Monday, September 17, 2012


                                    ***जोशी जी जवान हुए***

 

हमारा मोहल्ला इस देश का प्रतिनिधि मोहल्ला है.हमारे मोहल्ले का इतिहास गवाह है कि यहाँ के लोगों ने तरह-तरह से मोहल्ले का नाम रोशन किया है. टंडन जी के घर पड़ने वाला छापा हो या परसाद जी के घर पर होने वाले नास्तिक व बनावटी भजन-कीर्तन,बहू-बेटियों के सात्विक कारनामे हों या सास- बहुओं की कर्कश यश-गाथाएं,पति-पत्नी के बीच के मधुर द्वंदात्मक सम्बन्ध हों या कुत्तों की नस्ल के साथ मनुष्य के नस्ल की समन्वय-किवदंतियां, हमारा मोहल्ला हमेशा कुख्यात रहा है.इन बातों को लेकर हमारा देश हमारे मोहल्ले पर गर्व कर सकता है.

इस बार मोहल्ले को गौरवान्वित किया है स्वनामधन्य जोशी परिवार ने.वैसे तो मोहल्ले की नाक है जोशी परिवार, पर मोहल्ले के कुछ तथाकथित इतिहासकारों का मत है कि जोशी परिवार को नाक से ज़्यादा 'मोहल्ले के कान' और 'मोहल्ले की ज़ुबान' कहना ज़्यादा सार्थक होगा.ऐसा इसलिए,क्योंकि मोहल्ले में सारी लगाई-बुझाई का ज़िम्मा इस परिवार ने ले रखा है.

 जोशी-दम्पति के बारे में लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं.दोनों की जोड़ी ज़रा हटकर है.दोनों ''नॉट मेड फॉर ईच अदर'' की मिसाल लगते हैं. '' जबरन एक दूसरे के गले मढ़ देना'' कहावत संभवतः इनकी शादी के बाद ही चलन में आई होगी.इस जोड़ी में वैसे तो हर तरह का विरोधाभास नज़र आता है, पर दोनों में उम्र का फ़ासला स्पष्ट दिखता है.या तो जोशी जी की शादी ज़रा देर से हुई और श्रीमती जोशी जल्दी व्याह दी गईं. नतीजा यह हुआ कि श्रीमती जोशी जवानी की दहलीज़ के भीतर रह गईं और जोशी जी जवानी की बाउंडरी पार कर गए. या हो सकता है कि अपवादस्वरूप यह जोशी जी की तीसरी शादी हो. यह भी हो सकता है कि जोशी जी ने अपने बाल धूप में पकाकर सफ़ेद कर लिए हों.

बहरहाल 'आदर्श जोड़ी' की परिभाषा को जोशी-दम्पति पर ख़र्च नहीं किया जा सकता है.ऐसी ही जोड़ियों के लिए हमारे सभ्य समाज में ''अंधे के हाथ बटेर'', ''हूर के गले में लंगूर'' या ''भगवान् बनाई जोड़ी, इक लंगड़ा इक कोढ़ी'' जैसी शाश्वत कहावतें प्रचलित हैं.

पति बूढ़ा दिखे और पत्नी जवान,तो मोहल्ले की खोजी निगाहें उन्हें ताड़ने लगती हैं. उन निगाहों से बचने के लिए जोशी-दम्पति लोगों के सामने आपसी प्यार का प्रदर्शन करते हैं, पर लोग भ्रमित नहीं होते. वे अपना पहरा और कड़ा कर देते हैं. लोग अनुभवी हैं और समझते हैं कि बेमेल जोड़ों में समझौते का बहुत बड़ा योगदान हुआ करता है. यदा-कदा लोगों की गिद्ध-दृष्टियों को श्रीमती जोशी आश्वस्त करती रहती हैं, ''वो क्या है न कि जोशी जी बदल-बदल कर तेल लगाया करते थे न, इसीलिए इनके बाल जल्दी सफ़ेद हो गए.''  जब उनकी सहेलियों की तसल्ली नहीं होती तो श्रीमती जोशी अपना बयान बदल देती हैं,''बहन, इनके परिवार में ही कुछ ऐसा है कि मर्दों के बाल जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं. इनकी वंश-परंपरा ही कुछ ऐसी है!''

 श्रीमती जोशी का यह तर्क ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि हमारे परिवार में मर्दों की मूंछें होती हैं और औरतों की मूछें नहीं होती हैं. हमारी वंश परंपरा ही कुछ ऐसी है!

श्रीमती जोशी अपने पति के सफ़ेद बालों को अपने घटिया तर्कों से ढंकने की भरसक कोशिश करती रहती हैं, पर कोई न कोई बात ऐसी हो ही जाती है जो उन्हें परेशान कर देती है. एक दिन वे अपने पति के साथ बाज़ार जा रही थीं कि उनकी एक नई सहेली ने देख लिया. उस सहेली ने उनके पति जोशी जी को नहीं देखा था. उस सहेली ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया,''सुशीला,तुम्हारे पिताजी आये हुए हैं क्या?''

 ''नहीं तो...'', श्रीमती जोशी ने स्पष्टीकरण दिया. पर सहेली ने ज़ोर दे कर कहा, ''हाँ ,मैंने तो देखा कि तुम उनके साथ मार्केट की तरफ जा रही थी!''

झेंप मिटाते हुए श्रीमती जोशी बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे पति हैं...ऐसा है न डीयर कि उनके बाल ज़रा जल्दी सफ़ेद हो गए हैं...!''  मन ही मन वे अपने पति पर बड़बड़ाईं...' कई बार कहा इस घोंचू को कि खुद को थोडा मेंटेन करे,पर नासपीटा सुनता ही नहीं...! बुड्ढा कहीं का...!'

अभी अपनी सहेली के आघात से श्रीमती जोशी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि किसी और ने पूछ लिया, ''मिसेज जोशी, आपके बड़े भाई आये हुए हैं क्या? मैंने तुम दोनों को साथ-साथ देखा...तुम्हारे तो चेहरे भी मिलते हैं...!'' श्रीमती जोशी मन ही मन कुढ़ते हुए बोलीं, ''नहीं मिसेज वर्मा, वे मेरे पति हैं.''  मिसेज वर्मा ने उन्हें धराशायी करते हुए कहा, ''अरे,नहीं...! ऐसा कैसे हो सकता है? वे तो बड़े बुजुर्ग से दिखते हैं?लगता है आपने खुद को इतनी अच्छी तरह से मेंटेन किया है कि आप उनके सामने बहुत यंग नज़र आती हैं...!''

