इस असार संसार में प्रतिभावान मनुष्यों के लिए असंख्य क्षेत्र है.जैसे की डाक्टर बनकर बीमारियों को भुनाया जा सकता है या इंजीनियर बनकर किसी अंतहीन सरकारी परियोजना में बहता पैसा खींचा जा सकता है.यदि मरीजों और देश के सौभाग्य से डाक्टर या इंजिनीयर न बन पाए,तो कम से कम वकील बनकर कानून और संविधान का दोहन तो किया ही जा सकता है.पर यदि इनमे से कोई कुछ भी न बन पाए तो ऐसी विभूतियों के लिए तुलसी दस जी पहले ही कह गए हैं :-''सकल पदारथ हैं जग माहीं,करमहीन नर पावत नाहीं''.
मैं अपने को करमहीन मानकर,अपनी इस काया को धरती का बोझ बनाये हुए निश्चिंत था.मैं अपनी तसल्ली के लिए दास मलूका की ये पंक्तियाँ दिन में एकाध बार गुनगुना लिया करता था :-''अजगर करे न चाकरी,पंछी करें न काम,दास मलूका कह गए,सबके दाता राम!'' पर मैं क्या जानूं कि ''होइहैं वही जो राम रचि राखा!'' इसलिए न जाने किस मनहूस घड़ी में,मेरी इस जन्म-जन्मान्तरों से अतृप्त और अभिशप्त आत्मा में लेखन रूपी महामारी के कीटाणु प्रवेश कर गए.मेरी आत्मा जो है,वह लेखन के कलंक से कलुषित हो गयी.
इस नाचीज़ कि लाइफ में न कोई ट्रेजिडी रही न कामेडी;न कहीं कोई कुंठा या संत्रास और न ही कोई प्यार-व्यार का चक्कर!मेरी सीधी-सादी ज़िंदगी में न कोई घुटन थी न कोई पीड़ा;न कोई सन्नाटा या अकेलापन!यहाँ तक कि किसी लेखक का डोनेट किया हुआ खून भी मेरे इस नश्वर शरीर में कभी नहीं चढ़ाया गया.फिर भी न जाने कैसे लेखन के निष्ठुर और निर्मोही कीटाणु मेरे भीटर घुसपैठ कर गए.
ज्यों-ज्यों इन कीटाणुओं कि हरकतें बढ़ती गयीं,मैं लेखन रूपी बेताल को अपनी आत्मा के कन्धों पर ढोने लगा. मेरे लेखन कि शुरुआत भी श्रृंगार-रस की कविताओं से हुई.अकाद बार ज्यादा श्रृंगार-रस के चक्कर में जब पिटने की नौबत आई,तो मन में विरह-बोध जागा.और विरह-बोध के बाद तो मैं साहित्य के सभी रस-भेद-रूपी बंदरों को सफल मदारी की तरह नचाने लगा.होते-हवाते मेरे भीतर का लेखक साहित्य की उन ऊँचाइयों को छूने लगा,जहाँ कवि की बदजात आत्मा वीर-रस में विरह-गीत और वीभत्स-रस में प्रेम-गीत का सृजन करने लगती है!
मुझे चारो और कविता के मंच ही मंच नज़र आने लगे.किसी मंच पर मैं निराला जी के कान(क्षमा याचना सहित) काट लेता,और किसी मंच पर अपना कविता-पढ़ कर पन्त जी की(क्षमा याचना सहित) नाक कुतर लेता.मेरी औघड़ प्रतिभा को देखकर एक संपादक नामक निकृष्ट जीव मेरे साहित्यिक जीवन में प्रविष्ट होते भये.
उन संपादक का अखबार छोटा था इसलिए सुविधाजनक था.क्योंकि छोटे अख़बारों में संपादन,कम्पोजिंग,प्रूफ-रीडिंग और छपाई से लेकर अखबार बांटने तक का सारा काम एक ही आदमी करता है.ऐसे अखबारों के संपादक बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं.
मेरे विधाता संपादक ने मुझसे कहा,''बरखुरदार,कविता के क्षेत्र में तो तुम अब स्थापित हो ही गए हो,इसलिए कहानियों पर जोर-आजमाइश करो !'' उनकी सलाह मानकर मैं कहानियां लिखने लगा.अब उनका कमाल देखिये कि वे इतनी खूबी से मेरी कहानियों की काट-छांट करते कि बेचारी कहानियां व्यंग्य में बदल जातीं.मुझे हैरान-परेशान देखकर वे मुझसे प्रायः कहते,''बरखुरदार,कहानी-वहानी तुम्हारे वश कि बात नहीं!तुम तो व्यंग्य लिखो,व्यंग्य!तुम्हारे भीतर मैं व्यंग्य-लेखन की जन्मजात प्रतिभा देखता हूँ!दूसरों को गाली देना और हर मामले में अपनी नाक घुसेड़ना ,ये इस देश में सबसे बड़ी प्रतिभाएं हैं!बस,देखते जाओ!हरिशंकर परसाई(क्षमा याचना सहित) के ऊपर उठने के पहले ही मैंने तुम्हे ऊपर न उठा दिया,तो कहना!''
अपनी छपास की तृप्ति होते देख मैं भी व्यंग्य में उसी तरह घुसने लगा जैसे अरहर के खेत में भैंसा घुसता है. धीरे-धीरे यह साबित होने लगा कि मैं सच्चे अर्थों में भारतीय हूँ. क्योंकि दूसरों कि छीछालेदर एवं दह-संस्कार में मुझे आत्मिक सुख मिलने लगा.मेरे संपादक संतुष्ट नज़र आये और बोले,''बहुत खूब,बरखुरदार!तुम तो पूरे शहर में काले मेघों की तरह छाते जा रहे हो! बस,समझ लो कि देश के सारे व्यंग्यकार अब गए तेल लेने!''
मेरा प्रशंसा-लोलुप क्षुद्र मन द्रुत गति से वक्री होकर हवा में उड़ने लगा.पर अपने इस अधम शरीर में स्थित,तीन ताल में निबद्ध,इस आत्मा का मैं क्या करता?यह बेचारी निरंतर दुखी रहने लगी,ठीक उस सास की तरह,जो अपनी बहू को अपनी नाक के नीचे फलता-फूलता हुआ देखकर दुखी रहती है.एक दिन मैंने अपनी आत्मा से प्रश्न किया,''अरी पगली,आत्मा!अपने क्लेश का कारण मुझसे कह तो जरा?भगवद्गीता के अनुसार तो तू नश्वर है.न तो अग्नि तुझे जला सकती है न शस्त्र तुझे छेद सकते हैं.तेरे तो मज़े ही मज़े हैं फिर इस दुःख का प्रयोजन क्या है?''
मेरी आत्मा मुझे धिक्कारते हुए बोली,''तेरे जैसे मूर्ख के शरीर में किराये का मकान लेने के तो दुःख ही अनंत हैं!अरे,नराधम,छपास की तृप्ति से ही तो पेट नहीं भरता न?साथ में पारिश्रमिक का गुड़ भी तो चाहिए!देखता नहीं,वह नरपिशाच संपादक किस तरह से तेरी रचनाओं को भुना रहा है.तू भी उससे पारिश्रमिक मांग,बुद्धू!''
आत्मा की प्रेरणा ले मैं संपादक के पास पहुंचा.मुझे देखते ही वे चहक पड़े,''वाह भाई,वाह!अपने पिछले व्यंग्य में क्या खूब करारी चोट की है तुमने!पूरा पुलिस-महकमा सन्न है!छा गए, बरखुरदार,तुम अब छा गए!साहित्याकाश अब तुम्हारे विचरण के लिए खुला हुआ है!''
मेरी आत्मा ने नेपथ्य से मेरा हौसला बढ़ाया कि मूर्ख,इसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में मत आ!अपना पारिश्रमिक मांग,पारिश्रमिक!अपने फेफड़ों में मैंने हवा भरकर कहा,''संपादक महोदय,मेरी छपास पर बड़ी तेजी से पारिश्रमिक हावी हो रहा है!मेरी आत्मा चाहती है कि मुझे पारिश्रमिक भी मिले!और चूँकि धन मिलने का मामला है,इसलिए अपनी आत्मा की बात न मानना मुझे शोभा नहीं देता!''
संपादक ने तुरंत रंग बदला,''यार,तुम्हारे घर पर अख़बार की मुफ्त प्रति भिजवा तो रहे हैं!वैसे भी इधर तुमने पुलिस-महकमे पर ज्यादा व्यंग्य लिखे हैं,जिससे शहर की पुलिस तेज़ी से इमानदार हो रही है.इसकी वज़ह से शहर में चोरी और राहजनी की घटनाएं कम होने लगी हैं!तुम समझते क्यों नहीं की इससे हमारी न्यूज़-आइटमें घटने लगी हैं!''
विना विचलित हुए मैंने कहा,''महोदय,यदि मेरा व्यक्तिगत मामला होता,तो कोई और बात थी!पर सवाल मेरी आत्मा का है!मैं उसके मामले में दखल नहीं दे सकता!पारिश्रमिक तो मुझे जरुर चाहिए,चाहे आप रोकर दें या गाकर!समझे?''
संपादक व्यंग्य से मुस्कराए,''ठीक है,बंधू!जब पारिश्रमिक के बदले तुम अपनी आत्मा को गिरवी रखना ही चाहते हो,तो मैं क्या करूँ?पर एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा,बरखुरदार!तुम्हारे व्यंग्य क़ाबिले-तारीफ़ तो हो गए हैं,पर क़ाबिले-पारिश्रमिक नहीं हुए हैं अभी!इसलिए अपने व्यंग्यों में ज़रा और पैनापन लाओ!ज़रा और नुकीला बनाओ अपने व्यंग्यों को!समझे,बरखुरदार?''
मैं कुछ दिनों तक पशोपेश में रहा.ऐसा क्या करूँ की व्यंग्यों में अतिरिक्त नुकीलापन आए?मैंने अपनी दुविधा आत्मा को बताई,तो आत्मा बोली,''अरे,उल्लू के चरखे,वह संपादक तुझे उल्लू बना रहा है!रे खल-कामी,इतना तो समझ कि इस देश के भेजों में नुकीली सुई चुभाना व्यर्थ है!इन भेजों के लिए तो वज़नदार हथौड़े चाहिए!फिर भी तू कोशिश कर के देख!निखालिस गालियां लिख,गालियां!अपने देश की देशी और स्थापित गालियां!जितनी पैनी गालियां,उतना ही व्यंग्य में पैनापन!''
मैं फिर आत्मा की बात मान हर भाषा और हर तहजीव की गालियां अपने व्यंग्यों में फिट करने लगा.अगली बार मिलते ही संपादक ने गले लगा लिया,''तुमने तो कमाल कर दिया,यार!क्या खींचा है सभी को!यत्र-तत्र-सर्वत्र सभी क्षत-विक्षत होकर तिलमिला रहे हैं!अब तो तुम सुपर व्यंग्यकार हो गए,बरखुरदार!''
मैंने धीरे से पूछा,''तो क्या अब मेरे व्यंग्य क़ाबिले-पारिश्रमिक हो गए हैं?'संपादक जी का जैसे अचानक फ्यूज उड़ गया.वे बोले,''बरखुरदार,तुम्हारी इतनी तारीफ़ें,इतना नाम,फिर भी तुम पारिश्रमिक जैसी तुच्छ चीज़ के पीछे पड़े हो!अरे अभी तो राजनीतिक पुट आया ही नहीं तुम्हारे व्यंग्यों में!बिना इसके भी कोई व्यंग्यकार कभी पूर्ण माना जा सकता है भला!इसलिए जाओ और अपने व्यंग्यों को थोडा पालिटिकल बनाओ!''
मैं परेशान होकर फिर आत्मा की शरण में गया.आत्मा ने समझाया,''घबरा मत,निशाचर!पहले जमकर सत्ता-पक्ष के खिलाफ लिख!वे मारने-पीटने आयें,तो उनसे कुछ ले-देकर विपक्ष को भ्रष्टाचारी साबित कर! यही तो इस देश में राजनीतिक व्यंग्य कहलाता है,पगले!''
मैं एकबार फिर अपनी कलम लेकर सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पिल पड़ा.कमीशन के हिसाब से मैं दोनों पक्षों के बीच पेंडुलम बन गया.संपादक इस बार मिलते ही सीधे मेरे पैरों पर गिरकर बोले,''बरखुरदार,तुम तो गुरु निकले!मुझे अपने चरणों की रज ले ही लेने दो!अब,तो बस समझ लो कि स्थापित हो गए तुम!''
मेरी आत्मा ने मुझे उत्साहित किया,''अबे लपड़बोंग,तू पारिश्रमिक मांग!संपादक कि चापलूसी को भाड़ में जाने दे!''मैंने संपादक की धूर्त आँखों में ऑंखें डालकर कहा,''तो अब तो पारिश्रमिक मिलेगा न मुझे?''
संपादक तिलमिला गए,''इतना बड़ा संपादक तुम्हारे पैरों की धूल अपने माथे से लगा रहा है!इससे बड़ा पारिश्रमिक और तुम्हे क्या चाहिए,बरखुरदार?''
मेरी आत्मा ने मुझे ललकारा,''बेटा,आज तू सारे लाज के बंधन तोड़ दे और इस संपादक के हलक़ से पारिश्रमिक उगलवा ले!आज अपना सारा दब्बूपन,सारे संस्कार,सारी सभ्यता और सारा आक्रोश अपने भीतर से निकालकर पटक दे इस संपादक पर!''मैं अपने व्यंग्यों से भी ज्यादा नुकीला बनकर चीख़ा,''संपादक के बच्चे,मुझे पारिश्रमिक चाहिए,समझे?वर्ना अपने व्यंग्यों का पैनापन आज तेरे भीतर घुसेड़ न दिया,तो कहना!''
संपादक आहिस्ता से उठे.फिर उन्होंने अपने माथे पर लगी मेरी चरण-रज को झाडा.फिर इत्मीनान से बोले,''बरखुरदार,यदि पारिश्रमिक ही देना होता,तो इस शहर में क्या तुम्ही एक लेखक हो?एक से बढ़कर एक लेखक मेरे अखबार में लिखने के लिए तरस रहे हैं! तुम्हारे घटिया व्यंग्यों ने तो मेरे अख़बार का स्तर ही चौपट कर दिया है!हुंह!ऊपर से पारिश्रमिक भी दूँ,है न?अरे,तुम्हारे जैसे लोभी लेखकों ने ही साहित्य को बदनाम कर राखा है!"
मुझे हतप्रभ छोड़ संपादक चले गए.मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा और गुनगुनाता रहा :''वो देखो मुझसे रूठकर,मेरा पारिश्रमिक जा रहा है!''
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
इस ब्लॉग में मेरी कुछ व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गयी हैं. ये रचनाएँ मेरे प्रकाशित प्रथम व्यंग्य-संग्रह ''राग बिलबिलावल'' से ली गयी हैं.मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार और विसंगतियों को मात्र शब्द दे देने से व्यंग्यकार कि ज़िम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती.जरुरत है समाज में एक ऐसी चेतना भरने की,ताकि लोग अपने छल-कपट और दोमुंहेपन को पहचानें.और उन्हें दूर करने का प्रयास करें.
Friday, June 17, 2011
Sunday, June 12, 2011
तलाश एक अदद वल्दियत की
वर्षा-ऋतु की भीनी भीनी फुहारों का आनंद लेने वाले भारतमाता की सभी वल्दियतविहीन संतानों को मेरा शत शत नमन.प्यारे भारतवासियो,तुम क्या जानो की यह बात कहते हुए मैं कितनी पीड़ा और दीनभावना से भरा
हुआ हूँ. कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है. यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता.पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है.इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है.
कहानी यह है की मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!).वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन सेपागलहै.पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है.मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज्यदा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!).कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला-''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''
पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला-''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है?मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है?हम सब भारतवासियों का बाप कौन है?जल्दी बताओ?बोलते क्यों नहीं?'' मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया,पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है.हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं की हम सब भारतमाता की संतानें हैं.जब माता है तो बाप भी होना ही चाहिए.पर बाप आखिर है कहाँ?चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया.उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की.हो सकता है,उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही,बापू कि संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!
अब समझ में आया न भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है.अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी कि वल्दियत को?सभी मुझे बिना बाप की संतानें नज़र
आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं.मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा.मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज्यदा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है.
यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है.पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे,इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है.सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह अनुसूचित बन जाता था.शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे.इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा.मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था.मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला-''यार,कुछ भी कहो,इन अंग्रेजों को रहने का सलीका आता था! देखो न,कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह!और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है.व्हाट अ डर्टी पीपल,यार!''
उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया.इसे अंग्रेजों के बनवाए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं.ऐसा लगना स्वाभाविक भी है,क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा
है.अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है.मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी-''यार,डाक्टर,तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी.पर अभी मुझे बाकि लोगों की वल्दियत तलाश करनी है,इसलिए चलूँ.''
अपने एक चिड़ीमार एक दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा-''ददुआ,तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है!तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है!अरे,आज के ज़माने में अपनी सोच,अपनी!जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़,समझा?इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद बाप ढूंढ़ रखा है.और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है.तू भी बाप तलाश कर बहती गंगा में हाथ धो.''
मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया-''निकल बे,क्या है तेरे पास?जल्दी कर!''मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा-''भाई,मुझे माफ़ करना.तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.अभी तो मेरा एक अदद बाप भी तैयार नहीं हुआ है.मैं बहुत ही निर्धन हूँ,मेरे दोस्त.पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा,तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है.है न?''
मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला-''अरे! राम! राम!! बाप का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है.अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ.तू भी उन्ही कि शरण में चला जा.जो जाकी सरनन गहे,ताहि ताहि कि लाज!'' मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया-''साहिबजी,मैं आपको अपना बाप बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ.कई दुखी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन कि बंसी बजा रहे हैं.मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये?''
वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले-''ठीक है,ठीक है!ज्यादा पट-पट करने का नईं,क्या?पहले बता,तुझे चोरी-वोरी,लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस,कोई पुराना रिकार्ड?''मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला-''सब कुछ सीख लूँगा,माई-बाप!बस,आपका आशीर्वाद चाहिए!सर पर किसी बाप का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है,सर जी!''
उद्दंड सिंह जी बोले-''क्यों बे,हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या?हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते.क्या समझा?तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय गृहमंत्री के पास चला जा.वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं.शायद वे तुझे शरण दे दें.''
मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा.वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे.एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति कि-''माननीय,आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं!सच्चा,सस्ता और टिकाऊ बाप बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं.अस्तु आप स्वयं को मेरा बाप घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें,आर्य?नहीं तो मेरा जीवन,बस समझिये कि गया तेल लेने.''
जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले-''वत्स,यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है.विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है!माननीय मुख्यमंत्री जी बहुत नाराज़ हैं.वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे,तो कैबरे कहाँ देखेंगे.अब तुम्ही कहो,वत्स,जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो,वह तुम्हारा पूजनीय बाप कैसे बन सकता है?''मैंने पूछा-''तो आप कुछ तो रह सुझाइए?कहें तो मैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पास चला जाऊं?''
वे गंभीर होकर बोले-''नहीं वत्स,वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है.तात,इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे,'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया.पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं.सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं.सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं.इसलिए तू भी यहीं कहीं कोई लोकल बाप तलाश ले.ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती,वत्स!''
जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया-''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना बाप तलाशते फिर रहे हो?बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह!और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं?याद रक्खो,यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना बाप नहीं बनाया,तो हम तुम्हे
ऐसा बना देंगे कि तुम बाप रखने लायक ही न रहो!''
भय के मरे मैं विपक्ष कि शरण में जाने कि सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और धमका गए-''बरखुरदार,हम तुम पर बराबर नज़र रखे हुए हैं!यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए,तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''
तो इस तरह,हे मेरे प्यारे देशवासियो,मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ.इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती.सभी के अपने अपने बाप हैं;अपनी अपनी बपौती है.कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता.बुरा हो उस साले पागल दोस्त का,जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया.
अभी हल ही में फिर मिला था वह पागल दोस्त.मुझे देखते ही चहककर बोला-''वाह भाई वाह,खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का बाप?आखिर नहीं मिला न?हुंह!चला था बाप खोजने!अपने को बहुत होशियार समझता है,है न?अरे,मैं तो सालों से एक अदद बाप की आस लगाये बैठा हूँ!जब मुझे अभी तक नहीं मिला,तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी बाप,बोल?अब बोल,असली पागल कौन,तू कि मैं?''
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
हुआ हूँ. कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है. यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता.पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है.इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है.
कहानी यह है की मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!).वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन सेपागलहै.पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है.मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज्यदा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!).कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला-''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''
पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला-''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है?मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है?हम सब भारतवासियों का बाप कौन है?जल्दी बताओ?बोलते क्यों नहीं?'' मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया,पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है.हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं की हम सब भारतमाता की संतानें हैं.जब माता है तो बाप भी होना ही चाहिए.पर बाप आखिर है कहाँ?चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया.उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की.हो सकता है,उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही,बापू कि संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!
अब समझ में आया न भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है.अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी कि वल्दियत को?सभी मुझे बिना बाप की संतानें नज़र
आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं.मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा.मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज्यदा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है.
यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है.पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे,इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है.सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह अनुसूचित बन जाता था.शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे.इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा.मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था.मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला-''यार,कुछ भी कहो,इन अंग्रेजों को रहने का सलीका आता था! देखो न,कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह!और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है.व्हाट अ डर्टी पीपल,यार!''
उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया.इसे अंग्रेजों के बनवाए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं.ऐसा लगना स्वाभाविक भी है,क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा
है.अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है.मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी-''यार,डाक्टर,तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी.पर अभी मुझे बाकि लोगों की वल्दियत तलाश करनी है,इसलिए चलूँ.''
अपने एक चिड़ीमार एक दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा-''ददुआ,तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है!तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है!अरे,आज के ज़माने में अपनी सोच,अपनी!जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़,समझा?इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद बाप ढूंढ़ रखा है.और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है.तू भी बाप तलाश कर बहती गंगा में हाथ धो.''
मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया-''निकल बे,क्या है तेरे पास?जल्दी कर!''मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा-''भाई,मुझे माफ़ करना.तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.अभी तो मेरा एक अदद बाप भी तैयार नहीं हुआ है.मैं बहुत ही निर्धन हूँ,मेरे दोस्त.पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा,तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है.है न?''
मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला-''अरे! राम! राम!! बाप का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है.अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ.तू भी उन्ही कि शरण में चला जा.जो जाकी सरनन गहे,ताहि ताहि कि लाज!'' मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया-''साहिबजी,मैं आपको अपना बाप बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ.कई दुखी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन कि बंसी बजा रहे हैं.मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये?''
वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले-''ठीक है,ठीक है!ज्यादा पट-पट करने का नईं,क्या?पहले बता,तुझे चोरी-वोरी,लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस,कोई पुराना रिकार्ड?''मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला-''सब कुछ सीख लूँगा,माई-बाप!बस,आपका आशीर्वाद चाहिए!सर पर किसी बाप का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है,सर जी!''
उद्दंड सिंह जी बोले-''क्यों बे,हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या?हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते.क्या समझा?तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय गृहमंत्री के पास चला जा.वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं.शायद वे तुझे शरण दे दें.''
मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा.वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे.एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति कि-''माननीय,आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं!सच्चा,सस्ता और टिकाऊ बाप बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं.अस्तु आप स्वयं को मेरा बाप घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें,आर्य?नहीं तो मेरा जीवन,बस समझिये कि गया तेल लेने.''
जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले-''वत्स,यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है.विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है!माननीय मुख्यमंत्री जी बहुत नाराज़ हैं.वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे,तो कैबरे कहाँ देखेंगे.अब तुम्ही कहो,वत्स,जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो,वह तुम्हारा पूजनीय बाप कैसे बन सकता है?''मैंने पूछा-''तो आप कुछ तो रह सुझाइए?कहें तो मैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पास चला जाऊं?''
वे गंभीर होकर बोले-''नहीं वत्स,वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है.तात,इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे,'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया.पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं.सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं.सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं.इसलिए तू भी यहीं कहीं कोई लोकल बाप तलाश ले.ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती,वत्स!''
जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया-''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना बाप तलाशते फिर रहे हो?बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह!और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं?याद रक्खो,यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना बाप नहीं बनाया,तो हम तुम्हे
ऐसा बना देंगे कि तुम बाप रखने लायक ही न रहो!''
भय के मरे मैं विपक्ष कि शरण में जाने कि सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और धमका गए-''बरखुरदार,हम तुम पर बराबर नज़र रखे हुए हैं!यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए,तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''
तो इस तरह,हे मेरे प्यारे देशवासियो,मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ.इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती.सभी के अपने अपने बाप हैं;अपनी अपनी बपौती है.कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता.बुरा हो उस साले पागल दोस्त का,जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया.
अभी हल ही में फिर मिला था वह पागल दोस्त.मुझे देखते ही चहककर बोला-''वाह भाई वाह,खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का बाप?आखिर नहीं मिला न?हुंह!चला था बाप खोजने!अपने को बहुत होशियार समझता है,है न?अरे,मैं तो सालों से एक अदद बाप की आस लगाये बैठा हूँ!जब मुझे अभी तक नहीं मिला,तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी बाप,बोल?अब बोल,असली पागल कौन,तू कि मैं?''
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Monday, May 30, 2011
वसंत-गाथा
मौसमों के पंछी निरंतर उड़ते रहते हैं और समय बीतता रहता है.कुछ मौसम बेहद शालीन होते हैं जो इत्मीनान से हमारे ऊपर से गुजर जाते हैं.पर यह जो नासपीटा वसंत है,यह हमारे ऊपर से इतना धीरे-धीरे गुजरता है,जैसे पंद्रह टन का बोझ लादे कोई ट्रक गुज़र रहा हो हमारे ऊपर से.
तन-मन में एक अजीब-सी टीस जगाता हुआ आता है वसंत.वासंती बयार जब अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाती है,तो समूचा वातावरण इस क़दर रोमांटिक हो उठता है कि यदि शुद्ध साहित्यिक भाषा में कहा जाये,तो अपने-अपने हिस्से कि गधी भी परी नज़र आने लगती है.भाईयो,यह अतिशयोक्ति नहीं है.गधी में परी कि संभावनाएं खोजना एक अनूठे किस्म का सौंदर्य-बोध है.वसंत ही इस सौंदर्य-बोध का विटामिन है.
सचमुच की परियां तो परी-कथाओं में ही होती हैं.चंद्रमुखी और मृगलोचनी भी केशवदास जी के ज़माने में हुआ करती थीं जो उन्हें 'बाबा' कहकर चिढ़ाया करती थीं.आधुनिक काल में परियों की दो ही प्रजातियाँ बच रही हैं : मां-रूपा परी और बेटी-रूपा परी.हमारे भीतर प्रवेश कर वसंत हमें आवारा किस्म के छैला का रूप दे देता है,और हम इन परियों का पीछा करने लगते हैं.मज़े ले-लेकर ये परियां आपस में चुहल करती हैं और एक दुसरे से कहती हैं,"जानती है,संध्या डीयर,आजकल वसंत चौबीसों घंटे मेरे पीछे पड़ा रहता है ! सच्ची यार,बड़ा ही क्यूट है ! और परसों तो मैंने उसे डांट ही दिया कि क्यों गधों कि तरह मेरे पीछे पड़े रहते हो !''
हो गया न सारा सौंदर्य-बोध चौपट ! जब इन परियों को हम गधे नज़र आते हैं तो हम तो गए काम से.हम सहनशीलता ओढ़े गधी को परी समझ रहे हैं और परियां इस क़दर अहसान-फ़रामोश कि वे हमें गधे की श्रेणी में रख रही हैं.खैर,सौंदर्य-बोध की यह सुविधा सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो बंधनों की बंदिशों से मुक्त हैं.शादी के बाद जब पत्नी-बोध होता है तो सारा सौंदर्य-बोध भाग खड़ा होता है.और इस खुशनुमा,मनभावन एवं चिरप्रतीक्षित वसंत में बस एक ही बोध बच रहता है : इन्कम-टैक्स रूपी सुरसा के मुंह का फैलता आकार,सभी कुछ निगल जाने को बेताब !
काली और घनी बदलियों के बीच से धीरे-धीरे निकलता हुआ भरा-पूरा चाँद कितना सुखदायक लगता है.पर वसंत के क्षितिज पर धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ इन्कम-टैक्स का गंजा चाँद ज्यों-ज्यों बढ़ता है;यह विषपायी मन डूबने लगता है.अपने आंचल में इन्कम-टैक्स की पीड़ा छिपाए रहता है यह वसंत.ऐसे में गुलमोहर और अमलतास भी मुसीबतों के दरख़्त बन जाते हैं जो दर्द के फूल लुटाने लगते हैं.
लगभग परंपरा ही बन गयी है कि मार्च का हरजाई महीना;मधुर छंदों से पूर्ण मनोहारी वसंत के बाद ही आता है.और दरख्तों से पत्ते धीरे-धीरे झड़ना शुरू हो जाते हैं.कवि-ह्रदय पति,पत्नी से कहता है,"सुप्रिये,वसंत अपनी अंगनाई में चहलकदमी कर रहा है ! मेरा फागुन मन तुम्हे देखकर बौराने लगा है,क्योंकि तुम्हारा महुआ-तन वनकन्या का श्रृंगार ओढ़े हुए है.पर बच्चों कि पढ़ाई सर पर है.परीक्षा-फीस के मेंढक टर्राने लगे है.और वह देखो,आंगन के नीम कि कुछ पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं !''
देश में शिक्षा का स्तर इतना उर्ध्व-गमन कर चुका है कि साल भर में इतने दिन कक्षाएं नहीं लगतीं,जितनी बार फ़ीस देनी पड़ती है.शिक्षण-संस्थाओं का स्तर सुधर रहा है,मास्टर-मास्टरनियां अपनी हैसियत सुधार रही हैं.छात्र-छात्राएं ज्ञान में कम,परीक्षा पास करने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं.
बच्चों कि फ़ीस से फारिग होकर पति का कवि-मन कहता है,''हे प्राण-सुधे,हमारा सपना कि इस निर्मोही शहर में 'एक बंगला बने न्यारा' अब साकार हो गया है.अपने इस नीड़ में हम तोता-मैना कि तरह खुश हैं.अपना घर खरीदकर हमने मकान-मालिकों के नखरों को दुलत्ती मार दी है.पर नगर-निगम कि मांदों से चीते निकालने ही वाले हैं,ताकि हाउस-टैक्स के नाखूनों से हमें क्षत-विक्षत कर सकें ! सारा वसंत ही लहू-लुहान होने वाला है,प्रिये !''
'होम,माय स्वीट होम !' मुहावरा विदेशों से आयात किया हुआ लगता है.यहाँ तो टैक्स भरने के बाद मन सोचता है कि काश ! यह मुआ मकान अपना न होता ! करें क्या,वसंत को तो धीरे-धीरे पतझड़ के हाथों रेहन होना ही है.
कुछ निश्चिन्त होकर पति की कोमल आत्मा कहती है,''हे रस-माधुरी,घर में रोशनी का जश्न देखता हूँ,तो तुम्हारी झील-सी गहरी आँखों में एक साथ कई-कई दीपक जल उठते हैं.पर शहर के रोशनी के ठेकेदार नींद से जागने ही वाले हैं.कहीं ऐसा न हो कि बिजली के बिलों में घुसे हुए चूहे हमारा कनेक्शन काट दें !''
इस मौसम में यदि किसी को फांसी का सम्मन मिल जाये तो वह जरा भी नहीं घबराएगा.पर बिजली का बिल देखकर आत्मा चीख़ उठती है.रोशनी का भर ढोता हुआ हर व्यथित मन वसंत कि जगह पतझड़ का बोझ ढोने लगता है अपने कन्धों पर.
अभी भी पेड़ों पर कुछ पत्तियां शेष हैं.पति अपनी पत्नी को पुचकारता है,''हे सहभागिनी,माना कि सारा साल तूने पास के हैण्ड-पम्प से बाल्टियाँ भर-भर कर तीसरी मंजिल तक चढ़ाया है,और तुझे भीगी साड़ी में देखकर मेरा चंचल मन कई-कई बार झरने-झरने हुआ है.पर कारपोरशन का पानी का बिल तो अछे-अच्छों को पानी पिला देता है.वह देखो,अब नीम के पेड़ पर कुछ ही पत्तियां रह गयी हैं.यदि पानी का बिल नहीं दिया,तो हे प्राणबल्लभे,बरसात में हम नल से गन्दगी,कीचड और केंचुओं का आनंद कैसे लेंगे ?''
सिसीफस कि तरह जब किसी तरह हम पत्थर को पहाड़ के ऊपर तक ले जाते हैं,तभी रास्ता रोक लेता है इनकम-टैक्स का तिलिस्म.जितनी आय है उससे कही ज्यादा व्यय.पर गनीमत है कि आय पर ही टैक्स लगता है.व्यय पर तो मंहगाई का टैक्स है ही ! इनकम-टैक्स के बाद सिसीफस के हाथों से फिसलकर पत्थर फिर लुढ़ककर नीचे आ जाता है.वसंत धराशायी हो जाता है और पतझड़ की बेटियां एकदम जवान नज़र आने लगती हैं.
आकंठ परिस्थितियों में डूबा पति-मन उद्गार प्रकट करता है,"हे सौंदर्य-विहीने,देखो अब नीम की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं.मैं भी अब नंगे ठूंठ की तरह दिखने लगा हूँ.अहा ! पलाश-वन अब दहकने लगे हैं !काश,हमारे वसंत में आग लगाने वाले खलनायकों का मुंह भी किंशुक-कुसुम की तरह झुलस जाता तो कितना अच्छा होता !''
प्रसाशन सजग है.ऐसे नाजुक समय में मुग़ल-गार्डेन खोल दिया जाता है ताकि जले पर नमक छिड़का जा सके.जनता की छाती पर जितने तरह के टैक्स,उससे भी ज्यादा किस्मों के दिलफरेब रंग-बिरंगे फूल.सर पर मंडराते कर्जों की याद दिलाते हरजाई फव्वारे.किसी विधवा का श्रृंगार भी क्या इतना ख़ूबसूरत होता होगा?
इसलिए,माय डीयर वसंत,अब न तेरा आना अच्छा लगता है न तेरा जाना.तुझे बुरा मानना है तो मान ले.पद्माकर महाशय को हर तरफ वसंत-ऋतु में हरियाली दिखलाई पड़ती थी.यदि उन्हें इनकम-टैक्स देना पड़ता न,तो उन्हें मालूम पड़ता की यह 'बनन और बागन में' बसंत नहीं बगरो है बल्कि चहुँओर पतझड़ ही पतझड़ पसरो है !
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
तन-मन में एक अजीब-सी टीस जगाता हुआ आता है वसंत.वासंती बयार जब अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाती है,तो समूचा वातावरण इस क़दर रोमांटिक हो उठता है कि यदि शुद्ध साहित्यिक भाषा में कहा जाये,तो अपने-अपने हिस्से कि गधी भी परी नज़र आने लगती है.भाईयो,यह अतिशयोक्ति नहीं है.गधी में परी कि संभावनाएं खोजना एक अनूठे किस्म का सौंदर्य-बोध है.वसंत ही इस सौंदर्य-बोध का विटामिन है.
