Tuesday, November 20, 2012

***चरित्र की चीड़-फाड़***



आज मैं सिर्फ़ चरित्र की बात करूँगा।

जानता हूँ कि आज के ज़माने में चरित्र की बातें करना मुझे शोभा नहीं देता। आज आदमी बड़ा है और उसका चरित्र छोटा। पहले धोती-लंगोटी वाले बड़े चरित्र वाले छोटे क़द-काठी के लोग हुआ करते थे। न जाने कहाँ खो गए वे चरित्र

चरित्र की बात चली है तो क्यों न ख़ुद से ही शुरुआत करूँ। मुझे अपना चरित्र हमेशा संदेहास्पद लगा है। क्योंकि मुझे चारित्रिक प्रमाण-पत्र देने वालों के चरित्र हमेशा संदेहास्पद रहे हैं।

हमें प्राथमिक पाठशाला में ही बता दिया गया था कि चरित्र को ऊपर उठाओ, उसे नीचे मत गिरने दो। शिक्षकों का चरित्र बहुत ऊँचा था। इतना ऊँचा कि वे स्कूल को मिलने वाला दूध और दलिया इस ख्याल से बाज़ार में बेच आते थे, ताकि उनका सेवन कर बच्चों का स्वास्थ्य ख़राब न हो। ऐसे चरित्रवान शिक्षक छात्रों के चरित्र का पतन बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। वे छात्रों के चरित्र की रक्षा के लिए छात्रों की ऐसी धुनाई करते थे कि छात्र तो अधमरे हो जाते थे, पर उनके चरित्र बहुत ऊपर उठ जाते थे। हमारे हेड मास्टर जी ने तो चारित्रिक प्रमाण-पत्र देने के एवज में कुछ सुविधा-शुल्क भी हमारे पिताजी से रखवा लिया था।

अब आप मेरे चरित्र की बुनियाद का अंदाज़ ख़ुद ही लगा लीजिये।

मिडिल स्कूल में आठवीं कक्षा तक आते आते हमारे चरित्र अपने आप ऊपर उठने लगे थे। प्रतिदिन प्रार्थना के बाद कोई न कोई शिक्षक कुछ उपदेश देते और फिर मैडमों से चुहलबाज़ियों में व्यस्त हो जाते। छात्रों के चरित्रों को मौका ही नहीं मिल पाता था कि वे नीचे गिरें।

अर्थशास्त्र और चरित्र में इतना गहरा सम्बन्ध मैंने पहले कभी नहीं देखा था। जो छात्र मास्टरों से ट्यूशन पढ़ते थे, उनका चरित्र हमेशा उत्तम आंका जाता था। ट्यूशन न पढ़ पाने की विवशता ओढ़े छात्र चरित्रहीन होने को बाध्य थे।

प्रधानाध्यापक बहुत ही अनुशासनप्रिय थे। शैतानी करने वाले छात्रों की पिटाई वे अपने कर-कमलों से करते थे। और छात्रों को मारने-पीटने एवं शिक्षकों के साथ पोलिटिक्स खेलने से जो समय बचता, उसे मैडमों के साथ अपने चरित्र का उर्ध्वगमन कराने में बिताते। वे छात्रों के शुभचिंतक थे और परीक्षा के समय उनके घर सब्जी-दूध पहुँचाने वाले छात्रों को उत्तर बता दिया करते थे। जिन छात्रों को उत्तर नहीं बताते थे, वे छात्र बहुत स्वावलंबी हो गए थे। वे अपने चरित्र के सहारे चुटकों के बल पर नक़ल करना सीख गए थे।

चारित्रिक विकास का असली मौक़ा मिला हाईस्कूल में। तब तक हमारा चरित्र भी हमारे साथ वयस्क हो चुका था। प्रिंसिपल साहब का चरित्र इतना ऊँचा था कि वह उनकी पहुँच से भी ऊपर उठ गया था। गर्ल्स स्कूल की मादा प्रिंसिपल के इर्द-गिर्द हमारे प्रिंसिपल का चरित्र संभावनाएं तलाशता रहता था।

लगभग सभी व्याख्याताओं को धनी घरों के बिगडैल लड़कों और छात्राओं से विशेष लगाव था। गुरु-शिष्य परंपरा अपने चरम पर थी। प्रैक्टिकल की कॉपियां जांचने के लिए शिक्षक गुरुदक्षिणा तभी स्वीकार करते थे जब वह उनकी घटिया औकात के हिसाब से हो। आठ-दस शिक्षकों को छोड़कर बाक़ी सोमरस को छूते भी नहीं थे। स्कूल के जो सबसे सीधे-सादे और बुज़ुर्ग शिक्षक थे और जिनकी हम सब बहुत इज्ज़त करते थे; उनके लिए एक दिन स्कूल के प्रांगण में दो जवान महिलाएं आपस में हाथापाई करती हुई पाई गयीं। एकाधिकार का प्रश्न था और दोनों पतिव्रताएं उन बुज़ुर्ग शिक्षक को अपना-अपना पति साबित कर रही थीं।

एक और सीधे-सौम्य शिक्षक एक दिन अचानक भाग गए। उन्होंने भी भागने की परंपरा का निर्वाह किया और साथ में हमारी कक्षा की सबसे सुन्दर छात्रा को भी भगा ले गए। इस घटना पर स्कूल के बाकी शिक्षकों ने बहुत रोष प्रकट किया, क्यों कि उनमे से कई और भी उस होनहार छात्रा के साथ भागना चाहते थे। कुछ दिनों बाद भगोड़े शिक्षक छात्रा के साथ विवाह कर लौट आये। दोनों ने एक दूसरे के साथ मुंह काला किया था, पर छात्रा की मांग में सिन्दूर देखकर सब कुछ उजला हो गया और चरित्र स्थापित हो गया। सभी ने उस विवाह को मान्यता दे दी,  सिवाय उन शिक्षक की प्रथम पत्नी के।

हमारे चरित्र यदि उस माहौल में भी ऊपर न उठते तो यह हमारे लिए शर्म की बात होती। अतः हमने अवसर नहीं गंवाया और ऐसा कुछ किया कि हमारा चरित्र एक (निम्न) स्तर से नीचे गिर ही नहीं सकता था।