श्रीमती जोशी ने फिर वही रटा रटाया तर्क देकर मिसेज वर्मा से जान छुड़ाई और मन ही मन उन्होंने अपने पति को फिर कोसा...'यह घटिया पति मेरी इज्ज़त को मिट्टी में मिलाकर ही रहेगा...!'

श्रीमती जोशी समस्या से निबटने के बारे में सोच ही रही थीं कि उनकी मुहफट सहेली ने पूछ लिया, ''क्यों री! तूने बताया नहीं कि तेरे ससुर आये हुए हैं...कल देर शाम देखा मैंने...तेरे घर से निकल रहे थे?'' श्रीमती जोशी बोलीं, ''यार,क्यों मज़ाक कर रही है? तूने उन्हें पहचाना नहीं क्या? अरे वे मिस्टर जोशी रहे होंगे...!''

सहेली बोली, ''अच्छा, पर वे तो बहुत बूढ़े दिखने लगे, यार!'' श्रीमती जोशी ने शरारत से कहा, ''बाल ही तो सफ़ेद हुए हैं उनके.दिल से तो वे जवान हैं!'' सहेली ने उन्हें ज़मीन पर ला पटका, ''दिल की जवानी को तो यार, तू ही जाने, पर ज़रा बाहर से उनकी मरम्मत करवा दे. तू उनके साथ ऐसी लगेगी जैसे दो अलग-अलग पीढियां साथ-साथ चल रही हों!''

श्रीमती जोशी ने मन ही मन सोचा...'इस खूसट पति का कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, वर्ना यह मुझे भी भरी जवानी में बूढ़ा कर देगा...!' उन्हें लगने लगा कि मोहल्ले की हर आंख उन्हें घूर रही है. जैसे उनसे कहना चाहती हों कि उनका पति बूढ़ा है.श्रीमती जोशी ने बहुत सोच विचार किया, अपनी किटी-पार्टी की सहेलियों से विचार विमर्श किया और जोशी जी की नश्वर काया पर जवानी लाने के प्रोजेक्ट पर जुट गईं.

 श्रीमती जोशी ने अपने पति को डांट कर कहा, ''तुम्हारे इन पके बालों ने मेरी नाक काटकर रख दी है.कितनी बार कहा कि इन्हें काले कर लो, पर तुम मेरी सुनते कहाँ हो! कल ही जा कर किसी सैलून में अपने बाल काले करवाओ, समझे? अब बहुत हो गया!''

पति जोशी जी विनम्रतापूर्वक बोले, ''अब इस उम्र में तुम मुझ पर रंग-रोगन करवाओगी? ठीक से सोच लो, भाग्यवान! कहीं ऐसा न हो कि मेरे काले बाल तुम्हारी ज़्यादा नाक कटवाएं?''

 पत्नी-हठ ने जोशी जी के बाल काले करवा दिए. उनकी मूछें भी काली करवा दी गईं. लगे हाथ जोशी जी ने फेसियल भी करवा लिया.जोशी जी ने ख़ुद को आईने में देखा तो अपनी कायाकल्प देखकर बेहोश होते होते बचे. पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल गयी कि जोशी जी जवान हो गए हैं. लगा जैसे पूरा मोहल्ला ही जवान हो गया हो.अब पति-पत्नी बड़ी शान से साथ-साथ घूमते. श्रीमती जोशी पति-प्रदर्शन के चक्कर में कुछ ज़्यादा ही घूमने पर ज़ोर देतीं.

 श्रीमती जोशी को मनचाहे कम्पलीमेंट मिलने लगे. कोई सहेली कहती, ''यार, तेरा पति तो बड़ा क्यूट लगने लगा है. ऐसा लग रहा है जैसे खँडहर में से २५ वर्षीय ईमारत निकल आई हो.''

मिसेज वर्मा ने कहा, ''आप तो छा गईं, मिसेज जोशी.आप ने तो अपने पति का कायाकल्प कर के उन्हें बूढ़े बैल से गबरू सांड़ बना दिया!''

मुंहलगी सहेली बोली, ''तूने तो अपने ऊबड़-खाबड़ पति को एकदम छैल-छबीला रोमांटिक हीरो बना दिया! बड़ा ही यंग दिखने लगा है तेरा पति, यार!''

श्रीमती जोशी को अपने ऊपर गर्व हो आया. आईने में ख़ुद को निहारते हुए उन्होंने मन ही मन सोचा...'एस! आय हैव डन इट!'

अब श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे ज़्यादा क़रीब रहने लगीं. रास्ते में मिल जातीं तो बड़ी देर तक तक उनसे बातें करती रहतीं. जोशी जी अकेले में मिल जाते तो श्रीमती जोशी की सहेलियां उनसे लम्बी गुफ़्तगू करतीं. जब-तब उनकी सहेलियां उनके घर आ धमकतीं और जोशी जी से चिपकने लगतीं. जोशी जी में आकर्षण पैदा हो गया था क्योंकि वे जवान जो हो गए थे.

श्रीमती जोशी के शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह भी किया, ''डीयर, ज़रा जोशी जी पर निगाह रख.वे तेरे हाथ से निकलते जा रहे हैं. तेरी सहेलियां और अन्य महिलाएं उन्हें ज़्यादा तवज़्ज़ो दे रही हैं.''

श्रीमती जोशी ने शुभचिंतकों की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया. वे अपने पति की जवानी को भुना रही थीं. मोहल्ले में उनकी नाक ऊँची हो चुकी थी. उन्होंने अपने आलोचकों को करारा जवाब दे दिया था. पति की असमय जवानी ने उन्हें फिर से मोहल्ले में स्थापित कर दिया था.

सभी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, पर मोहल्ले के एकमात्र पीपल के पेड़ पर जो भूत रहता था, वह बेचैन था. उसकी वक्र-दृष्टि जोशी दम्पति पर पड़ रही थी. वह जोशी दम्पति से बहुत ख़फ़ा था.एकबार जब वह जबरन जोशी जी के घर में घुस गया था तो जोशी जी ने एक तांत्रिक को बुलाकर उसे वापस पीपल पर लटकवा दिया था. तभी से वह भूत बदले की फ़िराक में था.

जोशी जी को जवान देखकर भूत ने ठहाका लगाया...और अगले ही दिन किसी ने श्रीमती जोशी से पूछ लिया, ''आजकल आपका छोटा भाई आया हुआ है क्या? कल हमने देखा कि वह आपके साथ जा रहा था.''