सचमुच की परियां तो परी-कथाओं में ही होती हैं.चंद्रमुखी और मृगलोचनी भी केशवदास जी के ज़माने में हुआ करती थीं जो उन्हें 'बाबा' कहकर चिढ़ाया करती थीं.आधुनिक काल में परियों की दो ही प्रजातियाँ बच रही हैं : मां-रूपा परी और बेटी-रूपा परी.हमारे भीतर प्रवेश कर वसंत हमें आवारा किस्म के छैला का रूप दे देता है,और हम इन परियों का पीछा करने लगते हैं.मज़े ले-लेकर ये परियां आपस में चुहल करती हैं और एक दुसरे से कहती हैं,"जानती है,संध्या डीयर,आजकल वसंत चौबीसों घंटे मेरे पीछे पड़ा रहता है ! सच्ची यार,बड़ा ही क्यूट है ! और परसों तो मैंने उसे डांट ही दिया कि क्यों गधों कि तरह मेरे पीछे पड़े रहते हो !''
हो गया न सारा सौंदर्य-बोध चौपट ! जब इन परियों को हम गधे नज़र आते हैं तो हम तो गए काम से.हम सहनशीलता ओढ़े गधी को परी समझ रहे हैं और परियां इस क़दर अहसान-फ़रामोश कि वे हमें गधे की श्रेणी में रख रही हैं.खैर,सौंदर्य-बोध की यह सुविधा सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो बंधनों की बंदिशों से मुक्त हैं.शादी के बाद जब पत्नी-बोध होता है तो सारा सौंदर्य-बोध भाग खड़ा होता है.और इस खुशनुमा,मनभावन एवं चिरप्रतीक्षित वसंत में बस एक ही बोध बच रहता है : इन्कम-टैक्स रूपी सुरसा के मुंह का फैलता आकार,सभी कुछ निगल जाने को बेताब !
काली और घनी बदलियों के बीच से धीरे-धीरे निकलता हुआ भरा-पूरा चाँद कितना सुखदायक लगता है.पर वसंत के क्षितिज पर धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ इन्कम-टैक्स का गंजा चाँद ज्यों-ज्यों बढ़ता है;यह विषपायी मन डूबने लगता है.अपने आंचल में इन्कम-टैक्स की पीड़ा छिपाए रहता है यह वसंत.ऐसे में गुलमोहर और अमलतास भी मुसीबतों के दरख़्त बन जाते हैं जो दर्द के फूल लुटाने लगते हैं.
लगभग परंपरा ही बन गयी है कि मार्च का हरजाई महीना;मधुर छंदों से पूर्ण मनोहारी वसंत के बाद ही आता है.और दरख्तों से पत्ते धीरे-धीरे झड़ना शुरू हो जाते हैं.कवि-ह्रदय पति,पत्नी से कहता है,"सुप्रिये,वसंत अपनी अंगनाई में चहलकदमी कर रहा है ! मेरा फागुन मन तुम्हे देखकर बौराने लगा है,क्योंकि तुम्हारा महुआ-तन वनकन्या का श्रृंगार ओढ़े हुए है.पर बच्चों कि पढ़ाई सर पर है.परीक्षा-फीस के मेंढक टर्राने लगे है.और वह देखो,आंगन के नीम कि कुछ पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं !''
देश में शिक्षा का स्तर इतना उर्ध्व-गमन कर चुका है कि साल भर में इतने दिन कक्षाएं नहीं लगतीं,जितनी बार फ़ीस देनी पड़ती है.शिक्षण-संस्थाओं का स्तर सुधर रहा है,मास्टर-मास्टरनियां अपनी हैसियत सुधार रही हैं.छात्र-छात्राएं ज्ञान में कम,परीक्षा पास करने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं.
बच्चों कि फ़ीस से फारिग होकर पति का कवि-मन कहता है,''हे प्राण-सुधे,हमारा सपना कि इस निर्मोही शहर में 'एक बंगला बने न्यारा' अब साकार हो गया है.अपने इस नीड़ में हम तोता-मैना कि तरह खुश हैं.अपना घर खरीदकर हमने मकान-मालिकों के नखरों को दुलत्ती मार दी है.पर नगर-निगम कि मांदों से चीते निकालने ही वाले हैं,ताकि हाउस-टैक्स के नाखूनों से हमें क्षत-विक्षत कर सकें ! सारा वसंत ही लहू-लुहान होने वाला है,प्रिये !''
'होम,माय स्वीट होम !' मुहावरा विदेशों से आयात किया हुआ लगता है.यहाँ तो टैक्स भरने के बाद मन सोचता है कि काश ! यह मुआ मकान अपना न होता ! करें क्या,वसंत को तो धीरे-धीरे पतझड़ के हाथों रेहन होना ही है.
कुछ निश्चिन्त होकर पति की कोमल आत्मा कहती है,''हे रस-माधुरी,घर में रोशनी का जश्न देखता हूँ,तो तुम्हारी झील-सी गहरी आँखों में एक साथ कई-कई दीपक जल उठते हैं.पर शहर के रोशनी के ठेकेदार नींद से जागने ही वाले हैं.कहीं ऐसा न हो कि बिजली के बिलों में घुसे हुए चूहे हमारा कनेक्शन काट दें !''
इस मौसम में यदि किसी को फांसी का सम्मन मिल जाये तो वह जरा भी नहीं घबराएगा.पर बिजली का बिल देखकर आत्मा चीख़ उठती है.रोशनी का भर ढोता हुआ हर व्यथित मन वसंत कि जगह पतझड़ का बोझ ढोने लगता है अपने कन्धों पर.
अभी भी पेड़ों पर कुछ पत्तियां शेष हैं.पति अपनी पत्नी को पुचकारता है,''हे सहभागिनी,माना कि सारा साल तूने पास के हैण्ड-पम्प से बाल्टियाँ भर-भर कर तीसरी मंजिल तक चढ़ाया है,और तुझे भीगी साड़ी में देखकर मेरा चंचल मन कई-कई बार झरने-झरने हुआ है.पर कारपोरशन का पानी का बिल तो अछे-अच्छों को पानी पिला देता है.वह देखो,अब नीम के पेड़ पर कुछ ही पत्तियां रह गयी हैं.यदि पानी का बिल नहीं दिया,तो हे प्राणबल्लभे,बरसात में हम नल से गन्दगी,कीचड और केंचुओं का आनंद कैसे लेंगे ?''
सिसीफस कि तरह जब किसी तरह हम पत्थर को पहाड़ के ऊपर तक ले जाते हैं,तभी रास्ता रोक लेता है इनकम-टैक्स का तिलिस्म.जितनी आय है उससे कही ज्यादा व्यय.पर गनीमत है कि आय पर ही टैक्स लगता है.व्यय पर तो मंहगाई का टैक्स है ही ! इनकम-टैक्स के बाद सिसीफस के हाथों से फिसलकर पत्थर फिर लुढ़ककर नीचे आ जाता है.वसंत धराशायी हो जाता है और पतझड़ की बेटियां एकदम जवान नज़र आने लगती हैं.
आकंठ परिस्थितियों में डूबा पति-मन उद्गार प्रकट करता है,"हे सौंदर्य-विहीने,देखो अब नीम की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं.मैं भी अब नंगे ठूंठ की तरह दिखने लगा हूँ.अहा ! पलाश-वन अब दहकने लगे हैं !काश,हमारे वसंत में आग लगाने वाले खलनायकों का मुंह भी किंशुक-कुसुम की तरह झुलस जाता तो कितना अच्छा होता !''
प्रसाशन सजग है.ऐसे नाजुक समय में मुग़ल-गार्डेन खोल दिया जाता है ताकि जले पर नमक छिड़का जा सके.जनता की छाती पर जितने तरह के टैक्स,उससे भी ज्यादा किस्मों के दिलफरेब रंग-बिरंगे फूल.सर पर मंडराते कर्जों की याद दिलाते हरजाई फव्वारे.किसी विधवा का श्रृंगार भी क्या इतना ख़ूबसूरत होता होगा?
इसलिए,माय डीयर वसंत,अब न तेरा आना अच्छा लगता है न तेरा जाना.तुझे बुरा मानना है तो मान ले.पद्माकर महाशय को हर तरफ वसंत-ऋतु में हरियाली दिखलाई पड़ती थी.यदि उन्हें इनकम-टैक्स देना पड़ता न,तो उन्हें मालूम पड़ता की यह 'बनन और बागन में' बसंत नहीं बगरो है बल्कि चहुँओर पतझड़ ही पतझड़ पसरो है !
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Saturday, May 28, 2011
मन की ऑंखें खोल,बाबा!
मैंने अपने गुरु के आगे शंका प्रकट की,"प्रभु,ये जो हमें जागती आँखों से दिखता है,वह सत्य है या सपना?"
गुरु अपने चेहरे पर अनुभव की अतिरिक्त झुर्रियां ओढ़ते हुए बोले,"मेरे होनहार शिष्य,अपनी लघु शंका का समाधान सुन!अरे मूर्ख,यदि देखना ही है तो अपनी ऑंखें बंद करके देख.अपनी मन की ऑंखें खोल और अपने ज्ञान-चक्षुओं का सदुपयोग कर.खुली आँखों से तो हर ऐरा-गैरा देख लेता है,पगले!"
चूँकि अपने देश में गुरु को गोविन्द से बड़ा मानने की परंपरा रही है,इसलिए मैंने अपने गुरु का मार्गदर्शन स्वीकार कर प्रैक्टिस शुरू कर दी.मैं अपने ज्ञान-चक्षुओं का उपयोग कर सभी कुछ देखने का प्रयास करने लगा.देखते ही देखते कुछ दिनों के अभ्यास से मेरी अंतर्दृष्टि खुल गयी.अब मुझे ऑंखें बंद करने के बाद भी ज्ञान-चक्षुओं के स्क्रीन पर सभी कुछ साफ-साफ नज़र आने लगा.
मुहल्ले के एक परिचित सज्जन मिले और अतिरिक्त उत्साह से बोले,"देखा आपने,भाई साहब!मैं जानता था कि एक दिन ऐसा होकर रहेगा!आखिर बनवारीलाल कि बिटिया उस लफंगे के साथ भाग ही गयी न?"उनके चेहरे पर इस बात का गहरा अफ़सोस झलक रहा था कि वह लड़की इनके साथ क्यों नहीं भागी.मैंने कहा,"हाँ भाई,यह तो देखा मैंने.पर पिछले हफ़्ते आपकी जवान बेटी भी तो रातभर घर से गायब रही थी?वह बात तो आपने किसी को नहीं बताई होगी?" वे सज्जन बोले,"यार,बैंक का ज़रूरी काम याद आ गया.मैं चलता हूँ." कहकर वे उड़नछू हो गए.
पड़ोस के ही एक और सज्जन मेरे पास आए और बोले,"घोर कलयुग आ गया है,भैया!अब तो देखा नहीं जाता!मुहल्ले में बहुत बड़ा अनर्थ हो रहा है.वो बबुआइन है न ससुरी,उस दूधवाले से नैन-मटक्का कर रही है!साला,क्या ज़माना आ गया है.भैया,अपने से तो यह सब देखा नहीं जाता!" मैंने कहा,"नहीं देखा जाता तो अपनी ऑंखें फोड़ लीजिये!" वे उदास होकर बोले,"हम सब बुद्धिजीवियों को मिलकर ही तो समाज कि इन बुराइयों को दूर करना है.मुहल्ले में सभी बहू-बेटियों वाले इज्ज़तदार लोग हैं.हमें तो इन बुराइयों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए." मैंने मुस्कराते हुए कहा,"भाई साहब,वही दूधवाला तो आपके घर में भी दूध देता है न?मैं तो अपने ज्ञान-चक्षुओं के माध्यम से स्पष्ट देख रहा हूँ कि उस दूधवाले से नैन-मटक्का करने के लिए बबुआइन और आपकी जोरू में होड़ लगी है." मेरी बात सुनकर वे सज्जन भी समाज की बुराइयाँ भूलकर भाग खड़े हुए.
एक तीसरे सज्जन मिले और बहुत अधिक ख़ुशी व्यक्त करते हुए बोले,"सुना आपने?यह तो गज़ब ही हो गया!मुहल्ले की भूरी कुतिया ने एक साथ पांच पिल्लों को जन्म दिया है!" अपने बच्चों के जन्म पर भी इनके चेहरे पर कभी इतनी ख़ुशी नहीं देखी गयी.मैंने कहा,"कुतिया ने पांच पिल्ले जने,इसमें आपकी परेशानी का तो कोई कारण नहीं होना चाहिए?" वे निराश होकर बोले,"भाई,आप भी हद करते हैं!अरे,यह अपने मुहल्ले का मामला है.कहीं पेपर-वेपर में छपवाइए न!चलिए,पहले देखकर आते हैं." मैं बोला,"मुझे कहीं आने-जाने की ज़रूरत नहीं.मैं तो यहाँ से बैठे-बैठे ही सब कुछ देख रहा हूँ." वे आश्चर्यचकित हुए.मैं भला बैठे-बैठे ही सब कुछ कैसे देख रहा हूँ?कहीं मेरी अंतर्दृष्टि तो नहीं जागृत हो गयी?वे सज्जन इस बात का प्रचार करने मुहल्ले वालों के पास चले गए.
मुहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गयी.सबने जान लिया की मेरे गत-चक्षु सजग हो गए हैं.मेरे एक मित्र मुझसे बोले,"सुना है तुम आजकल अपने ज्ञान-चक्षुओं से देख रहे हो?" "तुमने बिलकुल ठीक सुना है." मैंने कहा,"क्योंकि मैं कुछ भी देखने के लिए इस देश में पूर्णरूप से स्वतंत्र हूँ." वे शंकित होते हुए बोले,"अच्छा बताओ तो,मेरे घर में इस समय क्या हो रहा है?" अपनी आँखों को मूंदते हुए मैंने कहना शुरू किया,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी बच्ची को गोद में लिए आपकी नौकरानी पड़ोसी के नौकर से ऑंखें लड़ा रही है.और घर पर आपकी पतिव्रता धर्मपत्नी अपने जवान अलसेशियन कुत्ते को अपनी गोद में बिठाकर बड़े प्यार से बिस्कुट खिला रही है." उन्हें मेरे ज्ञान-चक्षुओं पर भरोसा हो गया और वे चुपचाप खिसक गए.
मास्टर रामचरण जी मेरे पास आए और उन्होंने पूछा,"आज आपने अपनी अंतर्दृष्टि से क्या-क्या देखा?" मैंने उन्हें बताया,"आज मैंने देखा कि आप जब स्कूल से घर लौटे,तो आपकी बीबी ने आपको चाय नहीं दी.क्योंकि आपके घर में चीनी ख़त्म हो गयी है.घर में तेल,आटा और दाल भी ख़त्म हो गए हैं.आपकी बेटियों ने कपड़ों के लिए तकाज़ा भी किया.पर आप कोई आश्वासन नहीं दे पाए क्योंकि तनख्वाह वाला दिन अभी दूर है.परिवार के प्रति मानसिक संवेदनाएं आपको इन दिनों परेशान कर रही हैं.ऐसे में अपनी कक्षा की छात्राओं में आप सुकून तलाश रहे हैं." मास्टर जी को भी पक्का भरोसा हो गया कि मैं अंतर्यामी हो गया हूँ.वे भी डरकर भाग खड़े हुए.
एक निम्न-मध्यमवर्गीय भी आए और पूछने लगे,"इधर आप क्या कुछ नया देख रहे हैं?" मैंने वीतरागी मुद्रा धारण करते हुए कहा,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी होनहार बेटी माँ बनाने वाली है,और आप नाना बनने के कगार पर हैं.पर आप बेहद चिंतित हैं क्योंकि आपकी लाड़ली बेटी अविवाहित है." वे भी उड़न-छू हो गए.अब मेरे पास कोई नहीं आता.सभी बेहद डरे हुए हैं.उनके भय का कारण है कि मैं अपनी दिव्यदृष्टि से वह सब देख रहा हूँ जो लोग छिपाना चाहते हैं.अभी परसों की ही बात है.मेरी एक तथाकथित भाभी हैं जो सौंदर्य के मामले में पिकासो के नारी-चित्रों का मुक़ाबला करती हैं.मैंने उन्हें गहनों से लदा हुआ देखा तो पूछ बैठा," भाभी,लगता है भाई साहब आजकल धड़ाधड़ ठेकेदारों का बिल पास कर रहे हैं.और ये आपके झुमके तो कमाल हैं!" भाभी चहकते हुए बोलीं,"ठीक समझे,देवर जी.ये झुमके उन्होंने ही लाकर दिए हैं.पुरे डेढ़ तोले के हैं.अच्छे हैं न?बताओ भला,तुम्हारी अंतर्दृष्टि क्या कहती है?"
मैंने कहा,"मेरी अंतर्दृष्टि तो कहती है कि अपने दफ़्तर की एक महिला टाईपिस्ट को भैया ने पूरे दो तोले के झुमके दिलवाए हैं.इतना ही नहीं,बल्कि वह बेचारी तो उन झुमकों की कीमत भी चुका रही है.अब इतना तो आप समझती ही हैं न कि वह कीमत कैसे चुका रही होगी?" मेरी बातें सुनकर पहले भाभी के नथुने फूले,फिर उनकी भृकुटियाँ तन गयीं.और फिर क्रोध से उनका चेहरा एम.एफ़.हुसैन के घोड़ों जैसा हो गया.वे अपने पति कि ख़बर लेने के लिए घर कि तरफ भागीं.
शाम को भाभी के धर्मपति तशरीफ़ लाये.आते ही बिफर उठे,"क्या मजाक लगा रखा है,यार!बीबियों को भड़काते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती?खैर,जा हहरी बीबी को हमारे बारे में बताया है तो कुछ हमें भी हमारी बीबी के बारे में बताओ?" मैंने उन्हें बताया,"अब इसके बारे में तो तुम्हे घूंस देने वाले ठेकेदार ही बताएँगे,जिनके साथ वे पिक्चर देखती हैं." मेरे मित्र भी अपने नथुने फड़काते हुए अपनी बीबी की ख़बर लेने चल पड़े.