कॉलेज पहुंचे तो वहां देखा की चारों ओर चरित्र ही चरित्र बिखरा पड़ा है। कुछ व्याख्याता पांच-पंद्रह का फ़ॉर्मूला इस्तेमाल करते थे ताकि स्टूडेंट्स को पढ़ाने में समय न बर्बाद करना पड़े। कक्षा मे पांच मिनट पहले जाओ, स्टूडेंट्स वहां नहीं होंगे। पंद्रह मिनट बाद जाओ तो स्टूडेंट्स यह सोचकर जा चुके होंगे कि शिक्षक नहीं आएंगे। छात्र और शिक्षक दोनों को यह प्रणाली बहुत माफ़िक आती थी। दोनों वर्ग एक दूसरे से मुंह चुराते थे ताकि शिक्षा के स्तर पर बट्टा न लगे।

एकमात्र मैडम की क्लॉस में छात्रों की उपस्थिति शत-प्रतिशत हुआ करती थी, क्योंकि मैडम जी को पढ़ाने का शऊर नहीं था, जो उनके रूप-लावण्य के आगे क्षम्य था। उनकी कक्षा में बैठकर, उनके सौन्दर्य की विवेचना में हम सभी स्टूडेंट्स के चरित्र को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ।

कॉलेज के स्पोर्ट्स के इंचार्ज प्रतिवर्ष खिलाड़ियों के लिए ख़रीदे जाने वाले किट्स में से कुछ जोड़े खा जाते थे। पुस्तकालय में किताबों को खाने के लिए दीमकों को मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। यह शुभ कार्य पुस्तकालयाध्यक्ष की देख-रेख में पुस्तकालय इंचार्ज के द्वारा संपन्न होता था। एक प्रगतिशील शिक्षक शहर में छेड़खानी करते हुए पिटकर कॉलेज की नाक ऊँची कर चुके थे। उन्हें इस पर भी तसल्ली नहीं हुई तो एक बार वे छात्रों से भी पिटे।

कॉलेज के प्रिंसिपल बड़े सिद्धांतवादी थे। वे ''पूअर ब्यायज़ फण्ड'' का पैसा भी धनवान घरों के छात्रों को ही दिलवाते थे। उन्होंने भैंसें भी पाल रखी थीं जो कॉलेज की शस्य-श्यामला गार्डेन की घास चरा करती थीं। हर हफ़्ते का भैंसों को दुहने के लिए प्रमोशनोन्मुख व्याख्याताओं का ड्यूटी-चार्ट भी हुआ करता था। एक बार प्रिंसिपल साहब की एक भैंस मर गई तो कॉलेज में सभी ने दो मिनट का मौन रखा, भैंस को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई और सार्वजानिक अवकाश की घोषणा की गई।

प्रिंसिपल साहब के सौजन्य से हम सभी का इतना चारित्रिक विकास हो चुका था कि नौकरी के हर विज्ञापन में हमारे कॉलेज का उल्लेख हुआ करता था। उस उल्लेख को देखकर हम बहुर गौरवान्वित होते थे। हर विज्ञापन में लिखा होता था की फलां(हमारे) अभियांत्रिक महाविद्यालय के विद्वान स्टूडेंट्स आवेदन भेजकर हमें कृतार्थ करने की ज़हमत न उठायें।

चरित्र के नाना आयामों से भयाक्रांत जब इस व्यावहारिक संसार में हमारा गृह-प्रवेश हुआ तो हमारे पास चरित्र के सिवाय कुछ भी नहीं था। जैसे हमारे देश में मध्यमवर्गीय के पास इज्ज़त के सिवाय कुछ भी नहीं होता है। चरित्र का बोझ और मुफ़लिसी। नौकरी की तलाश में दर-ब-दर होते हुए हम। भटकनें ही भटकनें। पहली बार मालूम हुआ की जिनके पास चरित्र होता है वे समाज में बहुत बकलोल समझे जाते हैं। पहली बार ऑस्कर वाइल्ड का कथन समझ में आया...''सधे हुए तौर-तरीके नैतिकताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।''

जब भी अपने चरित्र की टोह लेता हूँ तो बड़ी आत्मग्लानि होती है। मेरा अपना चरित्र तो कभी रहा ही नहीं। चारित्रिक प्रमाण-पत्र की शक्ल में मेरा चरित्र हमेशा चरित्रहीनों का मोह्ताज़ रहा है। नतीजा यह हुआ है कि अपने को चरित्रवान समझने का दम भरने वाला मैं किराये के मकान में रह रहा हूँ, और चरित्र की झंझट न पालने वाले कई-कई किरायेदार पाल रहे हैं।

इधर देश में हर तरह के आरक्षण प्रकाश में आ रहे हैं। सोचता हूँ कि एक आन्दोलन चलाया जाय, जिसमे उन चरित्रवानों की बात की जाय जिन्हें करैक्टर-सर्टिफिकेट देने वाले अव्वल दर्ज़े के करैक्टर-लेस थे।

अंत में अपनी व्यथा-कथा बता दूँ कि इतना गिरने के बावज़ूद मेरे चरित्र ने मुझे एक बार धोखा दे ही दिया। मेरे एक परिचित, जो एक चरित्रवान जवान बेटी का पिता होने की हैसियत रखते थे,  उन्होंने मुझे अपने घर पर निमंत्रित किया। जब मैं उनके साथ उनके घर जा रहा था,  उन्होंने बताया कि उनकी इकलौती पत्नी मुझसे मिलने को विशेष उत्सुक हैं। वे जानना चाहती हैं कि मेरे जैसे निकृष्ट जीव का चरित्र भला कैसा होगा?

चरित्र की छानबीन करने वालों से मुझे हमेशा भय लगता है। मुझे बन्दर और मगर की कहानी याद आ गयी। मैंने कहा, ''अंकल जी ! चरित्र तो मैं जामुन के पेड़ पर ही छोड़ आया ! अब आंटी जी को क्या दिखाऊंगा ?''

वे बोले, ''बरखुरदार, तुमने ठीक ही किया। हमारा घर बहुत छोटा है। उसमे हम मियां-बीबी और बच्ची ही बहुत मुश्किल से रह पाते हैं। चरित्र के लिए इस घर में जगह ही नहीं है।''

***************************************************************************

(व्यंग्य-संग्रह 'लक्ष्मीजी मृत्युलोक में' से )

Monday, September 17, 2012


                                    ***जोशी जी जवान हुए***

 

हमारा मोहल्ला इस देश का प्रतिनिधि मोहल्ला है.हमारे मोहल्ले का इतिहास गवाह है कि यहाँ के लोगों ने तरह-तरह से मोहल्ले का नाम रोशन किया है. टंडन जी के घर पड़ने वाला छापा हो या परसाद जी के घर पर होने वाले नास्तिक व बनावटी भजन-कीर्तन,बहू-बेटियों के सात्विक कारनामे हों या सास- बहुओं की कर्कश यश-गाथाएं,पति-पत्नी के बीच के मधुर द्वंदात्मक सम्बन्ध हों या कुत्तों की नस्ल के साथ मनुष्य के नस्ल की समन्वय-किवदंतियां, हमारा मोहल्ला हमेशा कुख्यात रहा है.इन बातों को लेकर हमारा देश हमारे मोहल्ले पर गर्व कर सकता है.

