Sunday, May 22, 2016

ऐ मेरी भूतपूर्व प्रेमिका !

::व्यंग्य::
ऐ मेरी भूत(पूर्व) प्रेमिका !
अतिप्रिय ऐ मेरी भूत(पूर्व) प्रेमिका,
‘’क ख ग’’ !
बुरा मत मानना, प्रिये। तुम्हे इस तरह ''क ख ग'' कहकर संबोधित करते हुए मुझे हार्दिक क्लेश हो रहा है। करूँ क्या, प्रिये? सीधे संबोधन मेरे लिये कई बार बहुत घातक सिद्ध हुए हैं। इसलिये डरता हूँ। अपने समूचे ज़ज्बातों को समेटकर तुम्हे ''क ख ग'' का छद्म संबोधन दे रहा हूँ। आशा है तुम अन्यथा नहीं लोगी।
मैं तुम्हे ''प फ ब'' भी कह सकता था। पर मेरे जीवन मे तुम्हारा क्रम पहले है, इसलिये तुमसे पहले मैं ''प फ ब'' को नहीं घसीटना चाहता। उसे मैं अलग से पत्र लिख रहा हूँ।
तुम्हारे मन में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि मैं इतने सालों बाद तुम्हे क्यों याद कर रहा हूँ? इसके मात्र दो कारण हैं, प्राणाधिके ! पहला तो यह कि मैं तुम्हे याद करूं, इतना हक़ तो मुझे है ही। और दूसरा कारण जो बहुत महत्वपूर्ण है वह यह है कि तुम्हारे तथाकथित पूजनीय पिता ने, तुम्हारी ज़िंदगी से दूर चले जाने के लिए मुझे जो रुपये दिये थे, वे खत्म हो गये हैं।
सच प्रिये, आजतक मैं तुम्हे उन रुपयों के बल पर ही तो भुलाए हुए था। वर्ना तुम्हे भूल पाना क्या इतना आसान था, बोलो तो?
यदि उन रुपयों का सहारा ना होता तो प्रिये, मैं तो कब का टूटकर नगर निगम की सड़कों की शक्ल पा गया होता।
आज सोचता हूँ तो तुम्हारे पिताजी पर गर्व करने को जी चाहता है। वे कितने समझदार और सुलझे हुए विचारों के थे ! लगता है उन्होने भी अपनी जवानी में किसी ''ट ठ ड'' से प्यार किया था। प्रेम की व्यथा और तड़प को वे समझते थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि समय घावों को नहीं भर सकता। समय तो मुफ़्त में मिलने वाली चीज़ है; जिधर देखो, इफरात बिखरा पड़ा है।
तुम्हारे पिताजी ने अपने अनुभवों से समझ लिया था कि प्रेम के घाव मुफ़्त मे नहीं भरते। बल्कि पैसा ही, जो मुफ़्त मे नहीं आता, इस घाव को भर सकता है।
मैं तो तुम्हे सुखी देखना चाहता था, प्रिये। मैं तो वैसे ही तुम्हारी ज़िंदगी से दूर चला जाता। जैसे मुफ़्त मे मैं तुम्हारी ज़िंदगी मे आया था, वैसे ही मुफ़्त में तुम्हारी ज़िंदगी से चला भी जाता। पर तुम्हारे पिताजी से मेरा इस तरह तुमसे बिछड़ना देखा नहीं गया। आख़िर वे भी इंसान थे। तुम्हारे ही तो बाप थे बेचारे(सच कहो, थे न?) !
आज यह राज खोलकर मैं अपनी छाती का बोझ उतारकर तुम्हारी छाती में लादना चाहता हूँ। बहुत ढोया है मैने इस बोझ को, प्रिये ! अब ज़रा तुम भी इसका आनंद उठाओ।
तुमने तो मुझे निर्मोही, धोखेबाज, फ़रेबी इत्यादि न जाने क्या क्या समझा होगा। है न ? पर तुम क्या जानो, प्रिये, कि कितना बड़ा धर्मसंकट मेरे सामने था !
एक तरफ तुम्हारे पिताजी की तरफ़ से दी गई दो चीज़ें थीं। पहली चीज़, तुम्हारी ज़िंदगी से दूर चले जाने के लिये स्नेहभरी धमकी और दूसरी, प्रेम का घाव भरने मे लिये मुआवज़े के रूप में पच्चीस हज़ार रुपये।
और इधर मेरे सामने थे- तुम्हारा प्यार, तुम्हारा भारी-भरकम सौन्दर्य और अपने दिल पर पत्थर रखकर तुम्हारे साथ बिताए वे अमिट पल-छिन !