बात मुहल्ले तक ही रहती तो अच्छा होता.पर धीरे-धीरे मेरी अंतर्दृष्टि की ख्याति पूरे शहर में फ़ैल गयी.शीघ्र ही इस ख्याति के परिणाम आने भी शुरू हो गए.अधि रात को इलाके का सबसे बड़ा डाकू मेरे घर आया और धमकाकर बोला,"पंडित जी,हमें सेठ किरोड़ीमल के यहाँ डाका डालना है.आप अपनी ज्ञान-चक्षुओं से देखकर बताइए की माल कहाँ-कहाँ पर छिपा कर रखा गया है?डकैती में मिलने वाले माल का एक-चौथाई आप को बतौर कमीशन दिया जायेगा." मैंने डकैत को सही-सही जानकारी दे दी और लूट के माल का एक-चौथाई ले लिया.
डकैती का पता लगाने के लिए पुलिस भी मेरे पास आई.मैंने डाकू का पता-ठिकाना बताकर सरकारी इनाम भी झटक लिया.ठीक लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं की तरह जो पहले दंगे करवाते हैं और फिर उन्हें शांत करवाकर यश लूट लेते हैं.
मेरी मुसीबतें थोडा और आगे बढीं.एक रात कुछ दादा टाइप के लोग मेरे घर में घुस आए.वे सभी समाजवादी पहनावा पहने हुए थे.उनके मुखिया ने पण की जुगाली करते हुए कहा,"हम लोग दद्दा भाऊ के दल के हैं.हाल ही में हम लोगों ने एक बलात्कार किया हैगा.तन्ने कुछ देक्खा तो नहीं?" मई बोला,"कहो तो वह जगह भी बता दूँ,जहाँ पर आप लोगों ने लड़की की लाश को गदा है?" दल का एक सदस्य उखड़ गया और मुझे धमकाते हुए बोला,"बता के देख तो भला,उल्लू के चरखे?कसम दद्दा भाऊ की,तेरी भी लाश को वहीँ न दफना दिया तो कहना!यदि भला चाहता है तो अपनी जबान बंद ही रखना,नहीं तो तेरी अंतर्दृष्टि हम तेरे भीतर घुसेड देंगे,समझा?" वे चले गए पर मैं बुरी तरह से घबड़ा गया.
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.दिनों-दिन मेरे हालात बदतर होते गए.एक रात नगर-सेठ लल्लूमल-कल्लूदास के यहाँ छापा पड़ गया.मेरे पास कुछ लोकतान्त्रिक किस्म के गुंडे आए और मुझे धमका गए,"बेटा,हम जानते हैं कि सेठ जी के गोदामों की जानकारी तूने ही शासन को दी है.हम तुझे देख लेंगे!"
नगर के शराब के अड्डों पर छापे मारे गए.ख़ाकी वर्दियों वाले आए और धमकाकर चले गए,"अबे,आजकल तू बहुत देखने लगा है!स्साले,तूने तो हमारा पूरा धंधा ही चौपट कर दिया.तूने हमारी ऊपरी आमदनी और मुफ़्त की दारू,दोनों बंद करवा दी.हम तुझे चैन से जीने नहीं देंगे!"
शहर के रेड-लाइट एरिया में छापे पड़े और वैश्यालय बंद करवा दिए गए. 'नारी सरंक्षण समिति' के परोपकारी लफंगे भी आकर मेरा पानी उतार गए,"यह क्या कर दिया आपने,पंडित जी?इतनी सारी माँ-बहनों के पेटपर अपनी दिव्य-दृष्टि के सहारे लात मरवा दी आपने?इस देश में नारियों का उद्धार क्या आप का बाप करेगा,बोलिए?लगता है,हमें आप का दाह-संस्कार करना ही पड़ेगा,पंडित जी!"
इन सब घटनाओं से ऊबकर मैंने सोचा कि मौन साध लूँ.मैंने कोशिश भी की पर विपक्ष वाले मुझे झिंझोड़ने लगे,"पंडित जी,आजकल आप चोरों,कालाबाजारियों और असामाजिक तत्वों की सूचना सरकार को न देकर देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं." सत्ता-पक्ष वाले भी लगातार मुझे कोंचने लगे,"पंडित जी,आप को रहना हमारे ही शासन में है,समझे?देश जाये ऐसी-कम-तैसी में!यदि आपने हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था से खिलवाड़ किया तो हम विपक्ष वालों की तरह आपका जीना भी मुश्किल कर देंगे!"
हालत कुछ ऐसे हो गए कि मैं विपक्ष के आश्वासनों और सत्ता-पक्ष की धमकियों के बीच त्रिशंकु बन गया.मेरे ज्ञान-चक्षु मेरे लिए अभिशाप बन गए.मुझे फिर आपने गुरु की याद आई.मैंने उनसे गुहार लगायी,"गुरुवर,इस अंतर्दृष्टि ने तो मेरी नींद हराम कर दी है!मुझे इस संकट से उबारिये,गुरुदेव!"
गुरु ने मुझे धिक्कारते हुए कहा,"मूर्ख शिष्य,मैं देख रहा हूँ कि तू सचमुच मुश्किलों में फंस गया है.तेरी अंतर्दृष्टि की वज़ह से देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है.जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई चोरी न कर सके,डाके न डाल सके;बलात्कार न कर सके,कालाबाजारी न कर सके;शराब,जुएँ और वैश्यावृत्ति के अड्डे न चला सके-किस काम का ऐसा लोकतंत्र!अतः,हे शिष्य तू आपने ज्ञान-चक्षुओं को क्लोज कर ले.जो कुछ खुली आँखों से दिखता है,तू भी वही देख.इस देश में सच्चा लोकतान्त्रिक बनकर जीने में ही भलाई है,पगले!"
गुरु ने मेरी समस्या सुलझा दी.मैंने उनके चरण छुए तो उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में मुझसे मेरा अंगूठा माँगा.सच्चा लोकतान्त्रिक होने की वज़ह से मैंने उन्हें अपना ठेंगा(अंगूठा) दिखा दिया.
@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@
गुरु अपने चेहरे पर अनुभव की अतिरिक्त झुर्रियां ओढ़ते हुए बोले,"मेरे होनहार शिष्य,अपनी लघु शंका का समाधान सुन!अरे मूर्ख,यदि देखना ही है तो अपनी ऑंखें बंद करके देख.अपनी मन की ऑंखें खोल और अपने ज्ञान-चक्षुओं का सदुपयोग कर.खुली आँखों से तो हर ऐरा-गैरा देख लेता है,पगले!"
चूँकि अपने देश में गुरु को गोविन्द से बड़ा मानने की परंपरा रही है,इसलिए मैंने अपने गुरु का मार्गदर्शन स्वीकार कर प्रैक्टिस शुरू कर दी.मैं अपने ज्ञान-चक्षुओं का उपयोग कर सभी कुछ देखने का प्रयास करने लगा.देखते ही देखते कुछ दिनों के अभ्यास से मेरी अंतर्दृष्टि खुल गयी.अब मुझे ऑंखें बंद करने के बाद भी ज्ञान-चक्षुओं के स्क्रीन पर सभी कुछ साफ-साफ नज़र आने लगा.
मुहल्ले के एक परिचित सज्जन मिले और अतिरिक्त उत्साह से बोले,"देखा आपने,भाई साहब!मैं जानता था कि एक दिन ऐसा होकर रहेगा!आखिर बनवारीलाल कि बिटिया उस लफंगे के साथ भाग ही गयी न?"उनके चेहरे पर इस बात का गहरा अफ़सोस झलक रहा था कि वह लड़की इनके साथ क्यों नहीं भागी.मैंने कहा,"हाँ भाई,यह तो देखा मैंने.पर पिछले हफ़्ते आपकी जवान बेटी भी तो रातभर घर से गायब रही थी?वह बात तो आपने किसी को नहीं बताई होगी?" वे सज्जन बोले,"यार,बैंक का ज़रूरी काम याद आ गया.मैं चलता हूँ." कहकर वे उड़नछू हो गए.
पड़ोस के ही एक और सज्जन मेरे पास आए और बोले,"घोर कलयुग आ गया है,भैया!अब तो देखा नहीं जाता!मुहल्ले में बहुत बड़ा अनर्थ हो रहा है.वो बबुआइन है न ससुरी,उस दूधवाले से नैन-मटक्का कर रही है!साला,क्या ज़माना आ गया है.भैया,अपने से तो यह सब देखा नहीं जाता!" मैंने कहा,"नहीं देखा जाता तो अपनी ऑंखें फोड़ लीजिये!" वे उदास होकर बोले,"हम सब बुद्धिजीवियों को मिलकर ही तो समाज कि इन बुराइयों को दूर करना है.मुहल्ले में सभी बहू-बेटियों वाले इज्ज़तदार लोग हैं.हमें तो इन बुराइयों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए." मैंने मुस्कराते हुए कहा,"भाई साहब,वही दूधवाला तो आपके घर में भी दूध देता है न?मैं तो अपने ज्ञान-चक्षुओं के माध्यम से स्पष्ट देख रहा हूँ कि उस दूधवाले से नैन-मटक्का करने के लिए बबुआइन और आपकी जोरू में होड़ लगी है." मेरी बात सुनकर वे सज्जन भी समाज की बुराइयाँ भूलकर भाग खड़े हुए.
एक तीसरे सज्जन मिले और बहुत अधिक ख़ुशी व्यक्त करते हुए बोले,"सुना आपने?यह तो गज़ब ही हो गया!मुहल्ले की भूरी कुतिया ने एक साथ पांच पिल्लों को जन्म दिया है!" अपने बच्चों के जन्म पर भी इनके चेहरे पर कभी इतनी ख़ुशी नहीं देखी गयी.मैंने कहा,"कुतिया ने पांच पिल्ले जने,इसमें आपकी परेशानी का तो कोई कारण नहीं होना चाहिए?" वे निराश होकर बोले,"भाई,आप भी हद करते हैं!अरे,यह अपने मुहल्ले का मामला है.कहीं पेपर-वेपर में छपवाइए न!चलिए,पहले देखकर आते हैं." मैं बोला,"मुझे कहीं आने-जाने की ज़रूरत नहीं.मैं तो यहाँ से बैठे-बैठे ही सब कुछ देख रहा हूँ." वे आश्चर्यचकित हुए.मैं भला बैठे-बैठे ही सब कुछ कैसे देख रहा हूँ?कहीं मेरी अंतर्दृष्टि तो नहीं जागृत हो गयी?वे सज्जन इस बात का प्रचार करने मुहल्ले वालों के पास चले गए.
मुहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गयी.सबने जान लिया की मेरे गत-चक्षु सजग हो गए हैं.मेरे एक मित्र मुझसे बोले,"सुना है तुम आजकल अपने ज्ञान-चक्षुओं से देख रहे हो?" "तुमने बिलकुल ठीक सुना है." मैंने कहा,"क्योंकि मैं कुछ भी देखने के लिए इस देश में पूर्णरूप से स्वतंत्र हूँ." वे शंकित होते हुए बोले,"अच्छा बताओ तो,मेरे घर में इस समय क्या हो रहा है?" अपनी आँखों को मूंदते हुए मैंने कहना शुरू किया,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी बच्ची को गोद में लिए आपकी नौकरानी पड़ोसी के नौकर से ऑंखें लड़ा रही है.और घर पर आपकी पतिव्रता धर्मपत्नी अपने जवान अलसेशियन कुत्ते को अपनी गोद में बिठाकर बड़े प्यार से बिस्कुट खिला रही है." उन्हें मेरे ज्ञान-चक्षुओं पर भरोसा हो गया और वे चुपचाप खिसक गए.
मास्टर रामचरण जी मेरे पास आए और उन्होंने पूछा,"आज आपने अपनी अंतर्दृष्टि से क्या-क्या देखा?" मैंने उन्हें बताया,"आज मैंने देखा कि आप जब स्कूल से घर लौटे,तो आपकी बीबी ने आपको चाय नहीं दी.क्योंकि आपके घर में चीनी ख़त्म हो गयी है.घर में तेल,आटा और दाल भी ख़त्म हो गए हैं.आपकी बेटियों ने कपड़ों के लिए तकाज़ा भी किया.पर आप कोई आश्वासन नहीं दे पाए क्योंकि तनख्वाह वाला दिन अभी दूर है.परिवार के प्रति मानसिक संवेदनाएं आपको इन दिनों परेशान कर रही हैं.ऐसे में अपनी कक्षा की छात्राओं में आप सुकून तलाश रहे हैं." मास्टर जी को भी पक्का भरोसा हो गया कि मैं अंतर्यामी हो गया हूँ.वे भी डरकर भाग खड़े हुए.
एक निम्न-मध्यमवर्गीय भी आए और पूछने लगे,"इधर आप क्या कुछ नया देख रहे हैं?" मैंने वीतरागी मुद्रा धारण करते हुए कहा,"मैं देख रहा हूँ कि आपकी होनहार बेटी माँ बनाने वाली है,और आप नाना बनने के कगार पर हैं.पर आप बेहद चिंतित हैं क्योंकि आपकी लाड़ली बेटी अविवाहित है." वे भी उड़न-छू हो गए.अब मेरे पास कोई नहीं आता.सभी बेहद डरे हुए हैं.उनके भय का कारण है कि मैं अपनी दिव्यदृष्टि से वह सब देख रहा हूँ जो लोग छिपाना चाहते हैं.अभी परसों की ही बात है.मेरी एक तथाकथित भाभी हैं जो सौंदर्य के मामले में पिकासो के नारी-चित्रों का मुक़ाबला करती हैं.मैंने उन्हें गहनों से लदा हुआ देखा तो पूछ बैठा," भाभी,लगता है भाई साहब आजकल धड़ाधड़ ठेकेदारों का बिल पास कर रहे हैं.और ये आपके झुमके तो कमाल हैं!" भाभी चहकते हुए बोलीं,"ठीक समझे,देवर जी.ये झुमके उन्होंने ही लाकर दिए हैं.पुरे डेढ़ तोले के हैं.अच्छे हैं न?बताओ भला,तुम्हारी अंतर्दृष्टि क्या कहती है?"
मैंने कहा,"मेरी अंतर्दृष्टि तो कहती है कि अपने दफ़्तर की एक महिला टाईपिस्ट को भैया ने पूरे दो तोले के झुमके दिलवाए हैं.इतना ही नहीं,बल्कि वह बेचारी तो उन झुमकों की कीमत भी चुका रही है.अब इतना तो आप समझती ही हैं न कि वह कीमत कैसे चुका रही होगी?" मेरी बातें सुनकर पहले भाभी के नथुने फूले,फिर उनकी भृकुटियाँ तन गयीं.और फिर क्रोध से उनका चेहरा एम.एफ़.हुसैन के घोड़ों जैसा हो गया.वे अपने पति कि ख़बर लेने के लिए घर कि तरफ भागीं.
शाम को भाभी के धर्मपति तशरीफ़ लाये.आते ही बिफर उठे,"क्या मजाक लगा रखा है,यार!बीबियों को भड़काते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती?खैर,जा हहरी बीबी को हमारे बारे में बताया है तो कुछ हमें भी हमारी बीबी के बारे में बताओ?" मैंने उन्हें बताया,"अब इसके बारे में तो तुम्हे घूंस देने वाले ठेकेदार ही बताएँगे,जिनके साथ वे पिक्चर देखती हैं." मेरे मित्र भी अपने नथुने फड़काते हुए अपनी बीबी की ख़बर लेने चल पड़े.
बात मुहल्ले तक ही रहती तो अच्छा होता.पर धीरे-धीरे मेरी अंतर्दृष्टि की ख्याति पूरे शहर में फ़ैल गयी.शीघ्र ही इस ख्याति के परिणाम आने भी शुरू हो गए.अधि रात को इलाके का सबसे बड़ा डाकू मेरे घर आया और धमकाकर बोला,"पंडित जी,हमें सेठ किरोड़ीमल के यहाँ डाका डालना है.आप अपनी ज्ञान-चक्षुओं से देखकर बताइए की माल कहाँ-कहाँ पर छिपा कर रखा गया है?डकैती में मिलने वाले माल का एक-चौथाई आप को बतौर कमीशन दिया जायेगा." मैंने डकैत को सही-सही जानकारी दे दी और लूट के माल का एक-चौथाई ले लिया.
डकैती का पता लगाने के लिए पुलिस भी मेरे पास आई.मैंने डाकू का पता-ठिकाना बताकर सरकारी इनाम भी झटक लिया.ठीक लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं की तरह जो पहले दंगे करवाते हैं और फिर उन्हें शांत करवाकर यश लूट लेते हैं.
मेरी मुसीबतें थोडा और आगे बढीं.एक रात कुछ दादा टाइप के लोग मेरे घर में घुस आए.वे सभी समाजवादी पहनावा पहने हुए थे.उनके मुखिया ने पण की जुगाली करते हुए कहा,"हम लोग दद्दा भाऊ के दल के हैं.हाल ही में हम लोगों ने एक बलात्कार किया हैगा.तन्ने कुछ देक्खा तो नहीं?" मई बोला,"कहो तो वह जगह भी बता दूँ,जहाँ पर आप लोगों ने लड़की की लाश को गदा है?" दल का एक सदस्य उखड़ गया और मुझे धमकाते हुए बोला,"बता के देख तो भला,उल्लू के चरखे?कसम दद्दा भाऊ की,तेरी भी लाश को वहीँ न दफना दिया तो कहना!यदि भला चाहता है तो अपनी जबान बंद ही रखना,नहीं तो तेरी अंतर्दृष्टि हम तेरे भीतर घुसेड देंगे,समझा?" वे चले गए पर मैं बुरी तरह से घबड़ा गया.