इस बार मोहल्ले को गौरवान्वित किया है स्वनामधन्य जोशी परिवार ने.वैसे तो मोहल्ले की नाक है जोशी परिवार, पर मोहल्ले के कुछ तथाकथित इतिहासकारों का मत है कि जोशी परिवार को नाक से ज़्यादा 'मोहल्ले के कान' और 'मोहल्ले की ज़ुबान' कहना ज़्यादा सार्थक होगा.ऐसा इसलिए,क्योंकि मोहल्ले में सारी लगाई-बुझाई का ज़िम्मा इस परिवार ने ले रखा है.

 जोशी-दम्पति के बारे में लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं.दोनों की जोड़ी ज़रा हटकर है.दोनों ''नॉट मेड फॉर ईच अदर'' की मिसाल लगते हैं. '' जबरन एक दूसरे के गले मढ़ देना'' कहावत संभवतः इनकी शादी के बाद ही चलन में आई होगी.इस जोड़ी में वैसे तो हर तरह का विरोधाभास नज़र आता है, पर दोनों में उम्र का फ़ासला स्पष्ट दिखता है.या तो जोशी जी की शादी ज़रा देर से हुई और श्रीमती जोशी जल्दी व्याह दी गईं. नतीजा यह हुआ कि श्रीमती जोशी जवानी की दहलीज़ के भीतर रह गईं और जोशी जी जवानी की बाउंडरी पार कर गए. या हो सकता है कि अपवादस्वरूप यह जोशी जी की तीसरी शादी हो. यह भी हो सकता है कि जोशी जी ने अपने बाल धूप में पकाकर सफ़ेद कर लिए हों.

बहरहाल 'आदर्श जोड़ी' की परिभाषा को जोशी-दम्पति पर ख़र्च नहीं किया जा सकता है.ऐसी ही जोड़ियों के लिए हमारे सभ्य समाज में ''अंधे के हाथ बटेर'', ''हूर के गले में लंगूर'' या ''भगवान् बनाई जोड़ी, इक लंगड़ा इक कोढ़ी'' जैसी शाश्वत कहावतें प्रचलित हैं.

पति बूढ़ा दिखे और पत्नी जवान,तो मोहल्ले की खोजी निगाहें उन्हें ताड़ने लगती हैं. उन निगाहों से बचने के लिए जोशी-दम्पति लोगों के सामने आपसी प्यार का प्रदर्शन करते हैं, पर लोग भ्रमित नहीं होते. वे अपना पहरा और कड़ा कर देते हैं. लोग अनुभवी हैं और समझते हैं कि बेमेल जोड़ों में समझौते का बहुत बड़ा योगदान हुआ करता है. यदा-कदा लोगों की गिद्ध-दृष्टियों को श्रीमती जोशी आश्वस्त करती रहती हैं, ''वो क्या है न कि जोशी जी बदल-बदल कर तेल लगाया करते थे न, इसीलिए इनके बाल जल्दी सफ़ेद हो गए.''  जब उनकी सहेलियों की तसल्ली नहीं होती तो श्रीमती जोशी अपना बयान बदल देती हैं,''बहन, इनके परिवार में ही कुछ ऐसा है कि मर्दों के बाल जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं. इनकी वंश-परंपरा ही कुछ ऐसी है!''

 श्रीमती जोशी का यह तर्क ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि हमारे परिवार में मर्दों की मूंछें होती हैं और औरतों की मूछें नहीं होती हैं. हमारी वंश परंपरा ही कुछ ऐसी है!

श्रीमती जोशी अपने पति के सफ़ेद बालों को अपने घटिया तर्कों से ढंकने की भरसक कोशिश करती रहती हैं, पर कोई न कोई बात ऐसी हो ही जाती है जो उन्हें परेशान कर देती है. एक दिन वे अपने पति के साथ बाज़ार जा रही थीं कि उनकी एक नई सहेली ने देख लिया. उस सहेली ने उनके पति जोशी जी को नहीं देखा था. उस सहेली ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया,''सुशीला,तुम्हारे पिताजी आये हुए हैं क्या?''

 ''नहीं तो...'', श्रीमती जोशी ने स्पष्टीकरण दिया. पर सहेली ने ज़ोर दे कर कहा, ''हाँ ,मैंने तो देखा कि तुम उनके साथ मार्केट की तरफ जा रही थी!''

झेंप मिटाते हुए श्रीमती जोशी बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे पति हैं...ऐसा है न डीयर कि उनके बाल ज़रा जल्दी सफ़ेद हो गए हैं...!''  मन ही मन वे अपने पति पर बड़बड़ाईं...' कई बार कहा इस घोंचू को कि खुद को थोडा मेंटेन करे,पर नासपीटा सुनता ही नहीं...! बुड्ढा कहीं का...!'

अभी अपनी सहेली के आघात से श्रीमती जोशी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि किसी और ने पूछ लिया, ''मिसेज जोशी, आपके बड़े भाई आये हुए हैं क्या? मैंने तुम दोनों को साथ-साथ देखा...तुम्हारे तो चेहरे भी मिलते हैं...!'' श्रीमती जोशी मन ही मन कुढ़ते हुए बोलीं, ''नहीं मिसेज वर्मा, वे मेरे पति हैं.''  मिसेज वर्मा ने उन्हें धराशायी करते हुए कहा, ''अरे,नहीं...! ऐसा कैसे हो सकता है? वे तो बड़े बुजुर्ग से दिखते हैं?लगता है आपने खुद को इतनी अच्छी तरह से मेंटेन किया है कि आप उनके सामने बहुत यंग नज़र आती हैं...!''

श्रीमती जोशी ने फिर वही रटा रटाया तर्क देकर मिसेज वर्मा से जान छुड़ाई और मन ही मन उन्होंने अपने पति को फिर कोसा...'यह घटिया पति मेरी इज्ज़त को मिट्टी में मिलाकर ही रहेगा...!'