श्रीमती जोशी इस बार भीतर से ख़ुश होते हुए शरमाते हुए बोलीं, ''अरे वे? वे तो मेरे 'वो' हैं. ऐसा है न बहन कि वे अपने रख-रखाव पर ज़रा ज्यादा ध्यान देते हैं.''

 पहली बार उनकी आत्मा ने उन्हें लताड़ा, ''यह क्या हो रहा है, पगली? अरे करमजली,पति को जवान बनाने के चक्कर में तूने यह क्या कर डाला? लोगों को जोशी जी तेरे भाई दिख रहे हैं...तेरी सहेलियां उनके हाथों में तुझसे राखी बंधवा देंगी!''

श्रीमती जोशी अभी सम्हल भी नहीं पाई थीं कि एक और कानलगी सहेली पूछ बैठी, ''आजकल तेरा देवर आया हुआ है क्या? कल बड़ा सटकर चल रही थी उससे? यार, तेरे तो मज़े हैं!''

श्रीमती जोशी ने बात को सम्हाला, ''नहीं री, वे तो मेरे पति थे. तू तो जानती ही है कि वे अपने को कितना मेंटेन कर के रखते हैं! इसीलिए यंग दिखते हैं!''

उधर पीपल के भूत ने ठहाका लगाया, इधर श्रीमती जोशी की आत्मा ने उन्हें फिर धिक्कारा... 'अपने पैरों पर तू ने मार ली न कुल्हाड़ी? तुझे इतनी भी अकल नहीं कि पति बूढ़ा ही ठीक होता है, पगली!'

श्रीमती जोशी फिर चिंता में डूब गयीं. उन्होंने स्थितियों का जायज़ा लिया तो पाया कि पति उनके हाथों से निकलते जा रहे हैं.अब उनकी सहेलियां जोशी जी के लिए खाद्द्य सामग्री और पकवान भी भिजवाने लगी हैं. उन्होंने चिंतन-मनन किया और सहेलियों की सलाह भी ली.उनकी आत्मा ने भी निर्णय दिया कि चूँकि पति घरमालिक होता है, इसलिए उसका पत्नी से ज़्यादा बूढ़ा होना शास्त्रसम्मत है.

श्रीमती जोशी ने जोशी जी को आदेश दिया, ''तुम्हे बूढ़ा होना होगा, पति देव! तुम्हारे बालों को काला करवाने का खर्च बढ़ने लगा है. घर का महीने का बजट बिगड़ने लगा है. आगे से अब तुम अपने बाल काले नहीं करवाओगे, समझे?''

जोशी जी अभी अभी जवान हुए थे. बाल काले करवाने में चालीस रुपये महीने का खर्च था, पर फ़ायदे बहुत थे. वे हमेशा ललनाओं से घिरे रहते थे. पत्नी भी ज़्यादा डांटती नहीं थी. उन्हें अपनी जवानी में बहुत आनंद आने लगा था.

जोशी जी ने इनकार करते हुए कहा, ''नहीं प्रिये, अब मैं बूढ़ा नहीं होना चाहूँगा. भाग्यवान, मुझे तेरा भाई या देवर होना मंज़ूर है, पर तेरा बाप या ससुर होना मंज़ूर नहीं है!''

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***श्रवण कुमार उर्मलिया***

 

 

 

 

Friday, July 20, 2012



***पति,पत्नी और वह अर्थात चूहा***

मित्रो,पति होने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि पत्नी साल में एक बार कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती है...मुझे भी मेरी पत्नी अपने कलेजे पर पत्थर रखकर यह ख़ुशी साल में एकबार देती है...उधर पत्नी ट्रेन पर चढ़ती है,और इधर मेरे घर में एक चूहा प्रवेश करता है...फिर लगभग महीने भर तक मैं और चूहा बड़े आराम से साथ-साथ रहते हैं...मैं बाहर से भोजन लाता हूँ,खुद खाता हूँ और चूहे को भी खिलाता हूँ...मैं भी खुश,चूहा भी खुश...इतने सालों के वैवाहिक जीवन में यह बात मेरी समझ में आ गई है कि चूहे के साथ रहना ज़्यादा आसान है...आपका प्रश्न मैं समझ रहा हूँ...आप यही पूछना चाहते हैं न कि पत्नी के रहते चूहा घर में क्यों नहीं आता...तो मैं बता दूँ कि अव्वल तो वह मेरी पत्नी से डरता है,क्योंकि मैं भी डरता हूँ...और दूसरे,पत्नी को घर में पराये मर्द जाति का प्रवेश पसंद नहीं...

चूहा सारे घर में इधर से उधर दौड़ता रहता है जैसे यह उसके ताऊ का घर हो...अपने दांतों की वर्जिश के लिए कभी वह तार कुतरता है,कभी काग़ज़...पत्नी ने जहाँ-जहाँ भी खाने का सामान छुपाया होता है,मुझे चूहे की मदद से ही उसका पता चलता है...मैं और चूहा मिल बाँट के खाते हैं...बस,चूहे की एक ही बात मुझे पसंद नहीं कि वह जगह जगह मल विसर्जन कर देता है...मैं निरंकार भाव से सोचता हूँ तो इसमे चूहे की गलती नज़र नहीं आती...बल्कि वह मुझे बहुत खुद्दार लगता है...एकदम वीतरागी भी...क्या लेकर आया था, क्या लेकर जाऊंगा...! जो कुछ भी है,वह इसी घर का है...

चूहा मेरे लिए अलार्म घडी का काम भी करता है...चाय का समय होते ही मुझे जगा देता है...इसके लिए उसने बड़ा अच्छा तरीका निकाल लिया है...वह अपनी पूंछ को मेरी नाक और कान में घुसेड़ता है...यदि इस पर भी मैं न जगा तो मुझ पर अपना शिवाम्बु छिड़कता है...मैं उठकर चाय बनाता हूँ और उसको बिस्कुट खिलाता हूँ...दरवाज़ा खोलता हूँ तो वह समाचार-पत्र को घसीटता हुआ घर के भीतर ले आता है...मुझे खुश देखकर वह भी खुश रहता है...कभी पैरो पर खड़ा होकर अभिवादन सा करता है,आभार का प्रदर्शन करता है...कभी किलकारियां मारता हुआ इधर से उधर दौड़ता है...मुझे उसमे गज़ब का सामाजिक सरोकार नज़र आता है...वह चालाक भी है...कामवाली आती है तो छुप जाता है..वह जानता है कि कामवाली घरमालकिन से चुगली कर देगी...और मैं परेशानी में पड़ जाऊंगा...