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.दिनों-दिन मेरे हालात बदतर होते गए.एक रात नगर-सेठ लल्लूमल-कल्लूदास के यहाँ छापा पड़ गया.मेरे पास कुछ लोकतान्त्रिक किस्म के गुंडे आए और मुझे धमका गए,"बेटा,हम जानते हैं कि सेठ जी के गोदामों की जानकारी तूने ही शासन को दी है.हम तुझे देख लेंगे!"
नगर के शराब के अड्डों पर छापे मारे गए.ख़ाकी वर्दियों वाले आए और धमकाकर चले गए,"अबे,आजकल तू बहुत देखने लगा है!स्साले,तूने तो हमारा पूरा धंधा ही चौपट कर दिया.तूने हमारी ऊपरी आमदनी और मुफ़्त की दारू,दोनों बंद करवा दी.हम तुझे चैन से जीने नहीं देंगे!"
शहर के रेड-लाइट एरिया में छापे पड़े और वैश्यालय बंद करवा दिए गए. 'नारी सरंक्षण समिति' के परोपकारी लफंगे भी आकर मेरा पानी उतार गए,"यह क्या कर दिया आपने,पंडित जी?इतनी सारी माँ-बहनों के पेटपर अपनी दिव्य-दृष्टि के सहारे लात मरवा दी आपने?इस देश में नारियों का उद्धार क्या आप का बाप करेगा,बोलिए?लगता है,हमें आप का दाह-संस्कार करना ही पड़ेगा,पंडित जी!"
इन सब घटनाओं से ऊबकर मैंने सोचा कि मौन साध लूँ.मैंने कोशिश भी की पर विपक्ष वाले मुझे झिंझोड़ने लगे,"पंडित जी,आजकल आप चोरों,कालाबाजारियों और असामाजिक तत्वों की सूचना सरकार को न देकर देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं." सत्ता-पक्ष वाले भी लगातार मुझे कोंचने लगे,"पंडित जी,आप को रहना हमारे ही शासन में है,समझे?देश जाये ऐसी-कम-तैसी में!यदि आपने हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था से खिलवाड़ किया तो हम विपक्ष वालों की तरह आपका जीना भी मुश्किल कर देंगे!"
हालत कुछ ऐसे हो गए कि मैं विपक्ष के आश्वासनों और सत्ता-पक्ष की धमकियों के बीच त्रिशंकु बन गया.मेरे ज्ञान-चक्षु मेरे लिए अभिशाप बन गए.मुझे फिर आपने गुरु की याद आई.मैंने उनसे गुहार लगायी,"गुरुवर,इस अंतर्दृष्टि ने तो मेरी नींद हराम कर दी है!मुझे इस संकट से उबारिये,गुरुदेव!"
गुरु ने मुझे धिक्कारते हुए कहा,"मूर्ख शिष्य,मैं देख रहा हूँ कि तू सचमुच मुश्किलों में फंस गया है.तेरी अंतर्दृष्टि की वज़ह से देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है.जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई चोरी न कर सके,डाके न डाल सके;बलात्कार न कर सके,कालाबाजारी न कर सके;शराब,जुएँ और वैश्यावृत्ति के अड्डे न चला सके-किस काम का ऐसा लोकतंत्र!अतः,हे शिष्य तू आपने ज्ञान-चक्षुओं को क्लोज कर ले.जो कुछ खुली आँखों से दिखता है,तू भी वही देख.इस देश में सच्चा लोकतान्त्रिक बनकर जीने में ही भलाई है,पगले!"
गुरु ने मेरी समस्या सुलझा दी.मैंने उनके चरण छुए तो उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में मुझसे मेरा अंगूठा माँगा.सच्चा लोकतान्त्रिक होने की वज़ह से मैंने उन्हें अपना ठेंगा(अंगूठा) दिखा दिया.
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Thursday, May 26, 2011
एक शाट-सर्किट हमारे दफ्तर में भी...
हाल के वर्षों में अपने देश में शाट-सर्किट बड़ी तेज़ी से सक्रिय हुआ है.इसकी वज़ह से बहुमंजिली इमारतों में आग लग जाया करती है.आग भी उसी इमारत में लगती है जहाँ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ रखे होते हैं.आग लगने के बाद जब सब कुछ जलकर राख हो जाता है तब अग्नि-शमन दल मौका-ए-वारदात पर पहुंचकर बड़ी खूबी से आग पर काबू पा लेता है.इसके बाद बाकायदा आग लगने के कारणों की जाँच होती है, जिसमे हर बार बेचारा शाट-सर्किट गिरफ़्तार कर लिया जाता है.
अब कुछ मूढ़ और शक्की किस्म के लोग तो हमारे समाज में होते ही हैं,जो इस शाट-सर्किट वाली थ्योरी को पचा नहीं पाते.ऐसे लोग कब्ज़ से पीड़ित होते हैं और ठीक से अपना खाना भी नहीं पचा पाते.ये लोग हो-हल्ला मचाते हैं कि दाल में कुछ काला है;आग जानबूझकर लगायी गयी है ताकि घपले वाले रिकॉर्ड नष्ट किये जा सकें.पर कहीं कोई भी प्रमाण नहीं मिलते और अंततः शाट-सर्किट ही दोषी पाया जाता है.ऐसे मूढ़ लोगों के लिए प्रस्तुत है हमारे दफ़्तर की शाट-सर्किट कथा ताकि इन्हें शाट-सर्किट की करतूतों पर भरोसा हो जाये:
"जो गर्व और ख़ुशी 'हार की जीत' वाले बाबा भारती को अपना ऊँचा-पूरा घोड़ा देखकर होती रही होगी,कुछ वैसी ही ख़ुशी छलकने लगती थी हमारे टकले और कुम्भकर्णी सूरत वाले बॉस के मुखमंडल पर जब वे अपनी व्यक्तिगत सहायक मिस चंद्रमुखी को देख लेते थे.बाबा भारती प्यार से अपने घोड़े की पीठ थपथपा सकते थे;स्नेह से उसे पुचकार सकते थे और सुबह-शाम उसकी सवारी कर सकते थे.दुर्भाग्य से बॉस को मिस चंद्रमुखी के मामले में ऐसी सुविधाएँ नहीं थीं जिससे उनके भीतर हीनता की भावना उत्पन्न होती थी.उस हीनता से बचने के लिए बॉस द्रौपदी के चीर जैसे लम्बे लम्बे डिक्टेशन देते थे ताकि मिस चंद्रमुखी का अधिकाधिक सानिद्ध्य पाया जा सके.
बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच भावनाओं और विचारों का तारतम्य अभी ठीक से जम नहीं पाया था,इसलिए दोनों ध्रुवों के बीच सर्किट पूरा नहीं हो पा रहा था.परिणामस्वरूप करेंट जो था वह दोनों के बीच बह नहीं पा रहा था.उधर बॉस प्रयास कर रहे थे कि वे अपने पूरे हार्सपावर को वोल्टेज में बदल लें.इसके लिए वे अपने मातहतों को इतनी जोर से डाँटते थे कि मातहतों के द्वारा मूत्रालय का ज्यादा से ज्यादा उपयोग होने लगा था.बॉस का वोल्टेज बढ़ रहा था और लोग अटकलें लगा रहे थे कि जल्दी ही बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच विद्युत्-धारा प्रवाहित होने लगेगी.पर दो प्राणी रूपी ध्रुवों के बीच क्या यह इतना आसान है!इतिहास बताता है कि जब भी पुरुष और नारी के बीच सर्किट पूरा होने लगता है,कोई न कोई बीच में घुसकर उत्पात मचने लगता है.
प्रेमी और प्रेमिका के बीच जुड़े हुए तार पर प्रेमी का बाप कैंची चला देता है.बेटे-बहू के बीच पनपने वाले सर्किट का फ्यूज पत्नी की सास पूरी जिम्मेदारी से उड़ा देती है.इतिहास गवाह है कि हीर-राँझा,शीरी-फ़रहाद,ससी-पुन्नो,सोनी-महिवाल इत्यादि किसी भी जोड़े का सर्किट कभी पूरा नहीं हो पाया.हमारे दफ़्तर में भी इतिहास अपने आप को दुहराने लगा.बॉस का मुंह लगा चपरासी था बाबू लाल जिसे अभिजात्य का टच देने के लिए प्यून कहा जाता था.एक दो बार उसे बिजली का झटका लग चुका था,इसलिए उसे वोल्टेज और करेंट से बहुत डर लगता था.जब उसे पता चला कि बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच करेंट बहने ही वाला है तो वह सर्किट को शाट करने के लिए तैयार हो गया.
एक दिन वह सभी के सामने मिस चंद्रमुखी से बोला,''चद्रमुखी बाई जी,इत्ते लम्बे-लम्बे डिटेक्शन न लिया करो.सच्ची,इतना न थकाया करो अपनी काया को.!''मिस चंद्रमुखी हंसकर बोली,"अरे बुद्धू,'डिटेक्शन' नहीं,इसे 'डिक्टेशन' कहते हैं.पर तू क्यों परेशान होता है?तू तो बस बीड़ियाँ फूंक और मस्त रह."
बाबू लाल ने सभी को सुनाकर कहा,"हम क्यों परेशान होंगे,मैडम जी.हमको क्या करना है.अब तो जो कुछ करेगा,बॉस ही करेगा." सभी हंस पड़े तो मिस चंद्रमुखी को बुरा लगा.एक पिद्दी से चपरासी की इतनी मजाल!उसके भीतर का वोल्टेज सुगबुगाया और बाबू लाल का कटाक्ष मीडियम-वेव पर बॉस के कानों तक पंहुच गया.बॉस ने बाबू लाल को अपने केबिन में बुलाकर हडकाया.बॉस के केबिन से गुस्से में भरा हुआ बाबू लाल निकला और तीर की तरह मिस चंद्रमुखी के पास पहुंचकर बोला,"जे अच्छा नहीं किया तुमने,मैडम!इस लफंगे बॉस से तुमने मुझे डांट खिलवायी?तुम समझती क्या हो मुझे?हम भी चपरासी हैं,चपरासी! कौनो अफ़सर नहीं हैं जो तुम्हरे बॉस से डरें!" इसके बाद बॉस और चंद्रमुखी के बीच फिर रेडियो-लिंक स्थापित हुआ और अगले ही दिन बाबू लाल के नाम 'कारण बताओ नोटिस' जरी हो गया.
बाबूलाल फिर मिस चंद्रमुखी से मुखातिब होकर बोला,"मेरा सम्मन निकलवा दिया न उस उल्लू के पट्ठे से!हो गयी तुम्हारी तसल्ली?अब देखो तुम दोनों की मैं कैसे तुम दोनों की तसल्ली करता हूँ.ऐसा कारण बताऊंगा की वह तकला भी याद रखेगा और तुम भी!" बाबू लाल का लिखित जवाब पा कर बॉस बौखलाया.उसका नाम सीधे-सीधे मिस चंद्रमुखी से जोड़ा गया था.बॉस ने भी पैंतरा बदला.उसने मिस चंद्रमुखी से बयान ले लिया कि बाबू लाल ने उस(मिस चंद्रमुखी) के साथ बदतमीजी की.इसी आधार पर बॉस ने बाबू लाल को चार्ज-शीट दे दी.
बाबू लाल ने फिर प्रेमपूर्वक मिस चंद्रमुखी को फटकारा,"बड़ा ऊँचा खेल खेल रही हो,मैडम!डिटेक्शन के बहने जब वह बुड्ढा दिनभर तुम्हे अपने केबिन में छेड़ता रहता है,तब तो तुमने कभी उसके खिलाफ लिखकर नहीं दिया?और मुझ जैसे इज्जतदार को मुफ्त में फंसवा रही हो?छेड़-छाड़ का असली मज़ा तो तुम अब लोगी,मैडम!मैं अब बदनाम तो हो ही गया हूँ!'' इस बार बाबू लाल की तरफ से कर्मचारी यूनियन ने जवाब दिया.प्रबंधन पर बाबू लाल को परेशान करने के आरोप लगाये गए.बॉस पर आरोप लगा की वह जब-तब मातहतों को गन्दी-गन्दी गलियां देता है.और बाबू लाल से वह दारू मंगवाता है.इमानदार बाबू लाल जब न कहता है तो बॉस उसे तंग करता है.
बॉस भी हार मानने वाला नहीं था.उसने फिर चंद्रमुखी से लिखित में लिया की बाबू लाल चंद्रमुखी को अब खुले आम आंख मारता है और अश्लील हरकतें करता है.इतना ही नहीं,बल्कि उसने चंद्रमुखी को देख लेने की धमकी भी दी है और चंद्रमुखी की जान को खतरा है.इस आधार पर एक और चार्ज-शीट मिल गयी बाबूलाल को.इस बार बाबू लाल मिस चंद्रमुखी के सुन्दर चेहरे पर बीड़ी का धुआं फेंकते हुए बोला,"बहुत ही भोली हो तुम,मैडम.मेरे से पंगा ले रही हो,तो सावधान रहना.तुम्हे तो नहीं पर तुम्हारे खूसट बॉस को जरुर मारूंगा!मेरी नौकरी जाये या रहे,पर मैं तुम दोनों के बीच कभी कनेक्शन नहीं होने दूंगा,समझी?जाके कह दो अपने टकलू से."
इस बार यूनियन ने भी बाबू लाल से लिखवा लिया और जवाब में लिखा की असल में धमकी तो बाबू लाल जैसे मेहनती और इमानदार कामगार को बॉस ने दी है.बॉस से उसकी पी. एस. मिस चंद्रमुखी की इज्ज़त को खतरा है और बाबूलाल एक जागरूक नागरिक होने के नाते एक बहन की इज्ज़त बचाना चाहता है.इसीलिए बॉस उससे चिढ़ता है और उसे धमकाता है.यूनियन ने जवाब की एक कापी लेबर कमिश्नर को भी भेज दी.
किसी भी दफ़्तर में जब इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल निकालता है तो टी.वी. के विज्ञापनों की तरह कभी ख़त्म ही नहीं होता.देखते ही देखते बाबू लाल के इस केस की फाईल भी बहुत मोटी हो गयी.कभी बॉस-चन्द्रमुखी का पलड़ा भारी हो जाता और लगता कि उनके बीच सर्किट पूरा हो जायेगा,साथ ही बाबू लाल की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.कभी लगता कि यूनियन की वज़ह से बाबू लाल भारी पड़ रहा है.आखिर खेल ख़त्म करने के लिए बाबू लाल ने पैंतरा फेंका.उसने घोषणा की की चंद्रमुखी जैसी बहन की इज्ज़त बचाने के लिए और बॉस की ज्यादतियों के खिलाफ वह आत्मदाह करेगा.बात प्रशासन और प्रेस तक पहुंचा दी गयी.मामला गंभीर हो गया.बॉस का वोल्टेज थोड़ा कम हुआ.लगा की वह समझौते के मूड में आ गया है.उधर इस वातावरण को थोड़ा अमली जामा पहनाने के लिए मिस चंद्रमुखी ने अपना मेक-अप कम कर दिया.अब वह बॉस की पी.एस. कम,उनकी बेटी ज्यादा नज़र आने लगी.
एक दिन मिस चंद्रमुखी बाबू लाल से उदास हो कर बोली,"बाबू लाल भैया,इस बहन की इज्जत और कितना उछालोगे,बोलो तो?एक प्यारे भाई का आत्मदाह मैं कैसे देख पाऊँगी?'' मिस चंद्रमुखी की आंख में पानी आ गया.बाबू लाल ठहरा चपरासी.अपनी बीबी के उदास होने पर वह चाहे कभी न पिघला हो,पर मिस चंद्रमुखी के सामने वह मोम बनकर बोला,"अब तो इस भाई की नौकरी तुम्ही बचा सकती हो,बहन.बॉस से कहो की वह जमीन पर आ जाये और मैं भी सभी कुछ भूल जाने को तैयार हूँ."
इस तरह दफ़्तर में बॉस,मिस चंद्रमुखी,बाबू लाल और यूनियन सभी मामले को रफा-दफा करने को तैयार हो गए.पर मामला रफा-दफा हो कैसे?केस की मोटी फाईल बीच में तंग अड़ाने लगी.विद्वान कहते हैं की आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है.माईकल फैराडे ने विद्युत् का अविष्कार कर डाला पर उसने सपनों में भी नहीं सोचा होगा की आगे बचल्कर सर्किट की जगह शाट-सर्किट ज्यादा उपयोगी सिद्ध होगा.अचानक एक शाम दफ़्तर के सर्किटों में वोल्टेज बढ़ गया.शाट-सर्किट की वज़ह से आग लग गयी.कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जल गए.बाबू लाल की फाईल को तो जलना ही था."
आशा है यह वृतांत पढ़कर उन तमाम शक्की मूढों की तसल्ली हो जाएगी.
अब कुछ मूढ़ और शक्की किस्म के लोग तो हमारे समाज में होते ही हैं,जो इस शाट-सर्किट वाली थ्योरी को पचा नहीं पाते.ऐसे लोग कब्ज़ से पीड़ित होते हैं और ठीक से अपना खाना भी नहीं पचा पाते.ये लोग हो-हल्ला मचाते हैं कि दाल में कुछ काला है;आग जानबूझकर लगायी गयी है ताकि घपले वाले रिकॉर्ड नष्ट किये जा सकें.पर कहीं कोई भी प्रमाण नहीं मिलते और अंततः शाट-सर्किट ही दोषी पाया जाता है.ऐसे मूढ़ लोगों के लिए प्रस्तुत है हमारे दफ़्तर की शाट-सर्किट कथा ताकि इन्हें शाट-सर्किट की करतूतों पर भरोसा हो जाये:
"जो गर्व और ख़ुशी 'हार की जीत' वाले बाबा भारती को अपना ऊँचा-पूरा घोड़ा देखकर होती रही होगी,कुछ वैसी ही ख़ुशी छलकने लगती थी हमारे टकले और कुम्भकर्णी सूरत वाले बॉस के मुखमंडल पर जब वे अपनी व्यक्तिगत सहायक मिस चंद्रमुखी को देख लेते थे.बाबा भारती प्यार से अपने घोड़े की पीठ थपथपा सकते थे;स्नेह से उसे पुचकार सकते थे और सुबह-शाम उसकी सवारी कर सकते थे.दुर्भाग्य से बॉस को मिस चंद्रमुखी के मामले में ऐसी सुविधाएँ नहीं थीं जिससे उनके भीतर हीनता की भावना उत्पन्न होती थी.उस हीनता से बचने के लिए बॉस द्रौपदी के चीर जैसे लम्बे लम्बे डिक्टेशन देते थे ताकि मिस चंद्रमुखी का अधिकाधिक सानिद्ध्य पाया जा सके.
बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच भावनाओं और विचारों का तारतम्य अभी ठीक से जम नहीं पाया था,इसलिए दोनों ध्रुवों के बीच सर्किट पूरा नहीं हो पा रहा था.परिणामस्वरूप करेंट जो था वह दोनों के बीच बह नहीं पा रहा था.उधर बॉस प्रयास कर रहे थे कि वे अपने पूरे हार्सपावर को वोल्टेज में बदल लें.इसके लिए वे अपने मातहतों को इतनी जोर से डाँटते थे कि मातहतों के द्वारा मूत्रालय का ज्यादा से ज्यादा उपयोग होने लगा था.बॉस का वोल्टेज बढ़ रहा था और लोग अटकलें लगा रहे थे कि जल्दी ही बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच विद्युत्-धारा प्रवाहित होने लगेगी.पर दो प्राणी रूपी ध्रुवों के बीच क्या यह इतना आसान है!इतिहास बताता है कि जब भी पुरुष और नारी के बीच सर्किट पूरा होने लगता है,कोई न कोई बीच में घुसकर उत्पात मचने लगता है.
प्रेमी और प्रेमिका के बीच जुड़े हुए तार पर प्रेमी का बाप कैंची चला देता है.बेटे-बहू के बीच पनपने वाले सर्किट का फ्यूज पत्नी की सास पूरी जिम्मेदारी से उड़ा देती है.इतिहास गवाह है कि हीर-राँझा,शीरी-फ़रहाद,ससी-पुन्नो,सोनी-महिवाल इत्यादि किसी भी जोड़े का सर्किट कभी पूरा नहीं हो पाया.हमारे दफ़्तर में भी इतिहास अपने आप को दुहराने लगा.बॉस का मुंह लगा चपरासी था बाबू लाल जिसे अभिजात्य का टच देने के लिए प्यून कहा जाता था.एक दो बार उसे बिजली का झटका लग चुका था,इसलिए उसे वोल्टेज और करेंट से बहुत डर लगता था.जब उसे पता चला कि बॉस और मिस चंद्रमुखी के बीच करेंट बहने ही वाला है तो वह सर्किट को शाट करने के लिए तैयार हो गया.
एक दिन वह सभी के सामने मिस चंद्रमुखी से बोला,''चद्रमुखी बाई जी,इत्ते लम्बे-लम्बे डिटेक्शन न लिया करो.सच्ची,इतना न थकाया करो अपनी काया को.!''मिस चंद्रमुखी हंसकर बोली,"अरे बुद्धू,'डिटेक्शन' नहीं,इसे 'डिक्टेशन' कहते हैं.पर तू क्यों परेशान होता है?तू तो बस बीड़ियाँ फूंक और मस्त रह."
बाबू लाल ने सभी को सुनाकर कहा,"हम क्यों परेशान होंगे,मैडम जी.हमको क्या करना है.अब तो जो कुछ करेगा,बॉस ही करेगा." सभी हंस पड़े तो मिस चंद्रमुखी को बुरा लगा.एक पिद्दी से चपरासी की इतनी मजाल!उसके भीतर का वोल्टेज सुगबुगाया और बाबू लाल का कटाक्ष मीडियम-वेव पर बॉस के कानों तक पंहुच गया.बॉस ने बाबू लाल को अपने केबिन में बुलाकर हडकाया.बॉस के केबिन से गुस्से में भरा हुआ बाबू लाल निकला और तीर की तरह मिस चंद्रमुखी के पास पहुंचकर बोला,"जे अच्छा नहीं किया तुमने,मैडम!इस लफंगे बॉस से तुमने मुझे डांट खिलवायी?तुम समझती क्या हो मुझे?हम भी चपरासी हैं,चपरासी! कौनो अफ़सर नहीं हैं जो तुम्हरे बॉस से डरें!" इसके बाद बॉस और चंद्रमुखी के बीच फिर रेडियो-लिंक स्थापित हुआ और अगले ही दिन बाबू लाल के नाम 'कारण बताओ नोटिस' जरी हो गया.
बाबूलाल फिर मिस चंद्रमुखी से मुखातिब होकर बोला,"मेरा सम्मन निकलवा दिया न उस उल्लू के पट्ठे से!हो गयी तुम्हारी तसल्ली?अब देखो तुम दोनों की मैं कैसे तुम दोनों की तसल्ली करता हूँ.ऐसा कारण बताऊंगा की वह तकला भी याद रखेगा और तुम भी!" बाबू लाल का लिखित जवाब पा कर बॉस बौखलाया.उसका नाम सीधे-सीधे मिस चंद्रमुखी से जोड़ा गया था.बॉस ने भी पैंतरा बदला.उसने मिस चंद्रमुखी से बयान ले लिया कि बाबू लाल ने उस(मिस चंद्रमुखी) के साथ बदतमीजी की.इसी आधार पर बॉस ने बाबू लाल को चार्ज-शीट दे दी.
बाबू लाल ने फिर प्रेमपूर्वक मिस चंद्रमुखी को फटकारा,"बड़ा ऊँचा खेल खेल रही हो,मैडम!डिटेक्शन के बहने जब वह बुड्ढा दिनभर तुम्हे अपने केबिन में छेड़ता रहता है,तब तो तुमने कभी उसके खिलाफ लिखकर नहीं दिया?और मुझ जैसे इज्जतदार को मुफ्त में फंसवा रही हो?छेड़-छाड़ का असली मज़ा तो तुम अब लोगी,मैडम!मैं अब बदनाम तो हो ही गया हूँ!'' इस बार बाबू लाल की तरफ से कर्मचारी यूनियन ने जवाब दिया.प्रबंधन पर बाबू लाल को परेशान करने के आरोप लगाये गए.बॉस पर आरोप लगा की वह जब-तब मातहतों को गन्दी-गन्दी गलियां देता है.और बाबू लाल से वह दारू मंगवाता है.इमानदार बाबू लाल जब न कहता है तो बॉस उसे तंग करता है.
बॉस भी हार मानने वाला नहीं था.उसने फिर चंद्रमुखी से लिखित में लिया की बाबू लाल चंद्रमुखी को अब खुले आम आंख मारता है और अश्लील हरकतें करता है.इतना ही नहीं,बल्कि उसने चंद्रमुखी को देख लेने की धमकी भी दी है और चंद्रमुखी की जान को खतरा है.इस आधार पर एक और चार्ज-शीट मिल गयी बाबूलाल को.इस बार बाबू लाल मिस चंद्रमुखी के सुन्दर चेहरे पर बीड़ी का धुआं फेंकते हुए बोला,"बहुत ही भोली हो तुम,मैडम.मेरे से पंगा ले रही हो,तो सावधान रहना.तुम्हे तो नहीं पर तुम्हारे खूसट बॉस को जरुर मारूंगा!मेरी नौकरी जाये या रहे,पर मैं तुम दोनों के बीच कभी कनेक्शन नहीं होने दूंगा,समझी?जाके कह दो अपने टकलू से."
इस बार यूनियन ने भी बाबू लाल से लिखवा लिया और जवाब में लिखा की असल में धमकी तो बाबू लाल जैसे मेहनती और इमानदार कामगार को बॉस ने दी है.बॉस से उसकी पी. एस. मिस चंद्रमुखी की इज्ज़त को खतरा है और बाबूलाल एक जागरूक नागरिक होने के नाते एक बहन की इज्ज़त बचाना चाहता है.इसीलिए बॉस उससे चिढ़ता है और उसे धमकाता है.यूनियन ने जवाब की एक कापी लेबर कमिश्नर को भी भेज दी.
किसी भी दफ़्तर में जब इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल निकालता है तो टी.वी. के विज्ञापनों की तरह कभी ख़त्म ही नहीं होता.देखते ही देखते बाबू लाल के इस केस की फाईल भी बहुत मोटी हो गयी.कभी बॉस-चन्द्रमुखी का पलड़ा भारी हो जाता और लगता कि उनके बीच सर्किट पूरा हो जायेगा,साथ ही बाबू लाल की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.कभी लगता कि यूनियन की वज़ह से बाबू लाल भारी पड़ रहा है.आखिर खेल ख़त्म करने के लिए बाबू लाल ने पैंतरा फेंका.उसने घोषणा की की चंद्रमुखी जैसी बहन की इज्ज़त बचाने के लिए और बॉस की ज्यादतियों के खिलाफ वह आत्मदाह करेगा.बात प्रशासन और प्रेस तक पहुंचा दी गयी.मामला गंभीर हो गया.बॉस का वोल्टेज थोड़ा कम हुआ.लगा की वह समझौते के मूड में आ गया है.उधर इस वातावरण को थोड़ा अमली जामा पहनाने के लिए मिस चंद्रमुखी ने अपना मेक-अप कम कर दिया.अब वह बॉस की पी.एस. कम,उनकी बेटी ज्यादा नज़र आने लगी.
एक दिन मिस चंद्रमुखी बाबू लाल से उदास हो कर बोली,"बाबू लाल भैया,इस बहन की इज्जत और कितना उछालोगे,बोलो तो?एक प्यारे भाई का आत्मदाह मैं कैसे देख पाऊँगी?'' मिस चंद्रमुखी की आंख में पानी आ गया.बाबू लाल ठहरा चपरासी.अपनी बीबी के उदास होने पर वह चाहे कभी न पिघला हो,पर मिस चंद्रमुखी के सामने वह मोम बनकर बोला,"अब तो इस भाई की नौकरी तुम्ही बचा सकती हो,बहन.बॉस से कहो की वह जमीन पर आ जाये और मैं भी सभी कुछ भूल जाने को तैयार हूँ."
इस तरह दफ़्तर में बॉस,मिस चंद्रमुखी,बाबू लाल और यूनियन सभी मामले को रफा-दफा करने को तैयार हो गए.पर मामला रफा-दफा हो कैसे?केस की मोटी फाईल बीच में तंग अड़ाने लगी.विद्वान कहते हैं की आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है.माईकल फैराडे ने विद्युत् का अविष्कार कर डाला पर उसने सपनों में भी नहीं सोचा होगा की आगे बचल्कर सर्किट की जगह शाट-सर्किट ज्यादा उपयोगी सिद्ध होगा.अचानक एक शाम दफ़्तर के सर्किटों में वोल्टेज बढ़ गया.शाट-सर्किट की वज़ह से आग लग गयी.कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जल गए.बाबू लाल की फाईल को तो जलना ही था."
आशा है यह वृतांत पढ़कर उन तमाम शक्की मूढों की तसल्ली हो जाएगी.
Friday, May 20, 2011
एक पत्र कुम्भकर्ण भैया के नाम
प्रिय भैया कुम्भकर्ण जी,
एक विशालकाय नमस्कार!
अत्र कुशलं तत्रास्तु.यदि आप जागृतावस्था में हुए तो इस अकिंचन का पत्र आपको स्वस्थ एवं सानंद पायेगा क्योंकि आप श्रीलंका के माल-पानी और ढोर-ढंगरों को उदरस्थ कर रहे होंगे.और यदि आप गहन निंद्रा में हुए तो मेरा पत्र निश्चय ही श्रीलंका के चर-अचर को कुशलपूर्वक पायेगा.
भैया,अभी हाल ही में मैंने दूरदर्शन द्वारा प्रसारित ''रामायण'' नमक सीरियल में आपका रोल देखा था.आप गहन निद्रा में थे और चूँकि श्रीलंका में राम-रावण युद्ध की वजह से इमरजेंसी की घोषणा हो चुकी थी,इसलिए आपको जगाया जा रहा था.इस चक्कर में रामानंद सागर जी को दूरदर्शन के पूरे आधे घंटे बर्बाद करने पड़े.बड़ी मुश्किल से आप जागे भी तो भोजन-सामग्रियों की ख़ुशबू से.और जागते ही आप बिना ब्रश किये भोजन पर पिल पड़े.आपके टूथ-ब्रश का साइज़ देखने की तमन्ना मन में ही रह गयी
आप की प्रतिभा को देखकर ही मैं आपको पत्र लिखने के लिए विवश हो गया हूँ.आप जैसे महान नींद-प्रेमी को पत्र लिखकर मैं अपने आप को धन्य महसूस कर रहा हूँ.हम भारतवासियों ने सुना है की आप जनवरी से जून तक सोते हैं और जुलाई से दिसम्बर तक निरंतर अपनी उदरपूर्ति में लीन रहते हैं.इन जागृतावस्था वाले छः महीनों में तो आप श्रीलंका की आधी आबादी खा जाते होंगे?
मैं आपके अग्रज रावण जी को बहुत बुद्धिमान नहीं मानता था.पर जबसे सुना है कि उन्होंने आपकी छः महीनों की नींद का वरदान माँगा था,तबसे मैं उनसे बुरी तरह प्रभावित हूँ.उन्होंने सगे भाई की लम्बी नींद का वरदान मांगकर श्रीलंकावासियों की खाद्द्य-समस्या सुलझा ली.यदि आपको इन बातों की जानकारी न हो तो कृपया श्रीलंका की पुरानी फाईलें देख लें.
एक राज़ की बात कहना चाहूँगा.रावण जी के सिद्धांत भले ही बहुत ऊँचे हों,पर बहुत कच्चे हैं.राजनीतिक समीकरणों से एकदम उल्टे.वे भाई का पेट काटकर जनता का ख़याल रखते हैं.अपने इधर ऐसा ग़लत रिवाज़ नहीं है.हमारे देश के स्वनामधन्य राजा पहले अपने वन्धु-वान्धवों का पेट भरते हैं.जनता के हाथ सिर्फ़ जूठन ही आ पाती है.हमारे यहाँ राजा को इतनी फ़ुर्सत ही नहीं कि वह जनता के बारे में सोचे.
रावण जी की बस एक ही उच्च कोटि की नीति हमारे देश में पसंद की जाती है और वह स्वस्थ नीति है दूसरों की जवान और सुन्दर बीबियों को अपने देश में स्मगल करना.हमारा देश अभी इस सीमा तक प्रगतिशील नहीं हुआ है इसलिए हमारी स्मगलिंग नशीले पदार्थों तक ही सीमित है.हमारे देश का नशा-उन्मूलन दल ही इन पदार्थों का ज्यादा सेवन करता है.
खैर,इन मुद्दों को जाने दीजिये.मैं असली मुद्दे पर आता हूँ.आप हमारे यहाँ अपनी महान नींद की वज़ह से जाने जाते हैं.आप गहरी और लम्बी नींद का पर्याय बन गए हैं.कुम्भकर्णी नींद एक परंपरा बन गयी है और हमारे देश ने इस परंपरा को कला के स्तर तक पंहुचा दिया है.मैं आपके रेफरेंस के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ.
हमारे देश का शासन जो संस्था चलाती है उसे सरकार कहते हैं.संभवतः सरोकार से उपजा यह शब्द नींद का श्रृंगार पाकर ऊँघने का पर्याय बन गया है.जनतारुपी महासागर को चुनाव के पर्वत से मथने पर सरकार का आविर्भाव होता है.इस मंथन से भ्रष्टाचार नामक रत्न भी निकलता है जिसे जनप्रतिनिधियों में अमृत की तरह बाँट दिया जाता है.सत्ता में आने के बाद सरकार पांच सालों के लिए कुम्भकर्णी नींद ओढ़कर सो जाती है.
सरकार का मुखिया,विभिन्न क्षेत्रों से चुनकर आए,अपने नाम दादागिरी और गुंडागर्दी का कीर्तिमान रखनेवाले जनप्रतिनिधियों को प्रमुख विभागों का कार्यभार सौंपकर निश्चिन्त हो जाता है.इसके बाद मुखिया दूसरे देशों की समस्याएं सुलझाने में व्यस्त हो जाता है.
इसके बाद गृह-मंत्री गृह-कलह के योगदान और निदान में व्यस्त हो जाता है.रक्षा-मंत्री के सौजन्य से रक्षा-सौदे चलते रहते हैं.अर्थ-मंत्री अनर्थ के घोटालों में उलझ जाता है.हमारे देश में रेल-कर्मियों की सतर्कता से नियमित रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं,जो रेल-मंत्री को व्यस्त रखती हैं.वन-मंत्री वृक्षारोपण करवाता रहता है;ताकि उनके रिश्तेदारों के लिए,जिन्हें जंगल काटने के ठेके मिले हैं,पेड़ कम न पड़ने पायें.
खाद्य-मंत्री के संरक्षण में देश के जमाखोर और कालाबाजारिये अनाज के गोदामों में ताला मारकर सो जाते हैं.हमारे देश में मानसून भी सो जाता है ताकि सूखा पड़ सके.परिवार-नियोजन मंत्री बच्चों की पैदाइश में मशगूल रहता है.वैसे भी परिवार-नियोजन कार्यक्रम हमारे देश में बहुत सफल है.आठ-दस बच्चे होने के बाद लोग नसबंदी करवा ही लेते हैं.मंत्रियों के विकास के लिए हमारे यहाँ एक विकास-मंत्रालय भी है.