श्रीमती जोशी समस्या से निबटने के बारे में सोच ही रही थीं कि उनकी मुहफट सहेली ने पूछ लिया, ''क्यों री! तूने बताया नहीं कि तेरे ससुर आये हुए हैं...कल देर शाम देखा मैंने...तेरे घर से निकल रहे थे?'' श्रीमती जोशी बोलीं, ''यार,क्यों मज़ाक कर रही है? तूने उन्हें पहचाना नहीं क्या? अरे वे मिस्टर जोशी रहे होंगे...!''

सहेली बोली, ''अच्छा, पर वे तो बहुत बूढ़े दिखने लगे, यार!'' श्रीमती जोशी ने शरारत से कहा, ''बाल ही तो सफ़ेद हुए हैं उनके.दिल से तो वे जवान हैं!'' सहेली ने उन्हें ज़मीन पर ला पटका, ''दिल की जवानी को तो यार, तू ही जाने, पर ज़रा बाहर से उनकी मरम्मत करवा दे. तू उनके साथ ऐसी लगेगी जैसे दो अलग-अलग पीढियां साथ-साथ चल रही हों!''

श्रीमती जोशी ने मन ही मन सोचा...'इस खूसट पति का कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, वर्ना यह मुझे भी भरी जवानी में बूढ़ा कर देगा...!' उन्हें लगने लगा कि मोहल्ले की हर आंख उन्हें घूर रही है. जैसे उनसे कहना चाहती हों कि उनका पति बूढ़ा है.श्रीमती जोशी ने बहुत सोच विचार किया, अपनी किटी-पार्टी की सहेलियों से विचार विमर्श किया और जोशी जी की नश्वर काया पर जवानी लाने के प्रोजेक्ट पर जुट गईं.

 श्रीमती जोशी ने अपने पति को डांट कर कहा, ''तुम्हारे इन पके बालों ने मेरी नाक काटकर रख दी है.कितनी बार कहा कि इन्हें काले कर लो, पर तुम मेरी सुनते कहाँ हो! कल ही जा कर किसी सैलून में अपने बाल काले करवाओ, समझे? अब बहुत हो गया!''

पति जोशी जी विनम्रतापूर्वक बोले, ''अब इस उम्र में तुम मुझ पर रंग-रोगन करवाओगी? ठीक से सोच लो, भाग्यवान! कहीं ऐसा न हो कि मेरे काले बाल तुम्हारी ज़्यादा नाक कटवाएं?''

 पत्नी-हठ ने जोशी जी के बाल काले करवा दिए. उनकी मूछें भी काली करवा दी गईं. लगे हाथ जोशी जी ने फेसियल भी करवा लिया.जोशी जी ने ख़ुद को आईने में देखा तो अपनी कायाकल्प देखकर बेहोश होते होते बचे. पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल गयी कि जोशी जी जवान हो गए हैं. लगा जैसे पूरा मोहल्ला ही जवान हो गया हो.अब पति-पत्नी बड़ी शान से साथ-साथ घूमते. श्रीमती जोशी पति-प्रदर्शन के चक्कर में कुछ ज़्यादा ही घूमने पर ज़ोर देतीं.

 श्रीमती जोशी को मनचाहे कम्पलीमेंट मिलने लगे. कोई सहेली कहती, ''यार, तेरा पति तो बड़ा क्यूट लगने लगा है. ऐसा लग रहा है जैसे खँडहर में से २५ वर्षीय ईमारत निकल आई हो.''

मिसेज वर्मा ने कहा, ''आप तो छा गईं, मिसेज जोशी.आप ने तो अपने पति का कायाकल्प कर के उन्हें बूढ़े बैल से गबरू सांड़ बना दिया!''

मुंहलगी सहेली बोली, ''तूने तो अपने ऊबड़-खाबड़ पति को एकदम छैल-छबीला रोमांटिक हीरो बना दिया! बड़ा ही यंग दिखने लगा है तेरा पति, यार!''

श्रीमती जोशी को अपने ऊपर गर्व हो आया. आईने में ख़ुद को निहारते हुए उन्होंने मन ही मन सोचा...'एस! आय हैव डन इट!'

अब श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे ज़्यादा क़रीब रहने लगीं. रास्ते में मिल जातीं तो बड़ी देर तक तक उनसे बातें करती रहतीं. जोशी जी अकेले में मिल जाते तो श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे लम्बी गुफ़्तगू करतीं. जब-तब उनकी सहेलियां उनके घर आ धमकतीं और जोशी जी से चिपकने लगतीं. जोशी जी में आकर्षण पैदा हो गया था क्योंकि वे जवान जो हो गए थे.

श्रीमती जोशी के शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह भी किया, ''डीयर, ज़रा जोशी जी पर निगाह रख.वे तेरे हाथ से निकलते जा रहे हैं. तेरी सहेलियां और अन्य महिलाएं उन्हें ज़्यादा तवज़्ज़ो दे रही हैं.''

श्रीमती जोशी ने शुभचिंतकों की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया. वे अपने पति की जवानी को भुना रही थीं. मोहल्ले में उनकी नाक ऊँची हो चुकी थी. उन्होंने अपने आलोचकों को करारा जवाब दे दिया था. पति की असमय जवानी ने उन्हें फिर से मोहल्ले में स्थापित कर दिया था.

सभी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, पर मोहल्ले के एकमात्र पीपल के पेड़ पर जो भूत रहता था, वह बेचैन था. उसकी वक्र-दृष्टि जोशी दम्पति पर पड़ रही थी. वह जोशी दम्पति से बहुत ख़फ़ा था.एकबार जब वह जबरन जोशी जी के घर में घुस गया था तो जोशी जी ने एक तांत्रिक को बुलाकर उसे वापस पीपल पर लटकवा दिया था. तभी से वह भूत बदले की फ़िराक में था.

जोशी जी को जवान देखकर भूत ने ठहाका लगाया...और अगले ही दिन किसी ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया, ''आजकल आपका छोटा भाई आया हुआ है क्या? कल हमने देखा कि वह आपके साथ जा रहा था.''

श्रीमती जोशी इस बार भीतर से ख़ुश होते हुए शरमाते हुए बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे 'वो' हैं. ऐसा है न बहन कि वे अपने रख-रखाव पर ज़रा ज्यादा ध्यान देते हैं.''

 पहली बार उनकी आत्मा ने उन्हें लताड़ा, ''यह क्या हो रहा है, पगली? अरे करमजली,पति को जवान बनाने के चक्कर में तूने यह क्या कर डाला? लोगों को जोशी जी तेरे भाई दिख रहे हैं...तेरी सहेलियां उनके हाथों में तुझसे राखी बंधवा देंगी!''

श्रीमती जोशी अभी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि एक और कानलगी सहेली पूछ बैठी, ''आजकल तेरा देवर आया हुआ है क्या? कल बड़ा सटकर चल रही थी उससे? यार, तेरे तो मज़े हैं!''