इस बार भी चूहे के साथ बहुत अच्छे दिन बीते...पर नियति से पतियों का सुख कब देखा जाता है...पत्नी मायके से लौटी और आते ही पूछा..''फिर चूहा आया था क्या? ज़रूर आया होगा...तुमने ज़रूर दरवाज़ा खुला छोड़ दिया होगा...मैं तुम्हे जानती हूँ!''...पता नहीं आजकल की पत्नियों को क्या होता जा रहा है...उन्हें पति के चरित्र पर इतना भरोसा नहीं होना चाहिए...चूहे के बारे में जानने से पहले उन्हें इस बात का पता लगाना चाहिए कि उनकी गैरहाजिरी में कोई चुहिया तो नहीं घुस आई थी...मैंने पत्नी से कहा, '' तुम्हारे जाते ही मैंने बोर्ड लगा दिया था कि 'चूहों का प्रवेश यहाँ वर्जित है !'...फिर भला वह कैसे आता...!''...पत्नी को भरोसा नहीं हुआ,और उसने खोजबीन शुरू कर दी...अब बुद्धिहीन चूहे को चाहिए था कि पत्नी के आते ही वह अंतर्ध्यान हो जाता...पर वह पड़ गया लालच में...और एक दिन पत्नी ने उसे देख ही लिया...मेरी शामत आ गयी...वह बड़बड़ाने लगी..'' मैं जानती थी कि चूहा घुसा है...तुम्हारे रहते चूहा न घुसे,यह तो हो नहीं सकता...तुम्हे तो होश ही नहीं रहता..चूहे के साथ तुम्हे क्या मज़ा आता,मेरी समझ में नहीं आता...घर का सब सामन खा गया चूहा...पूरे घर को गन्दा कर रखा है...तुमने उसे भगाया क्यों नहीं?'' मैंने कहा,''मुझे कैसे मालूम होगा कि वह घर में घुसा है...इतना छोटा सा तो होता है...और तुम तो जानती ही हो कि मेरे चश्मे का नंबर भी बदल गया है...पर एक बात तो मानोगी न कि इस बार मैंने घर में बन्दर नहीं घुसने दिया...!'' पत्नी ने ताना मारा, ''बन्दर घुस जाता तो ठीक था,पर चूहा क्यों घुसा?''

दो-चार दिन तक घर में हर ओर चूहा छाया रहा...चूहा...चूहा...और चूहा...मुझे लगा जैसे मैं भी एक चूहा बन गया हूँ और यदि चूहा नहीं मिला तो पत्नी मुझे ही घर से खदेड़ देगी...फिर तलाश शुरू हुई चूहे को पकड़ने के लिए चूहेदानी की...हमारे मोहल्ले में एक ऐतिहासिक चूहेदानी है...बाबा-आदम के ज़माने की...चूहों ने पूरा मुहल्ला कुतर डाला पर चूहेदानी को नहीं कुतर पाए हैं...उसे छिपा भी नहीं पाए हैं...हर बार किसी न किसी के घर में चूहेदानी मिल ही जाती है...इस बार भी मिल गई ...और पत्नी की चालाकी के आगे चूहा विवश हो फंस गया...मैं चूहेदानी में फंसे चूहे को बाहर ले जा रहा था तो उसने बड़ी कातर निगाहों से मुझे देखा...मैंने भी आँखों आँखों में कहा कि यार,मुझे माफ़ करना...मुझे तेरी ज़रूरत तो है,पर पत्नी से मेरी शादी हुई है यार...!

पत्नी को मेरे घर आने पर भी कभी इतनी ख़ुशी नहीं होती,जितनी उसे चूहे के घर से बाहर जाने पर हुई...उसने घर में खीर-पूड़ी बनाई...अब मैं पत्नी के साथ हूँ...लगभग ग्यारह महीनों का साथ...फिर यह मायके जाएगी और मैं चूहे को एक माह का अतिथि बनाऊंगा...एक माह ऐसे प्राणी के साथ रहूँगा जो इंसानों से ज्यादा सामाजिक है...***श्रवण***

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Saturday, February 11, 2012

फिर वही निर्मोही बसंत...

फिर वही मनभावन बसंत है.मादकता का सन्देश लिए यहाँ-वहां भटकती फिरती फिर वही बासंती हवाएं है.वातावरण में एकबार फिर से चाहत के भौंरे और अनुरागों की तितलियाँ मंडराने लगी हैं.माहौल इतना स्नेहिल हो उठा है कि ह्रदय में उमंगों की सरिता निरंतर प्रवाहित होने लगी है.ऐसे में यह विषपायी मन बसंत की उंगली पकड़ स्नेह की संभावनाएं तलाशने लगा है.

मुसीबत यह है कि फिर एकबार आसन्न संकट की तरह वैलेंटाइन-डे का घटोत्कच सामने खड़ा है.इस प्रीति-दिवस को सेलेब्रेट करने की पीड़ा घनी होती जा रही है.करूँ क्या? मैं तो अपने इस निगोड़े मन के हाथों विवश हूँ.

मैं दुनिया से भले जीत जाऊं पर अपने मन से ही हारा हूँ.अपने इस नामाकूल मन को मैंने कई बार समझाया कि देख रे मन,आज के ज़माने में इतना छिछोरापन ठीक नहीं...मंहगाई का ज़माना है...भरे बसंत में लोग प्याज़ भी नहीं खा पा रहे हैं...ऐसे में तू इतनी सारी प्रेमिका रूपी छिपकलियाँ पाल रहा है...यार! तू तो मेरे इस नश्वर शरीर का दीवाला निकालकर ही दम लेगा!

पर अब यह निखट्टू मन मेरे वश में नहीं रहा. कभी अलका से चिपक लेता है तो कभी गज़ाला से...कभी मारिया से टांका भिड़ा लेता है तो कभी परमिंदर के सौन्दर्य जाल में उलझ लेता है...कमला-विमला,रमोला-पमोला,वनिता-अनिता,शेफाली-रुपाली इत्यादि न जाने कितनी पीड़ाएं इस मन ने पाल रखी हैं.

मेरा लम्पट मन इस मामले में पूरा धर्मनिरपेक्ष है और यथोचित आरक्षण का ख़याल भी रखता है.यदि परिभाषित करना चाहूं तो मुंबई की किसी चाल जैसा ही हो गया है मेरा यह कास्मोपालिटन मन.अपने आप को इसने एक धर्मशाला में तब्दील कर लिया है.या यूँ कहूँ कि इसने ख़ुद को प्रेमिकाओं का एक शरणार्थी-शिविर बना लिया है.