प्रेम मे धर्मसंकट बड़ा दुखदाई होता है, प्रिये ! अनिर्णय की वह स्थिति बड़ी भयावह थी। तुम्हे चुनूँ या पैसों को? उधर तुम्हारे पिताजी ने मेरे सामने पैसे रखते हुए प्रेम भरी घुड़की दी थी-'' पूरे पच्चीस हज़ार रुपये हैं, बे ! इससे एक रुपया भी ज़्यादा नहीं दूंगा। समझा? इन्हे लेकर अपना मुंह काला कर ! और फिर कभी इधर मुड़कर भी देखा तो तेरी टांगें तुड़वा दूंगा !''
मैने फिल्मी डायलॉग भी मारा था, प्रिये-'' क्या यही क़ीमत लगाई है आपने अपने बेटी के प्यार की?'' तुम्हारे पिताजी ने मुझे प्यार से समझाया था-'' अबे, ज़्यादा स्मार्ट मत बन ! मुझे अभी औरों को भी तो निबटाना है ! तू सोचता है, तूही एक है मेरी बेटी की लिस्ट में ?''
सुनकर मेरा धर्मसंकट समाप्त हो गया था, प्रिय ! मैने सोचा कि प्रेमी तभी महान बनता है, जब वह त्याग करे। त्याग ही प्रेम को सार्थकता देता है। और तुम ज़रा गहराई से सोचो कि तुम्हारे प्रेम के आगे मात्र पच्चीस हज़ार रुपये मे वह त्याग कितना महान था, प्रिये ! मैं तो तुम्हारे पिताजी के द्वारा ठग लिया गया था, प्रिय। आज भी वह ठगन मेरे दिल में कहीं न कहीं कसकती रहती है।
आज मैं खुले दिल से यह बात स्वीकार करता हूँ, प्रिय। मेरे भीतर के त्यागी और दुनियादार इंसान ने ताड़ लिया था कि तुम्हे तो मुझ जैसे कई लड़के मिल जायेंगे, पर मुझे पच्चीस हज़ार रुपये नहीं मिलेंगे।
तुमने मुझे स्वार्थी समझा होगा, धोखेबाज माना होगा। पर सोचो ज़रा कि यदि मैं वो पच्चीस हज़ार रुपये लेकर तुम्हारी ज़िंदगी से दूर नहीं जाता तो? तुम्हारे पिताजी ने मेरी टांगें तुड़वा देने की धमकी दी थी। सच कहता हूँ, मैं टांगों के टूटने से कतई भयभीत नहीं था। मेरा
विश्वास करो, सुप्रिये ! मैं इतना स्वार्थी नहीं था कि तुम्हे एक लंगड़े के पल्ले बंधने पर मज़बूर करता। मैं जानता हूँ कि मेरे लंगड़ा होने पर भी तुम मुझ से ही शादी करती। तुम्हारी मूर्खता पर मुझे तब भी इतना ही भरोसा था, मेरी सुमुखी।
तुमने मुझे निर्मम और निष्ठुर माना होगा। रुपयों का लालची समझा होगा। पर सोचो ज़रा कि मैने क्या क्या खोया है। तुम्हे तो याद ही होगा कि जब हमें भूख लगती थी तो हम चाट-पकौड़ों और आइसक्रीम के साथ-साथ जीने-मरने की क़समें भी खाया करते थे। उन क़समों को तोड़कर मुझे क्या मिला ! मात्र पच्चीस हज़ार रुपये? सोचो भला, कितना बड़ा घाटा सहा है मैने, प्रिये ! उन क़समों को न तोड़ता तो आज तुम्हारे पिताजी की मिल्कियत पर ऐश कर रहा होता कि नहीं?
तुम्हारा तो एक-एक आंसू एक-एक हज़ार रुपये का था। तुम्हारी एक मुस्कान पांच सौ रुपये से कम की नहीं थी। सभी कुछ तुम्हारे पास रह गये। और मुझे मिला क्या- मात्र पच्चीस हज़ार रुपये !