श्रीमती जोशी ने बात को सम्हाला, ''नहीं री, वे तो मेरे पति थे. तू तो जानती ही है कि वे अपने को कितना मेंटेन कर के रखते हैं! इसीलिए यंग दिखते हैं!''

उधर पीपल के भूत ने ठहाका लगाया, इधर श्रीमती जोशी की आत्मा ने उन्हें फिर धिक्कारा... 'अपने पैरों पर तू ने मार ली न कुल्हाड़ी? तुझे इतनी भी अकल नहीं कि पति बूढ़ा ही ठीक होता है, पगली!'

श्रीमती जोशी फिर चिंता में डूब गयीं. उन्होंने स्थितियों का जायज़ा लिया तो पाया कि पति उनके हाथों से निकलते जा रहे हैं.अब उनकी सहेलियां जोशी जी के लिए खाद्द्य सामग्री और पकवान भी भिजवाने लगी हैं. उन्होंने चिंतन-मनन किया और सहेलियों की सलाह भी ली.उनकी आत्मा ने भी निर्णय दिया कि चूँकि पति घरमालिक होता है, इसलिए उसका पत्नी से ज़्यादा बूढ़ा होना शास्त्रसम्मत है.

श्रीमती जोशी ने जोशी जी को आदेश दिया, ''तुम्हे बूढ़ा होना होगा, पति देव! तुम्हारे बालों को काला करवाने का खर्च बढ़ने लगा है. घर का महीने का बजट बिगड़ने लगा है. आगे से अब तुम अपने बाल काले नहीं करवाओगे, समझे?''

जोशी जी अभी अभी जवान हुए थे. बाल काले करवाने में चालीस रुपये महीने का खर्च था, पर फ़ायदे बहुत थे. वे हमेशा ललनाओं से घिरे रहते थे. पत्नी भी ज़्यादा डांटती नहीं थी. उन्हें अपनी जवानी में बहुत आनंद आने लगा था.

जोशी जी ने इनकार करते हुए कहा, ''नहीं प्रिये, अब मैं बूढ़ा नहीं होना चाहूँगा. भाग्यवान, मुझे तेरा भाई या देवर होना मंज़ूर है, पर तेरा बाप या ससुर होना मंज़ूर नहीं है!''

***********************************************************************

***श्रवण कुमार उर्मलिया***

 

 

 

 

Friday, July 20, 2012



***पति,पत्नी और वह अर्थात चूहा***

मित्रो,पति होने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि पत्नी साल में एक बार कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती है...मुझे भी मेरी पत्नी अपने कलेजे पर पत्थर रखकर यह ख़ुशी साल में एकबार देती है...उधर पत्नी ट्रेन पर चढ़ती है,और इधर मेरे घर में एक चूहा प्रवेश करता है...फिर लगभग महीने भर तक मैं और चूहा बड़े आराम से साथ-साथ रहते हैं...मैं बाहर से भोजन लाता हूँ,खुद खाता हूँ और चूहे को भी खिलाता हूँ...मैं भी खुश,चूहा भी खुश...इतने सालों के वैवाहिक जीवन में यह बात मेरी समझ में आ गई है कि चूहे के साथ रहना ज़्यादा आसान है...आपका प्रश्न मैं समझ रहा हूँ...आप यही पूछना चाहते हैं न कि पत्नी के रहते चूहा घर में क्यों नहीं आता...तो मैं बता दूँ कि अव्वल तो वह मेरी पत्नी से डरता है,क्योंकि मैं भी डरता हूँ...और दूसरे,पत्नी को घर में पराये मर्द जाति का प्रवेश पसंद नहीं...

चूहा सारे घर में इधर से उधर दौड़ता रहता है जैसे यह उसके ताऊ का घर हो...अपने दांतों की वर्जिश के लिए कभी वह तार कुतरता है,कभी काग़ज़...पत्नी ने जहाँ-जहाँ भी खाने का सामान छुपाया होता है,मुझे चूहे की मदद से ही उसका पता चलता है...मैं और चूहा मिल बाँट के खाते हैं...बस,चूहे की एक ही बात मुझे पसंद नहीं कि वह जगह जगह मल विसर्जन कर देता है...मैं निरंकार भाव से सोचता हूँ तो इसमे चूहे की गलती नज़र नहीं आती...बल्कि वह मुझे बहुत खुद्दार लगता है...एकदम वीतरागी भी...क्या लेकर आया था, क्या लेकर जाऊंगा...! जो कुछ भी है,वह इसी घर का है...

चूहा मेरे लिए अलार्म घडी का काम भी करता है...चाय का समय होते ही मुझे जगा देता है...इसके लिए उसने बड़ा अच्छा तरीका निकाल लिया है...वह अपनी पूंछ को मेरी नाक और कान में घुसेड़ता है...यदि इस पर भी मैं न जगा तो मुझ पर अपना शिवाम्बु छिड़कता है...मैं उठकर चाय बनाता हूँ और उसको बिस्कुट खिलाता हूँ...दरवाज़ा खोलता हूँ तो वह समाचार-पत्र को घसीटता हुआ घर के भीतर ले आता है...मुझे खुश देखकर वह भी खुश रहता है...कभी पैरो पर खड़ा होकर अभिवादन सा करता है,आभार का प्रदर्शन करता है...कभी किलकारियां मारता हुआ इधर से उधर दौड़ता है...मुझे उसमे गज़ब का सामाजिक सरोकार नज़र आता है...वह चालाक भी है...कामवाली आती है तो छुप जाता है..वह जानता है कि कामवाली घरमालकिन से चुगली कर देगी...और मैं परेशानी में पड़ जाऊंगा...