अपने मन को मैं आगाह करता हूँ तो यह मुझे ही डांट देता है,''हे मेरे स्थूल शरीर,तू क्यों इतना परेशान होता है? यदि मैं अपनी क़ाबलियत के बल पर अपने भीतर इतनी प्रेमिकाओं को एकोमोडेट कर लेता हूँ, तो इसमे तेरा क्या जाता है? अरे,तुझे तो गर्व होना चाहिए कि तेरी इस नश्वर काया में मेरे जैसा रसिक मन घुसा हुआ है.''

मेरा लुच्चा मन तो समझने से रहा,इसलिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.उधर नॉटी बसंत अपने पूरे शबाब पर है और ऐसे में मुझे लग रहा है कि ये सुरसामुखी बालाएं मेरी और ताड़का-दृष्टि से निहार रही हैं.ऐसा लगता है जैसे उनके दिलों में वैलेंटाइन-डे के एवज में मुझे लूटने-खसोटने की खिचड़ी पक रही है.

मन के हवामहल के हर छज्जे से एक चपल प्रेमिका टकटकी लगाये निहार रही है.सबकी आँखों में डाकुओं वाली चमक है.सभी ने अपनी लूट-खसोट की योजना को मुझ पर टिका रखा है.खीझकर अपने अधम मन को फिर कोसता हूँ,''अबे मन,तेरी अकल पर तो पाला पड़ गया है! इतनी सारी प्रेमिकाएं पालने से तो अच्छा था कि तू बकरियां पाल लेता! वे किसी काम तो आतीं.ये मुफ़्तखोर प्रेमिकाएं तो एक लाइबिलिटी होती हैं रे,पगले! न काम की न काज की...बस रोज-रोज बर्गर-पिज़ा-चाऊमीन जैसे अनाज की! इतनी सारी प्रेमिकाएं तो मुझे सच में लूट लेंगी,यार...यदि तू अपना और मेरा भला चाहता है तो इस वैलेंटाइन-डे के लिए किसी एक प्रेमिका को चुन ले,भाई!''

मन ने प्रतिवाद किया,''हे मेरे भोंडे शरीर,तू ही बता कि मैं किसे हाँ कहूँ और किसे न कहूँ? मेरे लिए तो सभी एक जैसी झकास हैं! न,मेरे से यह नहीं होने वाला.इसलिए,हे मेरे अधम शरीर,क्योंकि तुझे ज्यादा ही चिंता हो रही है,अतः किसी एक का चुनाव तू ही कर दे.तू जिसे डिसाइड करेगा,मैं उसी के साथ वैलेंटाइन-डे मना लूँगा.''

मैंने सोचा,अपने मन के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ,इसलिए मैंने हाँ कर दी.सर्वप्रथम,मैंने सभी मुफ़्तखोर जानखाऊ और कानखाऊ ललनाओं की एक सूची तैयार की और फिर शार्टलिस्टिंग में जुट गया.

पहले बकबक-कानखाऊ वर्ग को अलग कर उन्हें खंगाला और ठोंका-बजाया तो मुझे लगा की ये नहीं चलेंगी.बक-बक कर कान खाने वाली ये प्रमदाएं अपनी चख-चख से वैलेंटाइन-डे को भी पका देंगी.उस प्रीति भरे माहौल में जब अनुराग भरा मन प्रेममय सन्नाटों और खामोशियों की मधुर आवाज़ सुनना चाहेगा, तो ये कर्कशा बालाएं अपनी पटर-पटर से प्यार-स्नेह की गरिमा को धाराशाई कर देंगी.

अब बारी आयी खाऊ और जेब-हलकी कराऊ श्रेणी की बालाओं की.इन पर गंभीरता से विचार करने पर मुझे लगा कि ये उदर-आश्रित पेटू किस्म की कन्यायें भी नहीं चलेंगी.धरती की बोझ ये बालिकाएं सिर्फ़ अपने पेट की ख़ातिर ज़िंदा हैं.ये तो पैदा ही हुई हैं ताकि धरती का उत्पाद उदरस्थ कर सकें.पवित्र वैलेंटाइन-डे पर भी ये हर तरफ लार टपकाती हुई फिरेंगी.कभी चाट-पकौड़ी तो कभी पानी-पूड़ी...कभी बर्गर-पिज़ा तो कभी इडली-डोसा...कभी रसमलाई तो कभी आइसक्रीम.ऐसी बालाओं का प्यार-स्नेह भी इनके पेट से ही उपजता है.ये भुक्खड़ बालिकाएं प्रीति-पर्व को एक महाभोज में बदल देंगी.इससे खिलाने वाले की जेब पर डाका तो पड़ेगा ही.इसलिए भलाई इसी में है कि इनसे भी दूर ही रहा जाये.

गिफ़्ट-झटकू वर्ग का विश्लेषण किया तो मैं दंग रह गया.इन कामनियों को तो बस उपहार चाहिए...प्यार मिले न मिले पर उपहार ज़रुर मिले.इनके लिए स्नेह के सन्दर्भ गौण हैं, गिफ़्ट के सरोकार प्रमुख हैं.ऐसी प्रेमिकाएं जेबों पर अतिरिक्त भारी पड़ती हैं.उपहारों के एवज में ये प्यार-स्नेह का सौदा करती है...इस हाथ दे,उस हाथ ले.बाबा वैलेंटाइन ने तो ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि प्रीति-पर्व उपहार-झटकू पर्व बन जायेगा.ऐसी षोडशियों से हज़ार बार तौबा.

कुछ कुटिल-खल-कामी प्रियम्वदाओं को निरखा-परखा तो बड़ी निराशा हाथ लगी.आईसक्रीम किसी से खायेंगी और पिक्चर किसी और के साथ देखेंगी.चाट-पकौड़ी का सेवन किसी और के ज़िम्मे और प्यार न्योछावर करेंगी किसी और पर.रसमलाई का बजट किसी और के हिस्से और गले लगेंगी अन्य चपड़गंजुओं के.नहीं,वैलेंटाइन-डे ऐसी कृतघ्न कुमारियों के लिए नहीं है.ये तो प्रीति-पर्व की पवित्रता को भी कलंकित कर देंगी.