हमारे यहाँ कानून और व्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि कभी-कभी तो हत्या,बलात्कार,आगजनी और लूटपाट की वारदातें एकदम कम हो जाती हैं.बीच-बीच में सत्ता के ग्रीष्मकालीन,वर्षाकालीन,शीतकालीन या अकालीन अधिवेशन होते रहते हैं.इनमे जनप्रतिनिधि आकर गहरी नींद सो जाते हैं और उन्हें जगाने के लिए वही प्रयास करने पड़ते हैं जो रामानंद सागर जी ने आपको जगाने के लिए किये थे.कभी-कभी आपस में एक दूसरे पर चरण-पादुकाएं फेंककर या शाश्वत गालियों का आदान-प्रदान कर जनप्रतिनिधि जनता को विश्वास दिलाते रहते हैं कि सत्ता सोयी नहीं है.
देश कई राज्यों में बंटा हुआ है और राज्य-सरकारें भी तभी जागती हैं जब बाढें आती हैं,सूखे पड़ते हैं और राहत-कार्यों का सुख नज़र आता है.राहत कार्यों से सभी जनप्रतिनिधियों क़ी आत्माओं को बहुत राहत मिलती है.राहत-कार्यों को आंवटित राशि कहाँ चली जाती है उसे कोई नहीं जानता.इस पर हमारे एक प्रसिद्द शायर दुष्यंत कुमार जी ने बड़ा ही प्यारा शे'र कहा है,कुम्भकर्ण भाई,आप भी सुनिए:''यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ ,मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!''यह रहस्य दुष्यंत भाई अपने साथ ही ले गए.
हमारे यहाँ दफ़्तरों में भी सोने क़ी समुचित व्यवस्था है.साहब तो साहब,उनका चपरासी तक सोता रहता है.चपरासी पांच के हरे पत्ते क़ी खुशबू से उसी तरह जाग जाता है जैसे आप भोजन क़ी खुशबू से जागे थे.साहब को जगाने के लिए लिफ़ाफ़ा-अस्त्र का प्रयोग किया जाता है.यह साहबों को जगाने का अमोघास्त्र होता है.लिफ़ाफ़े को टेबल के नीचे से साहब के हाथों में पकड़ाया जाता है और इसके स्पर्श से साहब के शरीर में रक्त संचार शुरू हो जाता है.
सडकों,पुलों और भवनों के निर्माण का ठेका ठेकेदारों को देकर सम्बंधित अधिकारी भी गहन निद्रा में सो जाते हैं.साहबों को ठेकेदारों क़ी ईमानदारी पर शतप्रतिशत भरोसा होता है क्योंकि वह साहबों का विश्वास जीतने के लिए दारू समेत जिन्दा-मुर्दा गोश्त का इंतजाम करता रहता है.ठेकेदारों का काम इतनी उच्चकोटि का होता है कि सड़कें पहली बरसात में ही उखड़ जाती हैं.पुल भी पहली बाढ़ में ही बह जाते हैं.अलबत्ता इमारतें अपेक्षाकृत मजबूत होती हैं.वे तभी ढहती हैं जब उनमे रहने वाले लोग आ जाते हैं.
मरीज़ मरते रहते हैं और अस्पतालों में डाक्टर-नर्स सोते रहते हैं.कहीं-कहीं तो डाक्टर-नर्स साथ-साथ(अलग-अलग बिस्तरों पर) सोते हुए पाए गए हैं.अस्पताल वाले शरीर कि नश्वरता का लोहा मानते हैं.शरीर को तो एक न एक दिन मरना ही है.कभी-कभी डाक्टरों के सोने के फ़ायदे भी देखने को मिल जाते हैं.कई मरीज़ डाक्टरों की तवज्जो न मिल पाने कि वज़ह से अपने आप ठीक हो जाते हैं.
कहाँ तक गिनाऊँ,कुम्भकर्ण भैया.गली-मोहल्लों में रात के चौकीदार सोते रहते हैं.ख़ाकी वर्दियों को आजतक सिर्फ़ अपराधियों ने ही जागते हुए देखा है.हालात इतने सक्षम हैं कि चोर चोरी करने के लिए घर में घुसता है और वहीँ सो जाता है.ड्रायवर बस चलाते हुए सो जाता है.यहाँ तक कि हमारे यहाँ उल्लू तक सोता हुआ पाया जाता है.
हमारा देश आपका बड़ा ऋणी है,कुम्भकर्ण भाई.आपने हमें इतना बड़ा शयनरुपी आदर्श जो दिया है.सोते रहना हमारी संस्कृति बन चुका है.कभी समय निकालकर आप इधर आइये और देखिये.सच कहता हूँ,आप अपनी सोने कि कला पर शर्मिंदा न हो जाएँ,तो कहियेगा!बस,एक ही बात का दुःख है,भैया.उधर लंका में सिर्फ़ आप अकेले इतनी गहरी और लम्बी नींद सोते हैं.हमारे यहाँ तो देश की पूरी जनता सोयी पड़ी है.आपके अग्रज ने आपके लिए छः महीनों तक की नींद मांगी थी.हमारे यहाँ जनता के लिए पूरे पांच वर्षों की नींद का वरदान माँगा जाता है. न जाने कब जागेगी हमारे देश की जनता?न जाने कब नींद से जागकर हमारी जनता सत्ता और सत्ता के सिपाहियों को झिन्झोड़ेगी?
शेष कुशलता है.मुझे भी नींद आ रही है इसलिए पत्रांत करना चाहूँगा.बस,अंत में एक बेहद व्यक्तिगत व नाज़ुक सवाल पूछना चाहूँगा.आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे?जिज्ञासा यह है की जब आप छः महीनों तक सो रहे होते हैं,तो इतना लम्बा समय भाभी जी कैसे काटती हैं?
गहन निद्रा के लिए मेरी शुभकामनायें...
शुभाकांक्षी
आपका ही निद्राजीवी अनुज
एक विशालकाय नमस्कार!
अत्र कुशलं तत्रास्तु.यदि आप जागृतावस्था में हुए तो इस अकिंचन का पत्र आपको स्वस्थ एवं सानंद पायेगा क्योंकि आप श्रीलंका के माल-पानी और ढोर-ढंगरों को उदरस्थ कर रहे होंगे.और यदि आप गहन निंद्रा में हुए तो मेरा पत्र निश्चय ही श्रीलंका के चर-अचर को कुशलपूर्वक पायेगा.
भैया,अभी हाल ही में मैंने दूरदर्शन द्वारा प्रसारित ''रामायण'' नमक सीरियल में आपका रोल देखा था.आप गहन निद्रा में थे और चूँकि श्रीलंका में राम-रावण युद्ध की वजह से इमरजेंसी की घोषणा हो चुकी थी,इसलिए आपको जगाया जा रहा था.इस चक्कर में रामानंद सागर जी को दूरदर्शन के पूरे आधे घंटे बर्बाद करने पड़े.बड़ी मुश्किल से आप जागे भी तो भोजन-सामग्रियों की ख़ुशबू से.और जागते ही आप बिना ब्रश किये भोजन पर पिल पड़े.आपके टूथ-ब्रश का साइज़ देखने की तमन्ना मन में ही रह गयी
आप की प्रतिभा को देखकर ही मैं आपको पत्र लिखने के लिए विवश हो गया हूँ.आप जैसे महान नींद-प्रेमी को पत्र लिखकर मैं अपने आप को धन्य महसूस कर रहा हूँ.हम भारतवासियों ने सुना है की आप जनवरी से जून तक सोते हैं और जुलाई से दिसम्बर तक निरंतर अपनी उदरपूर्ति में लीन रहते हैं.इन जागृतावस्था वाले छः महीनों में तो आप श्रीलंका की आधी आबादी खा जाते होंगे?
मैं आपके अग्रज रावण जी को बहुत बुद्धिमान नहीं मानता था.पर जबसे सुना है कि उन्होंने आपकी छः महीनों की नींद का वरदान माँगा था,तबसे मैं उनसे बुरी तरह प्रभावित हूँ.उन्होंने सगे भाई की लम्बी नींद का वरदान मांगकर श्रीलंकावासियों की खाद्द्य-समस्या सुलझा ली.यदि आपको इन बातों की जानकारी न हो तो कृपया श्रीलंका की पुरानी फाईलें देख लें.
एक राज़ की बात कहना चाहूँगा.रावण जी के सिद्धांत भले ही बहुत ऊँचे हों,पर बहुत कच्चे हैं.राजनीतिक समीकरणों से एकदम उल्टे.वे भाई का पेट काटकर जनता का ख़याल रखते हैं.अपने इधर ऐसा ग़लत रिवाज़ नहीं है.हमारे देश के स्वनामधन्य राजा पहले अपने वन्धु-वान्धवों का पेट भरते हैं.जनता के हाथ सिर्फ़ जूठन ही आ पाती है.हमारे यहाँ राजा को इतनी फ़ुर्सत ही नहीं कि वह जनता के बारे में सोचे.
रावण जी की बस एक ही उच्च कोटि की नीति हमारे देश में पसंद की जाती है और वह स्वस्थ नीति है दूसरों की जवान और सुन्दर बीबियों को अपने देश में स्मगल करना.हमारा देश अभी इस सीमा तक प्रगतिशील नहीं हुआ है इसलिए हमारी स्मगलिंग नशीले पदार्थों तक ही सीमित है.हमारे देश का नशा-उन्मूलन दल ही इन पदार्थों का ज्यादा सेवन करता है.
खैर,इन मुद्दों को जाने दीजिये.मैं असली मुद्दे पर आता हूँ.आप हमारे यहाँ अपनी महान नींद की वज़ह से जाने जाते हैं.आप गहरी और लम्बी नींद का पर्याय बन गए हैं.कुम्भकर्णी नींद एक परंपरा बन गयी है और हमारे देश ने इस परंपरा को कला के स्तर तक पंहुचा दिया है.मैं आपके रेफरेंस के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ.
हमारे देश का शासन जो संस्था चलाती है उसे सरकार कहते हैं.संभवतः सरोकार से उपजा यह शब्द नींद का श्रृंगार पाकर ऊँघने का पर्याय बन गया है.जनतारुपी महासागर को चुनाव के पर्वत से मथने पर सरकार का आविर्भाव होता है.इस मंथन से भ्रष्टाचार नामक रत्न भी निकलता है जिसे जनप्रतिनिधियों में अमृत की तरह बाँट दिया जाता है.सत्ता में आने के बाद सरकार पांच सालों के लिए कुम्भकर्णी नींद ओढ़कर सो जाती है.
सरकार का मुखिया,विभिन्न क्षेत्रों से चुनकर आए,अपने नाम दादागिरी और गुंडागर्दी का कीर्तिमान रखनेवाले जनप्रतिनिधियों को प्रमुख विभागों का कार्यभार सौंपकर निश्चिन्त हो जाता है.इसके बाद मुखिया दूसरे देशों की समस्याएं सुलझाने में व्यस्त हो जाता है.
इसके बाद गृह-मंत्री गृह-कलह के योगदान और निदान में व्यस्त हो जाता है.रक्षा-मंत्री के सौजन्य से रक्षा-सौदे चलते रहते हैं.अर्थ-मंत्री अनर्थ के घोटालों में उलझ जाता है.हमारे देश में रेल-कर्मियों की सतर्कता से नियमित रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं,जो रेल-मंत्री को व्यस्त रखती हैं.वन-मंत्री वृक्षारोपण करवाता रहता है;ताकि उनके रिश्तेदारों के लिए,जिन्हें जंगल काटने के ठेके मिले हैं,पेड़ कम न पड़ने पायें.
खाद्य-मंत्री के संरक्षण में देश के जमाखोर और कालाबाजारिये अनाज के गोदामों में ताला मारकर सो जाते हैं.हमारे देश में मानसून भी सो जाता है ताकि सूखा पड़ सके.परिवार-नियोजन मंत्री बच्चों की पैदाइश में मशगूल रहता है.वैसे भी परिवार-नियोजन कार्यक्रम हमारे देश में बहुत सफल है.आठ-दस बच्चे होने के बाद लोग नसबंदी करवा ही लेते हैं.मंत्रियों के विकास के लिए हमारे यहाँ एक विकास-मंत्रालय भी है.
हमारे यहाँ कानून और व्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि कभी-कभी तो हत्या,बलात्कार,आगजनी और लूटपाट की वारदातें एकदम कम हो जाती हैं.बीच-बीच में सत्ता के ग्रीष्मकालीन,वर्षाकालीन,शीतकालीन या अकालीन अधिवेशन होते रहते हैं.इनमे जनप्रतिनिधि आकर गहरी नींद सो जाते हैं और उन्हें जगाने के लिए वही प्रयास करने पड़ते हैं जो रामानंद सागर जी ने आपको जगाने के लिए किये थे.कभी-कभी आपस में एक दूसरे पर चरण-पादुकाएं फेंककर या शाश्वत गालियों का आदान-प्रदान कर जनप्रतिनिधि जनता को विश्वास दिलाते रहते हैं कि सत्ता सोयी नहीं है.
देश कई राज्यों में बंटा हुआ है और राज्य-सरकारें भी तभी जागती हैं जब बाढें आती हैं,सूखे पड़ते हैं और राहत-कार्यों का सुख नज़र आता है.राहत कार्यों से सभी जनप्रतिनिधियों क़ी आत्माओं को बहुत राहत मिलती है.राहत-कार्यों को आंवटित राशि कहाँ चली जाती है उसे कोई नहीं जानता.इस पर हमारे एक प्रसिद्द शायर दुष्यंत कुमार जी ने बड़ा ही प्यारा शे'र कहा है,कुम्भकर्ण भाई,आप भी सुनिए:''यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ ,मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!''यह रहस्य दुष्यंत भाई अपने साथ ही ले गए.
हमारे यहाँ दफ़्तरों में भी सोने क़ी समुचित व्यवस्था है.साहब तो साहब,उनका चपरासी तक सोता रहता है.चपरासी पांच के हरे पत्ते क़ी खुशबू से उसी तरह जाग जाता है जैसे आप भोजन क़ी खुशबू से जागे थे.साहब को जगाने के लिए लिफ़ाफ़ा-अस्त्र का प्रयोग किया जाता है.यह साहबों को जगाने का अमोघास्त्र होता है.लिफ़ाफ़े को टेबल के नीचे से साहब के हाथों में पकड़ाया जाता है और इसके स्पर्श से साहब के शरीर में रक्त संचार शुरू हो जाता है.
सडकों,पुलों और भवनों के निर्माण का ठेका ठेकेदारों को देकर सम्बंधित अधिकारी भी गहन निद्रा में सो जाते हैं.साहबों को ठेकेदारों क़ी ईमानदारी पर शतप्रतिशत भरोसा होता है क्योंकि वह साहबों का विश्वास जीतने के लिए दारू समेत जिन्दा-मुर्दा गोश्त का इंतजाम करता रहता है.ठेकेदारों का काम इतनी उच्चकोटि का होता है कि सड़कें पहली बरसात में ही उखड़ जाती हैं.पुल भी पहली बाढ़ में ही बह जाते हैं.अलबत्ता इमारतें अपेक्षाकृत मजबूत होती हैं.वे तभी ढहती हैं जब उनमे रहने वाले लोग आ जाते हैं.
मरीज़ मरते रहते हैं और अस्पतालों में डाक्टर-नर्स सोते रहते हैं.कहीं-कहीं तो डाक्टर-नर्स साथ-साथ(अलग-अलग बिस्तरों पर) सोते हुए पाए गए हैं.अस्पताल वाले शरीर कि नश्वरता का लोहा मानते हैं.शरीर को तो एक न एक दिन मरना ही है.कभी-कभी डाक्टरों के सोने के फ़ायदे भी देखने को मिल जाते हैं.कई मरीज़ डाक्टरों की तवज्जो न मिल पाने कि वज़ह से अपने आप ठीक हो जाते हैं.
कहाँ तक गिनाऊँ,कुम्भकर्ण भैया.गली-मोहल्लों में रात के चौकीदार सोते रहते हैं.ख़ाकी वर्दियों को आजतक सिर्फ़ अपराधियों ने ही जागते हुए देखा है.हालात इतने सक्षम हैं कि चोर चोरी करने के लिए घर में घुसता है और वहीँ सो जाता है.ड्रायवर बस चलाते हुए सो जाता है.यहाँ तक कि हमारे यहाँ उल्लू तक सोता हुआ पाया जाता है.
हमारा देश आपका बड़ा ऋणी है,कुम्भकर्ण भाई.आपने हमें इतना बड़ा शयनरुपी आदर्श जो दिया है.सोते रहना हमारी संस्कृति बन चुका है.कभी समय निकालकर आप इधर आइये और देखिये.सच कहता हूँ,आप अपनी सोने कि कला पर शर्मिंदा न हो जाएँ,तो कहियेगा!बस,एक ही बात का दुःख है,भैया.उधर लंका में सिर्फ़ आप अकेले इतनी गहरी और लम्बी नींद सोते हैं.हमारे यहाँ तो देश की पूरी जनता सोयी पड़ी है.आपके अग्रज ने आपके लिए छः महीनों तक की नींद मांगी थी.हमारे यहाँ जनता के लिए पूरे पांच वर्षों की नींद का वरदान माँगा जाता है. न जाने कब जागेगी हमारे देश की जनता?न जाने कब नींद से जागकर हमारी जनता सत्ता और सत्ता के सिपाहियों को झिन्झोड़ेगी?
शेष कुशलता है.मुझे भी नींद आ रही है इसलिए पत्रांत करना चाहूँगा.बस,अंत में एक बेहद व्यक्तिगत व नाज़ुक सवाल पूछना चाहूँगा.आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे?जिज्ञासा यह है की जब आप छः महीनों तक सो रहे होते हैं,तो इतना लम्बा समय भाभी जी कैसे काटती हैं?
गहन निद्रा के लिए मेरी शुभकामनायें...
शुभाकांक्षी
आपका ही निद्राजीवी अनुज
Wednesday, May 18, 2011
ओ हरजाई,मानसून!