इस बार भी चूहे के साथ बहुत अच्छे दिन बीते...पर नियति से पतियों का सुख कब देखा जाता है...पत्नी मायके से लौटी और आते ही पूछा..''फिर चूहा आया था क्या? ज़रूर आया होगा...तुमने ज़रूर दरवाज़ा खुला छोड़ दिया होगा...मैं तुम्हे जानती हूँ!''...पता नहीं आजकल की पत्नियों को क्या होता जा रहा है...उन्हें पति के चरित्र पर इतना भरोसा नहीं होना चाहिए...चूहे के बारे में जानने से पहले उन्हें इस बात का पता लगाना चाहिए कि उनकी गैरहाजिरी में कोई चुहिया तो नहीं घुस आई थी...मैंने पत्नी से कहा, '' तुम्हारे जाते ही मैंने बोर्ड लगा दिया था कि 'चूहों का प्रवेश यहाँ वर्जित है !'...फिर भला वह कैसे आता...!''...पत्नी को भरोसा नहीं हुआ,और उसने खोजबीन शुरू कर दी...अब बुद्धिहीन चूहे को चाहिए था कि पत्नी के आते ही वह अंतर्ध्यान हो जाता...पर वह पड़ गया लालच में...और एक दिन पत्नी ने उसे देख ही लिया...मेरी शामत आ गयी...वह बड़बड़ाने लगी..'' मैं जानती थी कि चूहा घुसा है...तुम्हारे रहते चूहा न घुसे,यह तो हो नहीं सकता...तुम्हे तो होश ही नहीं रहता..चूहे के साथ तुम्हे क्या मज़ा आता,मेरी समझ में नहीं आता...घर का सब सामन खा गया चूहा...पूरे घर को गन्दा कर रखा है...तुमने उसे भगाया क्यों नहीं?'' मैंने कहा,''मुझे कैसे मालूम होगा कि वह घर में घुसा है...इतना छोटा सा तो होता है...और तुम तो जानती ही हो कि मेरे चश्मे का नंबर भी बदल गया है...पर एक बात तो मानोगी न कि इस बार मैंने घर में बन्दर नहीं घुसने दिया...!'' पत्नी ने ताना मारा, ''बन्दर घुस जाता तो ठीक था,पर चूहा क्यों घुसा?''

दो-चार दिन तक घर में हर ओर चूहा छाया रहा...चूहा...चूहा...और चूहा...मुझे लगा जैसे मैं भी एक चूहा बन गया हूँ और यदि चूहा नहीं मिला तो पत्नी मुझे ही घर से खदेड़ देगी...फिर तलाश शुरू हुई चूहे को पकड़ने के लिए चूहेदानी की...हमारे मोहल्ले में एक ऐतिहासिक चूहेदानी है...बाबा-आदम के ज़माने की...चूहों ने पूरा मुहल्ला कुतर डाला पर चूहेदानी को नहीं कुतर पाए हैं...उसे छिपा भी नहीं पाए हैं...हर बार किसी न किसी के घर में चूहेदानी मिल ही जाती है...इस बार भी मिल गई ...और पत्नी की चालाकी के आगे चूहा विवश हो फंस गया...मैं चूहेदानी में फंसे चूहे को बाहर ले जा रहा था तो उसने बड़ी कातर निगाहों से मुझे देखा...मैंने भी आँखों आँखों में कहा कि यार,मुझे माफ़ करना...मुझे तेरी ज़रूरत तो है,पर पत्नी से मेरी शादी हुई है यार...!

पत्नी को मेरे घर आने पर भी कभी इतनी ख़ुशी नहीं होती,जितनी उसे चूहे के घर से बाहर जाने पर हुई...उसने घर में खीर-पूड़ी बनाई...अब मैं पत्नी के साथ हूँ...लगभग ग्यारह महीनों का साथ...फिर यह मायके जाएगी और मैं चूहे को एक माह का अतिथि बनाऊंगा...एक माह ऐसे प्राणी के साथ रहूँगा जो इंसानों से ज्यादा सामाजिक है...***श्रवण***

***************************************************************************************************************************************************************************************************************************

Saturday, February 11, 2012

फिर वही निर्मोही बसंत...

फिर वही मनभावन बसंत है.मादकता का सन्देश लिए यहाँ-वहां भटकती फिरती फिर वही बासंती हवाएं है.वातावरण में एकबार फिर से चाहत के भौंरे और अनुरागों की तितलियाँ मंडराने लगी हैं.माहौल इतना स्नेहिल हो उठा है कि ह्रदय में उमंगों की सरिता निरंतर प्रवाहित होने लगी है.ऐसे में यह विषपायी मन बसंत की उंगली पकड़ स्नेह की संभावनाएं तलाशने लगा है.

मुसीबत यह है कि फिर एकबार आसन्न संकट की तरह वैलेंटाइन-डे का घटोत्कच सामने खड़ा है.इस प्रीति-दिवस को सेलेब्रेट करने की पीड़ा घनी होती जा रही है.करूँ क्या? मैं तो अपने इस निगोड़े मन के हाथों विवश हूँ.

मैं दुनिया से भले जीत जाऊं पर अपने मन से ही हारा हूँ.अपने इस नामाकूल मन को मैंने कई बार समझाया कि देख रे मन,आज के ज़माने में इतना छिछोरापन ठीक नहीं...मंहगाई का ज़माना है...भरे बसंत में लोग प्याज़ भी नहीं खा पा रहे हैं...ऐसे में तू इतनी सारी प्रेमिका रूपी छिपकलियाँ पाल रहा है...यार! तू तो मेरे इस नश्वर शरीर का दीवाला निकालकर ही दम लेगा!

पर अब यह निखट्टू मन मेरे वश में नहीं रहा. कभी अलका से चिपक लेता है तो कभी गज़ाला से...कभी मारिया से टांका भिड़ा लेता है तो कभी परमिंदर के सौन्दर्य जाल में उलझ लेता है...कमला-विमला,रमोला-पमोला,वनिता-अनिता,शेफाली-रुपाली इत्यादि न जाने कितनी पीड़ाएं इस मन ने पाल रखी हैं.

मेरा लम्पट मन इस मामले में पूरा धर्मनिरपेक्ष है और यथोचित आरक्षण का ख़याल भी रखता है.यदि परिभाषित करना चाहूं तो मुंबई की किसी चाल जैसा ही हो गया है मेरा यह कास्मोपालिटन मन.अपने आप को इसने एक धर्मशाला में तब्दील कर लिया है.या यूँ कहूँ कि इसने ख़ुद को प्रेमिकाओं का एक शरणार्थी-शिविर बना लिया है.

अपने मन को मैं आगाह करता हूँ तो यह मुझे ही डांट देता है,''हे मेरे स्थूल शरीर,तू क्यों इतना परेशान होता है? यदि मैं अपनी क़ाबलियत के बल पर अपने भीतर इतनी प्रेमिकाओं को एकोमोडेट कर लेता हूँ, तो इसमे तेरा क्या जाता है? अरे,तुझे तो गर्व होना चाहिए कि तेरी इस नश्वर काया में मेरे जैसा रसिक मन घुसा हुआ है.''

मेरा लुच्चा मन तो समझने से रहा,इसलिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.उधर नॉटी बसंत अपने पूरे शबाब पर है और ऐसे में मुझे लग रहा है कि ये सुरसामुखी बालाएं मेरी और ताड़का-दृष्टि से निहार रही हैं.ऐसा लगता है जैसे उनके दिलों में वैलेंटाइन-डे के एवज में मुझे लूटने-खसोटने की खिचड़ी पक रही है.