इस तरह सर्वगुणसंपन्न तथाकथित प्रेमिकाओं ने मुझे भ्रमित कर डाला.वैलेंटाइन-डे के लिए सुपात्र चुनने के चक्कर में मेरे मन ने मुझे अच्छी-ख़ासी मुसीबत में फंसा दिया था.किसका चुनाव करूँ...कोई क्लियोपेट्रा कि तरह सुन्दर है तो अपने भीतर ज़हर भरे हुए है...'विषरसभरा कनकघट' मुहावरे को चरितार्थ करती हुई.कोई चटोरी है तो कोई छिछोरी.कोई लाज-शर्म से परहेज करने वाली तो कोई नैतिकता को अपने पर्स के कारागार में क़ैद किये हुए.कोई स्वार्थी है तो कोई अत्यधिक आधुनिकता के चलते चरित्र का बोझ नहीं उठा पा रही है.

आखिर मैंने अपने मन को दुत्कारा,''तू बड़ा ही अहमक है,घोंचू! मुझे तो अब तुझ पर शर्म आ रही है.तूने यह कैसी भीड़ जुटा रखी है,यार? मुझे एक भी ऐसी नहीं मिली जिसके साथ तू वैलेंटाइन-डे का स्नेह-पर्व सेलिब्रेट कर सके.''

मेरे मन ने धड़कते हुए कहा,'' मेरे प्यारे शरीर, तुम इसी लिए स्थूल कहलाते हो क्योंकि तुम चीज़ों को ठीक से अनालाईज नहीं कर पाते.तुम्हे भी मेरी प्रेमिकाओं का सिर्फ़ स्थूल शरीर ही दिखता है.अरे,तुम उस सौम्या बेबी को भूल गए? कौन सा गुण है जो उसमे नहीं. मेरे ख्याल से वह मेरी परफेक्ट वैलेंटाइन बन सकती है.ज़रा उसका भी जायज़ा लो,मेरे स्थूल आका!''

मैंने सौम्या नामक प्रियतमा के बायो-डाटा का अध्ययन किया, तो धन्य हो गया.वह हर कोण और दृष्टिकोण से श्रेष्ठ और सुटेबल लगी.सीधी-सादी...छल-कपट रहित...पूर्ण रूप से निस्वार्थ...ढोंग और छलावे से कोसों दूर.समर्पण का ऐसा आलम कि इसके सामने मेरा अवसरवादी मन बेईमान लगे.चरित्र की ऐसी पक्की कि इसकी तुलना में मेरा मन लुच्चों का सरदार लगे.शालीनता का ऐसा रूप जिसके सामने मेरा निगोड़ा मन पक्का गंवार लगे.

सौम्या पर मैं और मेरा मन सहमत हुए तो लगा जैसे बसंत सार्थक हो गया हो.अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाने वाली बसंती बयार मन में आकाँक्षाओं के गाँव बसाने लगी.पूरे वातायन में व्याप्त शीत और ऊष्मा के मिले-जुले रेशे चाहत का इन्द्रधनुष रंगने लगे.साल भर का बैरागी मन अनुराग भरे रंगों से सराबोर होने लगा.सपनों ने पंख पहन लिए और विस्तृत आकाश में स्नेह के सन्दर्भ तलाशने लगे.

जैसे-जैसे वैलेंटाइन-डे करीब आता जा रहा था,मेरे मन में भावनाओं की अंगड़ाईयां बढ़ती जा रही थीं.बसंत ने वातावरण में चारो ओर कामना और चाहत के दूत तैनात कर दिए थे.मन में बढ़ती अंगड़ाईयां तनहाईयों की जनसँख्या में इज़ाफा कर रही थीं.मन को हर तरफ सौम्या बेबी की परछाईयां नज़र आने लगी थीं.

प्रतीक्षा समाप्त हुई.मैंने अपने नश्वर शरीर का गहन प्रक्षालन किया,सुगन्धित लेप लगाया और करीने से बाल काढ़े.बड़ी सफाई से मैंने अपना वेश-विन्यास किया और कपड़ों पर शीला के द्वारा गिफ़्ट किया हुआ स्प्रे छिड़का.इसके बाद मैंने ख़ुद को आईने में निहारा तो ख़ुद पर ही मोहित हो गया.अपने मन से मैंने कहा,''चल डीयर,अब मैं तैयार हूँ.चलकर सौम्या के साथ वैलेंटाइन-डे को सार्थक करते हैं.''

मेरे मन ने बड़े आत्मविश्वास से कहा,''जाना कहाँ,यार?अपनी कुड़ी इत्थे ही आयेगी.बस आती ही होगी.इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा और सही.'' मैं प्रतीक्षा करने लगा.मेरे सामने से समय के सिपाही एक-एक कर गुज़रने लगे.कई बार मैं बाहर तक देख आया.दूर-दूर तक सौम्या का पता न था.बाहर दूसरे जोड़े बाँहों में बाहें डाले हर तरफ डोलने लगे थे.

एक बड़ा काल-खंड हमारे सामने से गुज़र गया पर सौम्या अवतरित नहीं हुई.मेरा वाचाल मन अवाक था.इंतज़ार की सांसें उखड़ने लगी थीं.मन का बसंत पतझड़ के हवाले होने लगा था.मैंने मन को डाँटते हुए पूछा,''क्या हुआ,बे! कहाँ रह गयी सौम्या?तू तो इस सौम्या की बड़ी तारीफ़ें कर रहा था...बड़ी सीधी है,सरल है,बुद्धिमान है,चरित्रवान है...और भी न जाने क्या-क्या! क्या हुआ बे,अभागे?"

इसके पहले की मन कुछ कहता,मैंने अपने बसंत को झुलसते हुए देखा.मेरा पलाशवन धू-धू कर जलने लगा.हवा में पतझड़ के संकेत दिखने लगे.मैंने बालकनी से देखा की सौम्या...हाँ,वही सीधी-सादी चरित्रवान सौम्या दुश्मन की बाँहों में वैलेंटाइन-डे मना रही थी.मुझे लगा जैसे भरे बसंत में मेरी बाहें बाँझ हो गयी हों.

मेरा मन अपनी हीन भावना का प्रदर्शन करते हुए भुनभुनाया,''मेरे स्थूल आका,सब तुम्हारी ग़लती है.इससे तो कोई चटोरी-लुटेरी ही अच्छी थी.कम से कम आज के दिन नसीब तो हो जाती.''

तभी मुस्कराती हुई,इठलाती हुई,बलखाती हुई और अपना पर्स हिलाती हुई कुरूप-व्यक्तित्वा सुदर्शना प्रगट हुई और ठुनकते हुए बोली,''सौम्या तो गई,बच्चे! मैंने कहा था कि ज्यादा चरित्र के पीछे मत भागो! चरित्र ही बचाना होता तो ये वैलेंटाइन-डे हमारे देश में घुसता ही क्यों,बोल बच्चू? अब बोल,मेरे साथ आता है क्या...मेरे साथ वैलेंटाइन-डे सजाता है क्या?या जाऊं? उधर मंकी-चंकी-डंकी सब मेरी राह देख रहे हैं!''

