कहाँ हो! कल ही जा कर किसी सैलून में अपने बाल काले करवाओ, समझे? अब बहुत हो गया!''

पति जोशी जी विनम्रतापूर्वक बोले, ''अब इस उम्र में तुम मुझ पर रंग-रोगन करवाओगी? ठीक से सोच लो, भाग्यवान! कहीं ऐसा न हो कि मेरे काले बाल तुम्हारी ज़्यादा नाक कटवाएं?''

 पत्नी-हठ ने जोशी जी के बाल काले करवा दिए. उनकी मूछें भी काली करवा दी गईं. लगे हाथ जोशी जी ने फेसियल भी करवा लिया.जोशी जी ने ख़ुद को आईने में देखा तो अपनी कायाकल्प देखकर बेहोश होते होते बचे. पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल गयी कि जोशी जी जवान हो गए हैं. लगा जैसे पूरा मोहल्ला ही जवान हो गया हो.अब पति-पत्नी बड़ी शान से साथ-साथ घूमते. श्रीमती जोशी पति-प्रदर्शन के चक्कर में कुछ ज़्यादा ही घूमने पर ज़ोर देतीं.

 श्रीमती जोशी को मनचाहे कम्पलीमेंट मिलने लगे. कोई सहेली कहती, ''यार, तेरा पति तो बड़ा क्यूट लगने लगा है. ऐसा लग रहा है जैसे खँडहर में से २५ वर्षीय ईमारत निकल आई हो.''

मिसेज वर्मा ने कहा, ''आप तो छा गईं, मिसेज जोशी.आप ने तो अपने पति का कायाकल्प कर के उन्हें बूढ़े बैल से गबरू सांड़ बना दिया!''

मुंहलगी सहेली बोली, ''तूने तो अपने ऊबड़-खाबड़ पति को एकदम छैल-छबीला रोमांटिक हीरो बना दिया! बड़ा ही यंग दिखने लगा है तेरा पति, यार!''

श्रीमती जोशी को अपने ऊपर गर्व हो आया. आईने में ख़ुद को निहारते हुए उन्होंने मन ही मन सोचा...'एस! आय हैव डन इट!'

अब श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे ज़्यादा क़रीब रहने लगीं. रास्ते में मिल जातीं तो बड़ी देर तक तक उनसे बातें करती रहतीं. जोशी जी अकेले में मिल जाते तो श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे लम्बी गुफ़्तगू करतीं. जब-तब उनकी सहेलियां उनके घर आ धमकतीं और जोशी जी से चिपकने लगतीं. जोशी जी में आकर्षण पैदा हो गया था क्योंकि वे जवान जो हो गए थे.

श्रीमती जोशी के शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह भी किया, ''डीयर, ज़रा जोशी जी पर निगाह रख.वे तेरे हाथ से निकलते जा रहे हैं. तेरी सहेलियां और अन्य महिलाएं उन्हें ज़्यादा तवज़्ज़ो दे रही हैं.''

श्रीमती जोशी ने शुभचिंतकों की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया. वे अपने पति की जवानी को भुना रही थीं. मोहल्ले में उनकी नाक ऊँची हो चुकी थी. उन्होंने अपने आलोचकों को करारा जवाब दे दिया था. पति की असमय जवानी ने उन्हें फिर से मोहल्ले में स्थापित कर दिया था.

सभी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, पर मोहल्ले के एकमात्र पीपल के पेड़ पर जो भूत रहता था, वह बेचैन था. उसकी वक्र-दृष्टि जोशी दम्पति पर पड़ रही थी. वह जोशी दम्पति से बहुत ख़फ़ा था.एकबार जब वह जबरन जोशी जी के घर में घुस गया था तो जोशी जी ने एक तांत्रिक को बुलाकर उसे वापस पीपल पर लटकवा दिया था. तभी से वह भूत बदले की फ़िराक में था.

जोशी जी को जवान देखकर भूत ने ठहाका लगाया...और अगले ही दिन किसी ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया, ''आजकल आपका छोटा भाई आया हुआ है क्या? कल हमने देखा कि वह आपके साथ जा रहा था.''

श्रीमती जोशी इस बार भीतर से ख़ुश होते हुए शरमाते हुए बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे 'वो' हैं. ऐसा है न बहन कि वे अपने रख-रखाव पर ज़रा ज्यादा ध्यान देते हैं.''

 पहली बार उनकी आत्मा ने उन्हें लताड़ा, ''यह क्या हो रहा है, पगली? अरे करमजली,पति को जवान बनाने के चक्कर में तूने यह क्या कर डाला? लोगों को जोशी जी तेरे भाई दिख रहे हैं...तेरी सहेलियां उनके हाथों में तुझसे राखी बंधवा देंगी!''

श्रीमती जोशी अभी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि एक और कानलगी सहेली पूछ बैठी, ''आजकल तेरा देवर आया हुआ है क्या? कल बड़ा सटकर चल रही थी उससे? यार, तेरे तो मज़े हैं!''

श्रीमती जोशी ने बात को सम्हाला, ''नहीं री, वे तो मेरे पति थे. तू तो जानती ही है कि वे अपने को कितना मेंटेन कर के रखते हैं! इसीलिए यंग दिखते हैं!''

उधर पीपल के भूत ने ठहाका लगाया, इधर श्रीमती जोशी की आत्मा ने उन्हें फिर धिक्कारा... 'अपने पैरों पर तू ने मार ली न कुल्हाड़ी? तुझे इतनी भी अकल नहीं कि पति बूढ़ा ही ठीक होता है, पगली!'

श्रीमती जोशी फिर चिंता में डूब गयीं. उन्होंने स्थितियों का जायज़ा लिया तो पाया कि पति उनके हाथों से निकलते जा रहे हैं.अब उनकी सहेलियां जोशी जी के लिए खाद्द्य सामग्री और पकवान भी भिजवाने लगी हैं. उन्होंने चिंतन-मनन किया और सहेलियों की सलाह भी ली.उनकी आत्मा ने भी निर्णय दिया कि चूँकि पति घरमालिक होता है, इसलिए उसका पत्नी से ज़्यादा बूढ़ा होना शास्त्रसम्मत है.

श्रीमती जोशी ने जोशी जी को आदेश दिया, ''तुम्हे बूढ़ा होना होगा, पति देव! तुम्हारे बालों को काला करवाने का खर्च बढ़ने लगा है. घर का महीने का बजट बिगड़ने लगा है. आगे से अब तुम अपने बाल काले नहीं करवाओगे, समझे?''

जोशी जी अभी अभी जवान हुए थे. बाल काले करवाने में चालीस रुपये महीने का खर्च था, पर फ़ायदे बहुत थे. वे हमेशा ललनाओं से घिरे रहते थे. पत्नी भी ज़्यादा डांटती नहीं थी. उन्हें अपनी जवानी में बहुत आनंद आने लगा था.

जोशी जी ने इनकार करते हुए कहा, ''नहीं प्रिये, अब मैं बूढ़ा नहीं होना चाहूँगा. भाग्यवान, मुझे तेरा भाई या देवर होना मंज़ूर है, पर तेरा बाप या ससुर होना मंज़ूर नहीं है!''

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***श्रवण कुमार उर्मलिया***

 

 

 

 

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