मन के हवामहल के हर छज्जे से एक चपल प्रेमिका टकटकी लगाये निहार रही है.सबकी आँखों में डाकुओं वाली चमक है.सभी ने अपनी लूट-खसोट की योजना को मुझ पर टिका रखा है.खीझकर अपने अधम मन को फिर कोसता हूँ,''अबे मन,तेरी अकल पर तो पाला पड़ गया है! इतनी सारी प्रेमिकाएं पालने से तो अच्छा था कि तू बकरियां पाल लेता! वे किसी काम तो आतीं.ये मुफ़्तखोर प्रेमिकाएं तो एक लाइबिलिटी होती हैं रे,पगले! न काम की न काज की...बस रोज-रोज बर्गर-पिज़ा-चाऊमीन जैसे अनाज की! इतनी सारी प्रेमिकाएं तो मुझे सच में लूट लेंगी,यार...यदि तू अपना और मेरा भला चाहता है तो इस वैलेंटाइन-डे के लिए किसी एक प्रेमिका को चुन ले,भाई!''

मन ने प्रतिवाद किया,''हे मेरे भोंडे शरीर,तू ही बता कि मैं किसे हाँ कहूँ और किसे न कहूँ? मेरे लिए तो सभी एक जैसी झकास हैं! न,मेरे से यह नहीं होने वाला.इसलिए,हे मेरे अधम शरीर,क्योंकि तुझे ज्यादा ही चिंता हो रही है,अतः किसी एक का चुनाव तू ही कर दे.तू जिसे डिसाइड करेगा,मैं उसी के साथ वैलेंटाइन-डे मना लूँगा.''

मैंने सोचा,अपने मन के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ,इसलिए मैंने हाँ कर दी.सर्वप्रथम,मैंने सभी मुफ़्तखोर जानखाऊ और कानखाऊ ललनाओं की एक सूची तैयार की और फिर शार्टलिस्टिंग में जुट गया.

पहले बकबक-कानखाऊ वर्ग को अलग कर उन्हें खंगाला और ठोंका-बजाया तो मुझे लगा की ये नहीं चलेंगी.बक-बक कर कान खाने वाली ये प्रमदाएं अपनी चख-चख से वैलेंटाइन-डे को भी पका देंगी.उस प्रीति भरे माहौल में जब अनुराग भरा मन प्रेममय सन्नाटों और खामोशियों की मधुर आवाज़ सुनना चाहेगा, तो ये कर्कशा बालाएं अपनी पटर-पटर से प्यार-स्नेह की गरिमा को धाराशाई कर देंगी.

अब बारी आयी खाऊ और जेब-हलकी कराऊ श्रेणी की बालाओं की.इन पर गंभीरता से विचार करने पर मुझे लगा कि ये उदर-आश्रित पेटू किस्म की कन्यायें भी नहीं चलेंगी.धरती की बोझ ये बालिकाएं सिर्फ़ अपने पेट की ख़ातिर ज़िंदा हैं.ये तो पैदा ही हुई हैं ताकि धरती का उत्पाद उदरस्थ कर सकें.पवित्र वैलेंटाइन-डे पर भी ये हर तरफ लार टपकाती हुई फिरेंगी.कभी चाट-पकौड़ी तो कभी पानी-पूड़ी...कभी बर्गर-पिज़ा तो कभी इडली-डोसा...कभी रसमलाई तो कभी आइसक्रीम.ऐसी बालाओं का प्यार-स्नेह भी इनके पेट से ही उपजता है.ये भुक्खड़ बालिकाएं प्रीति-पर्व को एक महाभोज में बदल देंगी.इससे खिलाने वाले की जेब पर डाका तो पड़ेगा ही.इसलिए भलाई इसी में है कि इनसे भी दूर ही रहा जाये.

गिफ़्ट-झटकू वर्ग का विश्लेषण किया तो मैं दंग रह गया.इन कामनियों को तो बस उपहार चाहिए...प्यार मिले न मिले पर उपहार ज़रुर मिले.इनके लिए स्नेह के सन्दर्भ गौण हैं, गिफ़्ट के सरोकार प्रमुख हैं.ऐसी प्रेमिकाएं जेबों पर अतिरिक्त भारी पड़ती हैं.उपहारों के एवज में ये प्यार-स्नेह का सौदा करती है...इस हाथ दे,उस हाथ ले.बाबा वैलेंटाइन ने तो ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि प्रीति-पर्व उपहार-झटकू पर्व बन जायेगा.ऐसी षोडशियों से हज़ार बार तौबा.

कुछ कुटिल-खल-कामी प्रियम्वदाओं को निरखा-परखा तो बड़ी निराशा हाथ लगी.आईसक्रीम किसी से खायेंगी और पिक्चर किसी और के साथ देखेंगी.चाट-पकौड़ी का सेवन किसी और के ज़िम्मे और प्यार न्योछावर करेंगी किसी और पर.रसमलाई का बजट किसी और के हिस्से और गले लगेंगी अन्य चपड़गंजुओं के.नहीं,वैलेंटाइन-डे ऐसी कृतघ्न कुमारियों के लिए नहीं है.ये तो प्रीति-पर्व की पवित्रता को भी कलंकित कर देंगी.

इस तरह सर्वगुणसंपन्न तथाकथित प्रेमिकाओं ने मुझे भ्रमित कर डाला.वैलेंटाइन-डे के लिए सुपात्र चुनने के चक्कर में मेरे मन ने मुझे अच्छी-ख़ासी मुसीबत में फंसा दिया था.किसका चुनाव करूँ...कोई क्लियोपेट्रा कि तरह सुन्दर है तो अपने भीतर ज़हर भरे हुए है...'विषरसभरा कनकघट' मुहावरे को चरितार्थ करती हुई.कोई चटोरी है तो कोई छिछोरी.कोई लाज-शर्म से परहेज करने वाली तो कोई नैतिकता को अपने पर्स के कारागार में क़ैद किये हुए.कोई स्वार्थी है तो कोई अत्यधिक आधुनिकता के चलते चरित्र का बोझ नहीं उठा पा रही है.

आखिर मैंने अपने मन को दुत्कारा,''तू बड़ा ही अहमक है,घोंचू! मुझे तो अब तुझ पर शर्म आ रही है.तूने यह कैसी भीड़ जुटा रखी है,यार? मुझे एक भी ऐसी नहीं मिली जिसके साथ तू वैलेंटाइन-डे का स्नेह-पर्व सेलिब्रेट कर सके.''