मैंने मन से पूछा,''क्या बोलता तू? यह चल जाएगी? सोच ले...यह कहाँ तक गिरी है,अभी इसका अंदाज़ नहीं लग पाया है!'' मन ने कहा,''यार स्थूल आका,आज के दिन तो तू नैतिकता को ताक पर रख दे! मेरा वैलेंटाइन-डे ख़राब मत कर,भाई!''

अचानक फिर से बसंत जवान हो गया और मेरा मन नैतिकता के जाल से मुक्त हो अपनी कुलटा-कुरूपा वैलेंटाइन में खो गया.
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

फिर वही निर्मोही बसंत

फिर वही मनभावन बसंत है.मादकता का सन्देश लिए यहाँ-वहां भटकती फिरती फिर वही बासंती हवाएं है.वातावरण में एकबार फिर से चाहत के भौंरे और अनुरागों की तितलियाँ मंडराने लगी हैं.माहौल इतना स्नेहिल हो उठा है कि ह्रदय में उमंगों की सरिता निरंतर प्रवाहित होने लगी है.ऐसे में यह विषपायी मन बसंत की उंगली पकड़ स्नेह की संभावनाएं तलाशने लगा है.

मुसीबत यह है कि फिर एकबार आसन्न संकट की तरह वैलेंटाइन-डे का घटोत्कच सामने खड़ा है.इस प्रीति-दिवस को सेलेब्रेट करने कि पीड़ा घनी होती जा रही है.करूँ क्या? मैं तो अपने इस निगोड़े मन के हाथों विवश हूँ.

मैं दुनिया से भले जीत जाऊं पर अपने मन से ही हारा हूँ.अपने इस नामाकूल मन को मैंने कई बार समझाया कि देख रे मन,आज के ज़माने में इतना छिछोरापन ठीक नहीं...मंहगाई का ज़माना है...भरे बसंत में लोग प्याज़ भी नहीं खा पा रहे हैं...ऐसे में तू इतनी सारी प्रेमिका रूपी छिपकलियाँ पाल रहा है...यार! तू तो मेरे इस नश्वर शरीर का दीवाला निकालकर ही दम लेगा!

पर अब यह निखट्टू मन मेरे वश में नहीं रहा. कभी अलका से चिपक लेता है तो कभी गज़ाला से...कभी मरिया से टांका भिड़ा लेता है तो कभी परमिंदर के सौन्दर्य जाल में उलझ लेता है...कमला-विमला,रमोला-पमोला,वनिता-अनिता,शेफाली-रुपाली इत्यादि न जाने कितनी पीड़ाएं इस मन ने पाल रखी हैं.

मेरा लम्पट मन इस मामले में पूरा धर्मनिरपेक्ष है और यथोचित आरक्षण का ख़याल भी रखता है.यदि परिभाषित करना चाहूं तो मुंबई की किसी चाल जैसा ही हो गया है मेरा यह कास्मोपालिटन मन.अपने आप को इसने एक धर्मशाला में तब्दील कर लिया है.या यूँ कहूँ कि इसने ख़ुद को प्रेमिकाओं का एक शरणार्थी-शिविर बना लिया है.

अपने मन को मैं आगाह करता हूँ तो यह मुझे ही डांट देता है,''हे मेरे स्थूल शरीर,तू क्यों इतना परेशान होता है? यदि मैं अपनी क़ाबलियत के बल पर अपने भीतर इतनी प्रेमिकाओं को एकोमोडेट कर लेता हूँ, तो इसमे तेरा क्या जाता है? अरे,तुझे तो गर्व होना चाहिए कि तेरी इस नश्वर काया में मेरे जैसा रसिक मन घुसा हुआ है.''

मेरा लुच्चा मन तो समझने से रहा,इसलिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.उधर नॉटी बसंत अपने पूरे शबाब पर है और ऐसे में मुझे लग रहा है कि ये सुरसामुखी बालाएं मेरी और तड़का-दृष्टि से निहार रही हैं.ऐसा लगता है जैसे उनके दिलों में वैलेंटाइन-डे के एवज में मुझे लूटने-खसोटने की खिचड़ी पक रही है.

मन के हवामहल के हर छज्जे से एक चपल प्रेमिका टकटकी लगाये निहार रही है.सबकी आँखों में डाकुओं वाली चमक है.सभी ने अपनी लूट-खसोट की योजना को मुझ पर टिका रखा है.खीझकर अपने अधम मन को फिर कोसता हूँ,''अबे मन,तेरी अकल पर तो पाला पड़ गया है! इतनी सारी प्रेमिकाएं पालने से तो अच्छा था कि तू बकरियां पाल लेता! वे किसी काम तो आतीं.ये मुफ़्तखोर प्रेमिकाएं तो एक लाइबिलिटी होती हैं रे,पगले! न काम की न काज की...बस रोज-रोज बर्गर-पिज़ा-चाऊमीन जैसे अनाज की! इतनी सारी तो मुझे सच में लूट लेंगी,यार...यदि तू अपना और मेरा भला चाहता है तो इस वैलेंटाइन-डे के लिए किसी एक प्रेमिका को चुन ले,भाई!''


मन ने प्रतिवाद किया,''हे मेरे भोंडे शरीर,तू ही बता कि मैं किसे हाँ कहूँ और किसे न कहूँ? मेरे लिए तो सभी एक जैसी झकास हैं! न,मेरे से यह नहीं होने वाला.इसलिए,हे मेरे अधम शरीर,क्योंकि तुझे ज्यादा ही चिंता हो रही है,अतः किसी एक का चुनाव तू ही कर दे.तू जिसे डिसाइड करेगा,मैं उसी के साथ वैलेंटाइन-डे मन लूँगा.''

मैंने सोचा,अपने मन के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ,इसलिए मैंने हाँ कर दी.सर्वप्रथम,मैंने सभी मुफ़्तखोर जानखाऊ और कानखाऊ ललनाओं कि एक सूची तैयार की और फिर शार्टलिस्टिंग में जुट गया.