तुम्हे अपने दिल कि व्यथा बता ही दूं, प्रिये। मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती है, कटोचती है, कोसती है। कहती है कि मैं सरेआम लूट लिया गया।पर किसी और को दोष क्या दूं। मात्र पच्चीस हज़ार की अदना सी रक़म लेकर मैने ख़ुद पर ही डकैती डाल ली।
तुमने शादी करके अपना घर ज़रूर बसा लिया होगा। जिससे तुमने शादी की होगी, उसका घर बसा कि नहीं, मुझे बताना कभी? तुमने ज़रूर उस लल्लू घनश्याम से शादी की होगी, जिसके बाप की नज़रें भी तुम पर थीं ( ताकि वे तुम्हे बहू बना सकें) ! या हो सकता है तुमने उस बौड़म श्याम को चुना हो जो एक बार किसी को लेकर भाग गया था और फिर बाइज़्ज़त अकेले लौट आया था। या वो रईसज़ादा भी हो सकता है जिसे तुम्हारा कुत्ता अपना प्रतिद्वंदी समझता था।
जिस किसी ने भी तुमसे शादी की, अच्छा ही किया। देर-सवेर किसी न किसी अभागे का जीवन तो बर्बाद होना ही था।
तुम्हारे मन में भी जिज्ञासा होगी कि मैने शादी की या नहीं? तो तुम जान लो, प्रिये कि मैं किसी लड़की के बाप को कभी पसंद आया ही नहीं। ''च छ ज'' हो या ''त थ द''; ''य र ल'' हो या ''क्ष त्र ज्ञ’’, सभी के बापों ने मुझे टांगें तुड़वा देने की धमकियां दीं और उनकी बेटियों की ज़िंदगी से दूर चले जाने के लिये मुआवज़े दिये।
अब मैं कुँवारा न रहता तो क्या करता, प्रिये, तुम्ही बोलो?
खैर, तुम सुखी रहो। हाँ, डाइटिंग करती रहना, डीयर ! तुम खाती ज़्यादा हो। याद है न कि तुम्हे चाट वाले की दूकान पर देखकर बाकी ग्राहक वापस लौट जाते थे?
अपने बच्चों को मेरा प्यार और स्नेह देना। पर प्लीज़, मुझे उनका मामा मत बनाना, प्रिये !
अब और क्या लिखूं? तुम्हारे कुछ पत्र हैं मेरे पास, जो मैने बारिश के दिनों के लिये बचा लिये थे। बस अब उन्ही का सहारा रह गया है। उन्ही के सहारे जी लूंगा अब। प्रति प्रेम-पत्र यदि पांच सौ रुपये महीने मिलते रहें तो मेरा गुज़ारा हो जायेगा। ज़्यादा लालची नहीं हूँ मैं, डार्लिंग ! ऐसे मात्र तीस पत्र ही हैं मेरे पास। प्रूफ़ के लिये एक प्रेम-पत्र की फोटो-कॉपी सलंग्न कर रहा हूँ।
न प्रिये न, इसे ब्लैक-मेल न समझना। मैं इतना भी अधम नहीं हूँ, मेरी प्राण। मैं काफी सोच-विचारकर यह प्रस्ताव तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। काली करतूतों का मुआवज़ा काली कमाई से ही दिया जाता है, यह समझने की बात है। और काली कमाई के बिना तुम्हे कौन सा पति पाल सकता है, मेरी संकटमोचन। उनकी काली कमाई को ही तो चूना लगाना है। इसलिये भूल चूक लेनी देनी।
पत्रांत कर रहा हूँ, प्रिय ! मेरा ढेर सारा नगद प्यार।
तुम्हारा भूत(पूर्व) प्रेमी
''इ ई उ ऊ''
Shrawan Kumar Urmalia
19/207 Shivam Khand,
Vasundhara, Ghaziabad-201012
Mob. 9868549036

तलाश एक अदद वल्दियत क !

व्यंग्य
तलाश एक अदद वल्दियत की
(श्रवण कुमार उर्मलिया)
वर्षा-ऋतु की भीनी भीनी फुहारों का आनंद लेने वाले भारतमाता की सभी वल्दियतविहीन संतानों को मेरा शत शत नमन।
प्यारे भारतवासियो, तुम क्या जानो की यह बात कहते हुए मैं कितनी पीड़ा और दीनभावना से भरा हुआ हूँ। कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है।
यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता। पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है। इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है।
कहानी यह है कि मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!)। वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन से समर्पित पागलहै। पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है।
मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज़्यादा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!)। कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला- ''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''
पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला- ''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है? मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है? हम सब भारतवासियों का बाप कौन है? जल्दी बताओ? बोलते क्यों नहीं?''
मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया, पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है। हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं कि हम सब भारतमाता की संतानें हैं। जब माता है तो पिता भी होना ही चाहिए। पर हमारे पिता आखिर हैं कहाँ?
चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया। उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की। हो सकता है, उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही, बापू की संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!
अब समझ में आया न, भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है। अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी की वल्दियत को?सभी मुझे बिना पिता की संतानें नज़र आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं।
मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा। मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज़्यादा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है।
यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है। पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे, इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है। सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह विशिष्ट बन जाता था। शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे।
इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा। मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था। मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला- ''यार, कुछ भी कहो, इन अंग्रेजों को ज़िंदा और मुर्दा दोनों रूपों में रहने का सलीका आता था! देखो न, कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह! और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है। व्हाट अ डर्टी पीपल, यार!''
उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया। इसे अंग्रेजों के बनवाए हुए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं। ऐसा लगना स्वाभाविक भी है, क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा है। अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है। मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी- ''यार,डाक्टर, तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी। पर अभी मुझे बाकी लोगों की वल्दियत तलाश करनी है, इसलिए तुझे इस क़ब्रिस्तान के सहारे छोड़कर चलता हूँ।''
अपने एक और चिड़ीमार दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा- ''ददुआ, तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है! तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है! अरे, आज के ज़माने में अपनी सोच, अपनी! जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़, समझा? इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद पिता ढूंढ़ रखा है। और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है। तू भी एक पिता की तलाश कर और बहती गंगा में हाथ धो। समझा?''
मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया- ''निकाल बे, क्या है तेरे पास? जल्दी कर!''
मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा- ''भाई, मुझे माफ़ करना। तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। अभी तो मेरा एक अदद पिता भी तैयार नहीं हुआ है। मैं बहुत ही निर्धन हूँ, मेरे दोस्त। पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा, तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है। है न?''
मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला- ''अरे! राम! राम!! पिता का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है। अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ। तू भी उन्ही की शरण में चला जा!''
मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया- ''साहिबजी, मैं आपको अपना पिता बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ। कई दु:खी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन की बंसी बजा रहे हैं। मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये, माई बाप?''
वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले- ''ठीक है, ठीक है! ज्यादा पट-पट करने का नईं, क्या? पहले बता, तुझे चोरी-वोरी, लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस, कोई पुराना रिकार्ड?''
मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला- ''सब कुछ सीख लूँगा, माई-बाप! बस, आपका आशीर्वाद चाहिए! सर पर किसी पिता का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है, सर जी!''
उद्दंड सिंह जी बोले- ''क्यों बे, हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या? हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते। क्या समझा? तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय घरमंत्री के पास चला जा। वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं। शायद वे तुझे शरण दे दें।''
मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा। वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे। एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति की- ''माननीय, आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं! सच्चा, सस्ता और टिकाऊ पिता बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं। अस्तु आप स्वयं को मेरा पिता घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें, आर्य? नहीं तो मेरा जीवन, बस समझिये कि गया तेल लेने।''
जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले- ''वत्स, यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है। विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है! माननीय राज्य-प्रमुखजी बहुत नाराज़ हैं। वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे, तो कैबरे कहाँ देखेंगे। अब तुम्ही कहो, वत्स, जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो, वह तुम्हारा पूजनीय पिता कैसे बन सकता है?''
मैंने पूछा- ''तो आप कुछ तो राह सुझाइए? कहें तो मैं माननीय प्रमुखजी के पास चला जाऊं?''
वे गंभीर होकर बोले- ''नहीं वत्स, वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है। तात, इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे, 'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया। पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं। सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं। सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं। इसलिए, तू भी यहीं कहीं कोई लोकल पिता तलाश ले। ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती, वत्स!''
जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया- ''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना पिता तलाशते फिर रहे हो? बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह! और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं? याद रक्खो, यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना पिता नहीं बनाया, तो हम तुम्हे ऐसा बना देंगे कि तुम पिता रखने लायक ही नहीं रहोगे!''
भय के मारे मैं विपक्ष की शरण में जाने की सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और वे भी धमका गए- ''बरखुरदार, हम तुम पर बराबर नज़र बनाये हुए हैं! यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए, तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''
तो इस तरह, हे मेरे प्यारे देशवासियो, मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ। इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती है। सभी के अपने अपने पिता हैं; अपनी अपनी बपौती है। कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता इस देश में। बुरा हो उस साले पागल दोस्त का, जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया।
अभी हल ही में फिर मिल गया था वह पागल दोस्त। मुझे देखते ही चहककर बोला- ''वाह भाई वाह, खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का पिता? आखिर नहीं मिला न? हुंह! चला था बाप खोजने! तू अपने को बहुत होशियार समझता है, है न? अरे, मैं तो सालों से एक अदद पिता की आस लगाये बैठा हूँ! जब मुझे अभी तक मेरा पिता नहीं मिला, तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी, बोल? अब बोल, असली पागल कौन, तू कि मैं?''
मैंने स्वीकार किया, "असली पागल तो मैं हूँ जो हर बार तुझ जैसे पागल की बातों में आ जाता हूँ!"
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श्रवणकुमार उर्मलिया
19/207 शिवम् खंड
वसुंधरा, गाज़ियाबाद-201012
मोब. 9868549036