मेरे मन ने धड़कते हुए कहा,'' मेरे प्यारे शरीर, तुम इसी लिए स्थूल कहलाते हो क्योंकि तुम चीज़ों को ठीक से अनालाईज नहीं कर पाते.तुम्हे भी मेरी प्रेमिकाओं का सिर्फ़ स्थूल शरीर ही दिखता है.अरे,तुम उस सौम्या बेबी को भूल गए? कौन सा गुण है जो उसमे नहीं. मेरे ख्याल से वह मेरी परफेक्ट वैलेंटाइन बन सकती है.ज़रा उसका भी जायज़ा लो,मेरे स्थूल आका!''

मैंने सौम्या नामक प्रियतमा के बायो-डाटा का अध्ययन किया, तो धन्य हो गया.वह हर कोण और दृष्टिकोण से श्रेष्ठ और सुटेबल लगी.सीधी-सादी...छल-कपट रहित...पूर्ण रूप से निस्वार्थ...ढोंग और छलावे से कोसों दूर.समर्पण का ऐसा आलम कि इसके सामने मेरा अवसरवादी मन बेईमान लगे.चरित्र की ऐसी पक्की कि इसकी तुलना में मेरा मन लुच्चों का सरदार लगे.शालीनता का ऐसा रूप जिसके सामने मेरा निगोड़ा मन पक्का गंवार लगे.

सौम्या पर मैं और मेरा मन सहमत हुए तो लगा जैसे बसंत सार्थक हो गया हो.अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाने वाली बसंती बयार मन में आकाँक्षाओं के गाँव बसाने लगी.पूरे वातायन में व्याप्त शीत और ऊष्मा के मिले-जुले रेशे चाहत का इन्द्रधनुष रंगने लगे.साल भर का बैरागी मन अनुराग भरे रंगों से सराबोर होने लगा.सपनों ने पंख पहन लिए और विस्तृत आकाश में स्नेह के सन्दर्भ तलाशने लगे.

जैसे-जैसे वैलेंटाइन-डे करीब आता जा रहा था,मेरे मन में भावनाओं की अंगड़ाईयां बढ़ती जा रही थीं.बसंत ने वातावरण में चारो ओर कामना और चाहत के दूत तैनात कर दिए थे.मन में बढ़ती अंगड़ाईयां तनहाईयों की जनसँख्या में इज़ाफा कर रही थीं.मन को हर तरफ सौम्या बेबी की परछाईयां नज़र आने लगी थीं.

प्रतीक्षा समाप्त हुई.मैंने अपने नश्वर शरीर का गहन प्रक्षालन किया,सुगन्धित लेप लगाया और करीने से बाल काढ़े.बड़ी सफाई से मैंने अपना वेश-विन्यास किया और कपड़ों पर शीला के द्वारा गिफ़्ट किया हुआ स्प्रे छिड़का.इसके बाद मैंने ख़ुद को आईने में निहारा तो ख़ुद पर ही मोहित हो गया.अपने मन से मैंने कहा,''चल डीयर,अब मैं तैयार हूँ.चलकर सौम्या के साथ वैलेंटाइन-डे को सार्थक करते हैं.''

मेरे मन ने बड़े आत्मविश्वास से कहा,''जाना कहाँ,यार?अपनी कुड़ी इत्थे ही आयेगी.बस आती ही होगी.इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा और सही.'' मैं प्रतीक्षा करने लगा.मेरे सामने से समय के सिपाही एक-एक कर गुज़रने लगे.कई बार मैं बाहर तक देख आया.दूर-दूर तक सौम्या का पता न था.बाहर दूसरे जोड़े बाँहों में बाहें डाले हर तरफ डोलने लगे थे.

एक बड़ा काल-खंड हमारे सामने से गुज़र गया पर सौम्या अवतरित नहीं हुई.मेरा वाचाल मन अवाक था.इंतज़ार की सांसें उखड़ने लगी थीं.मन का बसंत पतझड़ के हवाले होने लगा था.मैंने मन को डाँटते हुए पूछा,''क्या हुआ,बे! कहाँ रह गयी सौम्या?तू तो इस सौम्या की बड़ी तारीफ़ें कर रहा था...बड़ी सीधी है,सरल है,बुद्धिमान है,चरित्रवान है...और भी न जाने क्या-क्या! क्या हुआ बे,अभागे?"

इसके पहले की मन कुछ कहता,मैंने अपने बसंत को झुलसते हुए देखा.मेरा पलाशवन धू-धू कर जलने लगा.हवा में पतझड़ के संकेत दिखने लगे.मैंने बालकनी से देखा की सौम्या...हाँ,वही सीधी-सादी चरित्रवान सौम्या दुश्मन की बाँहों में वैलेंटाइन-डे मना रही थी.मुझे लगा जैसे भरे बसंत में मेरी बाहें बाँझ हो गयी हों.

मेरा मन अपनी हीन भावना का प्रदर्शन करते हुए भुनभुनाया,''मेरे स्थूल आका,सब तुम्हारी ग़लती है.इससे तो कोई चटोरी-लुटेरी ही अच्छी थी.कम से कम आज के दिन नसीब तो हो जाती.''

तभी मुस्कराती हुई,इठलाती हुई,बलखाती हुई और अपना पर्स हिलाती हुई कुरूप-व्यक्तित्वा सुदर्शना प्रगट हुई और ठुनकते हुए बोली,''सौम्या तो गई,बच्चे! मैंने कहा था कि ज्यादा चरित्र के पीछे मत भागो! चरित्र ही बचाना होता तो ये वैलेंटाइन-डे हमारे देश में घुसता ही क्यों,बोल बच्चू? अब बोल,मेरे साथ आता है क्या...मेरे साथ वैलेंटाइन-डे सजाता है क्या?या जाऊं? उधर मंकी-चंकी-डंकी सब मेरी राह देख रहे हैं!''

मैंने मन से पूछा,''क्या बोलता तू? यह चल जाएगी? सोच ले...यह कहाँ तक गिरी है,अभी इसका अंदाज़ नहीं लग पाया है!'' मन ने कहा,''यार स्थूल आका,आज के दिन तो तू नैतिकता को ताक पर रख दे! मेरा वैलेंटाइन-डे ख़राब मत कर,भाई!''

अचानक फिर से बसंत जवान हो गया और मेरा मन नैतिकता के जाल से मुक्त हो अपनी कुलटा-कुरूपा वैलेंटाइन में खो गया.
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***