न्यूटन के ज़माने में सेब ऊपर से नीचे गिरा करते थे.आज भी स्थिति वैसी ही है.कभी हवाई जहाज के पहिये आसमान से गिर पड़ते हैं.कभी पूरा का पूरा जहाज अधोमुखी हो जाता है.लेकिन यह मानसून अपवाद है.यह न्यूटन के सिद्धांत को नहीं मानता.यह हर साल मई-जून के महीने में,भारत वर्ष के नक़्शे में,नीचे से ऊपर की ओर गिरता है.
प्रचंड ग्रीष्म में यह बेचारा विषपायी मन तपन की अनुभूति ढोते-ढोते राम के वनवास जैसा हो जाता है.घर के कुत्ते-बिल्ली तक मानसून के इंतजार में टेलीविजन के परदे पर अपनी नज़रें गड़ाए रहते हैं.
पसीने से तर शहरी प्रेमी,अपनी प्रेमिका के आगे घुटने टेककर याचना भरे शब्दों में कहता है,''हे प्रिये,कहो तो तुम्हारे लिए आसमान से तारे तोड़कर ला दूँ?''
प्रेमिका अपने चेहरे पर चुह-चुहा आयी पसीने की बूंदों से अपने अधरों की लिपस्टिक को बचाते हुए कहती है,''मेरे बौड़म प्रेमी,यदि मुझसे इतना ही प्यार है तो मेरे लिए तन-मन को भिगोने वाला मनभावन मानसून ला दो.क्योंकि बिना मानसून के मेरी छतरी बेकार पड़ी है!''
प्रेमी निराश हो जाता है.कहाँ से लाये वह निष्ठुर मानसून को?ऊपर से इस चिलचिलाती गर्मी में उसकी प्रेमिका आइसक्रीम खा-खाकर उसकी जेब को भी ख़ुश्क किये दे रही है.मानसून है कि आने का नाम ही नहीं ले रहा है.
मानसून की लेट-लतीफी अब इस हद तक प्रसिद्धि पा चुकी है कि पत्नियाँ पतियों को हिदायत देने लगी हैं,''ए जी,शाम को दफ़्तर से जल्दी घर लौट आना.कहीं मानसून कि तरह लेट न हो जाना,समझे?''
समस्त चर-अचर और नर-निशाचर मानसून की आस लगाये बैठे हैं,पर यह निर्मोही मानसून न हुआ,भोपाल के गैस-कांड पीड़ितों का मुआवज़ा हो गया
दूरदर्शन पर सजी-धजी समाचार-वाचिका घोषणा करती है कि मानसून अब भारत की ओर चल पड़ा है;तो थोड़ी तसल्ली बंधती है.
एक-दो दिनों के बाद फिर उद्घोषणा होती है कि मानसून कन्याकुमारी के तट पर पहुँच चुका है,और वहां कुंवारी कन्याओं को भावविभोर कर रहा है.सभी के दिल की धडकनें बढ़ने लगती हैं.
ज्यों-ज्यों मानसून भारत के नक़्शे पर ऊपर क़ी ओर घुसता है,समस्त जनमानस उतावला होने लगता है.रास्ते में दो-चार पुलों को तबाह करता हुआ जब मानसून मुम्बई में एक-दो इमारतों को धराशायी करता है,तो लोगों को यकीन होने लगता है कि अब मानसून किसी भी वक़्त उनके दरवाज़ों कि सांकल खड़का सकता है.
सच्ची विरहिणी भी अपनी विरह-व्यथा से आकुल-व्याकुल होकर मानसून की बाट जोह रही है.और जब उसकी आंख के साथ-साथ उसका घर भी चूने लगता है,तो वह समझ जाती है कि मानसून आ गया.करे क्या विरहिणी?उसका परदेशी तो परदेश का होकर रह गया है.वह घर लौटे तो विरहिणी की विरह-ज्वाला मिटे.पर परदेशी समझदार है.वह घर लौटकर विरहिणी की विरह-वेदना में विघ्न नहीं डालना चाहता.
विरहिणी भी कम समझदार नहीं है.उसे अपने परदेशी का नहीं,बल्कि उसके द्वारा भेजे गए मनीआर्डर का ज्यादा इंतज़ार रहता है.मनीआर्डर पाने के बाद वह बसंत-ऋतु में किसी बसंत लाल से या शीत-ऋतु में किसी शिशिर मोहन से अपनी विरह-व्यथा बाँट लेती है.उधर परदेशी भी परदेश में किसी कामचलाऊ विरहिणी की तलाश कर लेता है.
कृषि-प्रधान देश में किसानों का जीवन तो प्रतीक्षाओं से ही भरा है.सरकार घोषणा कर देती है कि किसानों को मुफ़्त बीज बांटे जायेंगे.पर विकास अधिकारी सरपंच के सहयोग से बीज दबाये बैठा रहता है.बड़ी मुश्किल से इन बाज़ के पंजों से बीज छटकता है,तो खाद नहीं मिलती.बीज और खाद मिल गए तो ट्रैक्टर का डीज़ल ख़तम हो जाता है.
यदि गलती से खेती के सारे संयोग जुट भी गए तो यह मुआ मानसून आंख-मिचौली खेलने लगता है.निहारते रहो टकटकी बांधे बाँझ आसमान को.पर आसमान टी.वी. के 'रूकावट के लिए खेद है' कार्यक्रम की तरह एकदम साफ.किसान समझ जाते हैं की सूखा लेकर मानसून आ गया.
अपने देश में,धन्य हैं वे लोग जो मानसून का सुख भोगते हैं.भाग्यवान हैं वे लोग जो नदियों के किनारे रहते हैं और बाढ़ की संभावनाएं ढोते हैं.स्वर्गीय दुष्यंत कुमार भी लगता है इनमे से एक थे.तभी तो उन्होंने अपने और अपने ग्रामवासियों के सुख का इतना सुन्दर चित्रण किया है:''बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,और नदियों के किनारे घर बने हैं."
सच,कितनी सुखद होती होगी वह अनुभूति कि टी.वी. पर मानसून के आने कि घोषणा हो गयी है.घनघोर घटाओं ने मूसलाधार बारिश का रूप ले लिया है.घर में कोई बिल्ली भी घुसती है तो लगता है जैसे पानी घुस रहा है.घर का हर प्राणी दम साधे है.सबकी कल्पनाओं में नदी उफन रही है और सभी कुछ बहाए लिए जा रही है.यह अनुभूति और गहन होती है और घर के मवेशी पानी में बहने लगते हैं.घर भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ता है और चरम अनुभूति के पलों में लोग-बाग़ पानी में डूबने-उतराने लगते है.
यह नज़ारा टी.वी. के माध्यम से जन-जन तक प्रसारित होता है.समाचार-वाचिका मुस्करा कर कह देती है...''बाढ़ ने सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है.''बाढ़ में कोई डूबे,किनारे लगे या बह जाये..उसकी बला से.
अपनी तो इस जन्म में ख्वाइश ही रह गयी कि हम भी किसी 'कोसी प्रोजेक्ट' या 'गंडक परियोजना' से जुड़े होते.कितना अपनत्व होता चारो ओर.अपना घर,अपनी नदी,अपना प्रोजेक्ट और ठीक नदी के किनारे बना हुआ उस प्रोजेक्ट का अपना दफ़्तर.हम नदी को बड़ी अपनत्व भरी निगाहों से देखते.नदी भी हमारे प्रेम का मान रखती.वह पहली ही बरसात में हमारा दफ़्तर बहा ले जाती.पहले दफ़्तर बहता,फिर प्रोजेक्ट के अधबने अवशेष बहते.दफ़्तर के साथ परियोजना कि फाईलें भी बह जातीं.
लोग-बाग़ और प्रेस वाले यदि हल्ला मचाते कि फाईलें जानबूझकर बहाई गयी हैं,तो परियोजना-सूत्रों से स्पष्टीकरण दे दिया जाता कि जब इतनी भयंकर बाढ़ में अधबना बांध बह गया तो फाईलें किस खेत कि मूली थीं.
ठण्ड और गर्मी में तन-मन से परियोजना को चूसने के बाद हम बड़ी बेसब्री से मानसून का इंतज़ार करते.मानसून आता और हमारी सारी काली-कलूटी करतूतें बहाकर ले जाता.भूल-चूक लेनी-देनी!
पर काश!ऐसा हो पाता,तब न!नदी की तो बात दूर,अपने दफ़्तर के आस-पास तो कोई छोटा-मोटा नाला भी नहीं है.हमें अपनी काली करतूतें छिपाने के लिए 'शाट-सर्किट' का सहारा लेना पड़ता है.आग में जब सबकुछ जलकर राख़ हो जाता है तब कहीं फायर-ब्रिगेड वाले आते हैं और मलबे में से फाईलों की क्षत-विक्षत लाशें तलाशी जाती हैं.
चाचा ग़ालिब के ज़माने में भी,लगता है फायर-ब्रिगेड हुआ करती थीं.तभी तो उन्होंने लिखा था:''जला है ज़िस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा,कुरेदते हो राख़,ये अंदाज़-ए-जुस्तजू क्या है?''
इसलिए,हे हरजाई मानसून,तुझे आना है तो आ,या भाड़ में जा!विसंगतियों से भरे इस शहर में न तेरे आने की ख़ुशी है न तेरे न आने का मलाल.
(shrawan Kumar Urmalia)
प्रचंड ग्रीष्म में यह बेचारा विषपायी मन तपन की अनुभूति ढोते-ढोते राम के वनवास जैसा हो जाता है.घर के कुत्ते-बिल्ली तक मानसून के इंतजार में टेलीविजन के परदे पर अपनी नज़रें गड़ाए रहते हैं.
पसीने से तर शहरी प्रेमी,अपनी प्रेमिका के आगे घुटने टेककर याचना भरे शब्दों में कहता है,''हे प्रिये,कहो तो तुम्हारे लिए आसमान से तारे तोड़कर ला दूँ?''
प्रेमिका अपने चेहरे पर चुह-चुहा आयी पसीने की बूंदों से अपने अधरों की लिपस्टिक को बचाते हुए कहती है,''मेरे बौड़म प्रेमी,यदि मुझसे इतना ही प्यार है तो मेरे लिए तन-मन को भिगोने वाला मनभावन मानसून ला दो.क्योंकि बिना मानसून के मेरी छतरी बेकार पड़ी है!''
प्रेमी निराश हो जाता है.कहाँ से लाये वह निष्ठुर मानसून को?ऊपर से इस चिलचिलाती गर्मी में उसकी प्रेमिका आइसक्रीम खा-खाकर उसकी जेब को भी ख़ुश्क किये दे रही है.मानसून है कि आने का नाम ही नहीं ले रहा है.
मानसून की लेट-लतीफी अब इस हद तक प्रसिद्धि पा चुकी है कि पत्नियाँ पतियों को हिदायत देने लगी हैं,''ए जी,शाम को दफ़्तर से जल्दी घर लौट आना.कहीं मानसून कि तरह लेट न हो जाना,समझे?''
समस्त चर-अचर और नर-निशाचर मानसून की आस लगाये बैठे हैं,पर यह निर्मोही मानसून न हुआ,भोपाल के गैस-कांड पीड़ितों का मुआवज़ा हो गया
दूरदर्शन पर सजी-धजी समाचार-वाचिका घोषणा करती है कि मानसून अब भारत की ओर चल पड़ा है;तो थोड़ी तसल्ली बंधती है.
एक-दो दिनों के बाद फिर उद्घोषणा होती है कि मानसून कन्याकुमारी के तट पर पहुँच चुका है,और वहां कुंवारी कन्याओं को भावविभोर कर रहा है.सभी के दिल की धडकनें बढ़ने लगती हैं.
ज्यों-ज्यों मानसून भारत के नक़्शे पर ऊपर क़ी ओर घुसता है,समस्त जनमानस उतावला होने लगता है.रास्ते में दो-चार पुलों को तबाह करता हुआ जब मानसून मुम्बई में एक-दो इमारतों को धराशायी करता है,तो लोगों को यकीन होने लगता है कि अब मानसून किसी भी वक़्त उनके दरवाज़ों कि सांकल खड़का सकता है.
सच्ची विरहिणी भी अपनी विरह-व्यथा से आकुल-व्याकुल होकर मानसून की बाट जोह रही है.और जब उसकी आंख के साथ-साथ उसका घर भी चूने लगता है,तो वह समझ जाती है कि मानसून आ गया.करे क्या विरहिणी?उसका परदेशी तो परदेश का होकर रह गया है.वह घर लौटे तो विरहिणी की विरह-ज्वाला मिटे.पर परदेशी समझदार है.वह घर लौटकर विरहिणी की विरह-वेदना में विघ्न नहीं डालना चाहता.
विरहिणी भी कम समझदार नहीं है.उसे अपने परदेशी का नहीं,बल्कि उसके द्वारा भेजे गए मनीआर्डर का ज्यादा इंतज़ार रहता है.मनीआर्डर पाने के बाद वह बसंत-ऋतु में किसी बसंत लाल से या शीत-ऋतु में किसी शिशिर मोहन से अपनी विरह-व्यथा बाँट लेती है.उधर परदेशी भी परदेश में किसी कामचलाऊ विरहिणी की तलाश कर लेता है.
कृषि-प्रधान देश में किसानों का जीवन तो प्रतीक्षाओं से ही भरा है.सरकार घोषणा कर देती है कि किसानों को मुफ़्त बीज बांटे जायेंगे.पर विकास अधिकारी सरपंच के सहयोग से बीज दबाये बैठा रहता है.बड़ी मुश्किल से इन बाज़ के पंजों से बीज छटकता है,तो खाद नहीं मिलती.बीज और खाद मिल गए तो ट्रैक्टर का डीज़ल ख़तम हो जाता है.
यदि गलती से खेती के सारे संयोग जुट भी गए तो यह मुआ मानसून आंख-मिचौली खेलने लगता है.निहारते रहो टकटकी बांधे बाँझ आसमान को.पर आसमान टी.वी. के 'रूकावट के लिए खेद है' कार्यक्रम की तरह एकदम साफ.किसान समझ जाते हैं की सूखा लेकर मानसून आ गया.
अपने देश में,धन्य हैं वे लोग जो मानसून का सुख भोगते हैं.भाग्यवान हैं वे लोग जो नदियों के किनारे रहते हैं और बाढ़ की संभावनाएं ढोते हैं.स्वर्गीय दुष्यंत कुमार भी लगता है इनमे से एक थे.तभी तो उन्होंने अपने और अपने ग्रामवासियों के सुख का इतना सुन्दर चित्रण किया है:''बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,और नदियों के किनारे घर बने हैं."
सच,कितनी सुखद होती होगी वह अनुभूति कि टी.वी. पर मानसून के आने कि घोषणा हो गयी है.घनघोर घटाओं ने मूसलाधार बारिश का रूप ले लिया है.घर में कोई बिल्ली भी घुसती है तो लगता है जैसे पानी घुस रहा है.घर का हर प्राणी दम साधे है.सबकी कल्पनाओं में नदी उफन रही है और सभी कुछ बहाए लिए जा रही है.यह अनुभूति और गहन होती है और घर के मवेशी पानी में बहने लगते हैं.घर भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ता है और चरम अनुभूति के पलों में लोग-बाग़ पानी में डूबने-उतराने लगते है.
यह नज़ारा टी.वी. के माध्यम से जन-जन तक प्रसारित होता है.समाचार-वाचिका मुस्करा कर कह देती है...''बाढ़ ने सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है.''बाढ़ में कोई डूबे,किनारे लगे या बह जाये..उसकी बला से.
अपनी तो इस जन्म में ख्वाइश ही रह गयी कि हम भी किसी 'कोसी प्रोजेक्ट' या 'गंडक परियोजना' से जुड़े होते.कितना अपनत्व होता चारो ओर.अपना घर,अपनी नदी,अपना प्रोजेक्ट और ठीक नदी के किनारे बना हुआ उस प्रोजेक्ट का अपना दफ़्तर.हम नदी को बड़ी अपनत्व भरी निगाहों से देखते.नदी भी हमारे प्रेम का मान रखती.वह पहली ही बरसात में हमारा दफ़्तर बहा ले जाती.पहले दफ़्तर बहता,फिर प्रोजेक्ट के अधबने अवशेष बहते.दफ़्तर के साथ परियोजना कि फाईलें भी बह जातीं.
लोग-बाग़ और प्रेस वाले यदि हल्ला मचाते कि फाईलें जानबूझकर बहाई गयी हैं,तो परियोजना-सूत्रों से स्पष्टीकरण दे दिया जाता कि जब इतनी भयंकर बाढ़ में अधबना बांध बह गया तो फाईलें किस खेत कि मूली थीं.
ठण्ड और गर्मी में तन-मन से परियोजना को चूसने के बाद हम बड़ी बेसब्री से मानसून का इंतज़ार करते.मानसून आता और हमारी सारी काली-कलूटी करतूतें बहाकर ले जाता.भूल-चूक लेनी-देनी!
पर काश!ऐसा हो पाता,तब न!नदी की तो बात दूर,अपने दफ़्तर के आस-पास तो कोई छोटा-मोटा नाला भी नहीं है.हमें अपनी काली करतूतें छिपाने के लिए 'शाट-सर्किट' का सहारा लेना पड़ता है.आग में जब सबकुछ जलकर राख़ हो जाता है तब कहीं फायर-ब्रिगेड वाले आते हैं और मलबे में से फाईलों की क्षत-विक्षत लाशें तलाशी जाती हैं.
चाचा ग़ालिब के ज़माने में भी,लगता है फायर-ब्रिगेड हुआ करती थीं.तभी तो उन्होंने लिखा था:''जला है ज़िस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा,कुरेदते हो राख़,ये अंदाज़-ए-जुस्तजू क्या है?''
इसलिए,हे हरजाई मानसून,तुझे आना है तो आ,या भाड़ में जा!विसंगतियों से भरे इस शहर में न तेरे आने की ख़ुशी है न तेरे न आने का मलाल.
(shrawan Kumar Urmalia)
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