पहले बकबक-कानखाऊ वर्ग को अलग कर उन्हें खंगाला और ठोंका-बजाय तो मुझे लगा की ये नहीं चलेंगी.बक-बक कर कान खाने वाली ये प्रमदाएं अपनी चख-चख से वैलेंटाइन-डे को भी पका देंगी.उस प्रीति भरे माहौल में जब अनुराग भरा मन प्रेममय सन्नाटों और खामोशियों की मधुर आवाज़ सुनना चाहेगा, तो ये कर्कशा बालाएं अपनी पटर-पटर से प्यार-स्नेह की गरिमा को धाराशाई कर देंगी.

अब बारी आयी खाऊ और जेब-हलकी कराऊ श्रेणी की बालाओं की.इन पर गंभीरता से विचार करने पर मुझे लगा कि ये उदर-आश्रित पेटू किस्म की कन्यायें भी नहीं चलेंगी.धरती की बोझ ये बालिकाएं सिर्फ़ अपने पेट की ख़ातिर ज़िंदा हैं.ये तो पैदा ही हुई हैं ताकि धरती का उत्पाद उदरस्थ कर सकें.पवित्र वैलेंटाइन-डे पर भी ये हर तरफ लार टपकाती हुई फिरेंगी.कभी चाट-पकौड़ी तो कभी पानी-पूड़ी...कभी बर्गर-पिज़ा तो कभी इडली-डोसा...कभी रसमलाई तो कभी आइसक्रीम.ऐसी बालाओं का प्यार-स्नेह भी इनके पेट से ही उपजता है.ये भुक्खड़ बालिकाएं प्रीति-पर्व को एक महाभोज में बदल देंगी.इससे खिलाने वाले की जेब पर डाका तो पड़ेगा ही.इसलिए भलाई इसी में है कि इनसे भी दूर ही रहा जाये.

गिफ़्ट-झटकू वर्ग का विश्लेषण किया तो मैं दंग रह गया.इन कामनियों को तो बस उपहार चाहिए...प्यार मिले न मिले पर उपहार ज़रुर मिले.इनके लिए स्नेह के सन्दर्भ गौण हैं, गिफ़्ट के सरोकार प्रमुख हैं.ऐसी प्रेमिकाएं जेबों पर अतिरिक्त भारी पड़ती हैं.उपहारों के एवज में ये प्यार-स्नेह का सौदा करती है...इस हाथ दे,उस हाथ ले.बाबा वैलेंटाइन ने तो ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि प्रीति-पर्व उपहार-झटकू पर्व बन जायेगा.ऐसी षोडशियों से हज़ार बार तौबा.

कुछ कुटिल-खल-कामी प्रियम्वदाओं को निरखा-परखा तो बड़ी निराशा हाथ लगी.आईसक्रीम किसी से खायेंगी और पिक्चर किसी और के साथ देखेंगी.चाट-पकौड़ी का सेवन किसी और के ज़िम्मे और प्यार न्योछावर करेंगी किसी और पर.रसमलाई का बजट किसी और के हिस्से और गले लगेंगी अन्य चपड़गंजुओं के.नहीं,वैलेंटाइन-डे ऐसी कृतघ्न कुमारियों के लिए नहीं है.ये तो प्रीति-पर्व कि पवित्रता को भी कलंकित कर देंगी.

इस तरह सर्वगुणसंपन्न तथाकथित प्रेमिकाओं ने मुझे भ्रमित कर डाला.वैलेंटाइन-डे के लिए सुपात्र चुनने के चक्कर में मेरे मन ने मुझे अच्छी-ख़ासी मुसीबत में फंसा दिया था.किसका चुनाव करूँ...कोई क्लियोपेट्रा कि तरह सुन्दर है तो अपने भीतर ज़हर भरे हुए है...'विषरसभरा कनकघट' मुहावरे को चरितार्थ करती हुई.कोई चटोरी है तो कोई छिछोरी.कोई लाज-शर्म से परहेज करने वाली तो कोई नैतिकता को अपने पर्स के कारागार में क़ैद किये हुए.कोई स्वार्थी है तो कोई अत्यधिक आधुनिकता के चलते चरित्र का बोझ नहीं उठा पा रही है.

आखिर मैंने अपने मन को दुत्कारा,''तू बड़ा ही अहमक है,घोंचू! मुझे तो अब तुझ पर शर्म आ रही है.तूने यह कैसी भीड़ जुटा रखी है,यार? मुझे एक भी ऐसी नहीं मिली जिसके साथ तू वैलेंटाइन-डे का स्नेह-पर्व सेलिब्रेट कर सके.''

मेरे मन ने धड़कते हुए कहा,'' मेरे प्यारे शरीर, तुम इसी लिए स्थूल कहलाते हो क्योंकि तुम चीज़ों को ठीक से अनालाईज नहीं कर पाते.तुम्हे भी मेरी प्रेमिकाओं का सिर्फ़ स्थूल शरीर ही दिखता है.अरे,तुम उस सौम्या बेबी को भूल गए? कौन सा गुण है जो उसमे नहीं. मेरे ख्याल से वह मेरी परफेक्ट वैलेंटाइन बन सकती है.ज़रा उसका भी जायज़ा लो,मेरे स्थूल आका!''

मैंने सौम्या नामक प्रियतमा के बायो-डाटा का अध्ययन किया, तोधन्य हो गया.वह हर कोण और दृष्टिकोण से श्रेष्ठ और सुटेबल लगी.सीधी-सादी...छल-कपट रहित...पूर्ण रूप से निस्वार्थ...ढोंग और छलावे से कोसों दूर.समर्पण का ऐसा आलम कि इसके सामने मेरा अवसरवादी मन बेईमान लगे.चरित्र की ऐसी पक्की कि इसकी तुलना में मेरा मन लुच्चों का सरदार लगे.शालीनता का ऐसा रूप जिसके सामने मेरा निगोड़ा मन पक्का गंवार लगे.

सौम्या पर मैं और मेरा मन सहमत हुए तो लगा जैसे बसंत सार्थक हो गया हो.अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाने वाली बसंती बयार मन में आकाँक्षाओं के गाँव बसाने लगी.पूरे वातायन में व्याप्त शीत और ऊष्मा के मिले-जुले रेशे चाहत का इन्द्रधनुष रंगने लगे.साल भर का बैरागी मन अनुराग भरे रंगों से सराबोर होने लगा.सपनों ने पंख पहन लिए और विस्तृत आकाश में स्नेह के सन्दर्भ तलाशने लगे.

जैसे-जैसे वैलेंटाइन-डे करीब आता जा रहा था,मेरे मन में भावनाओं की अंगड़ाईयां बढ़ती जा रही थीं.बसंत ने वातावरण में चारो ओर कामना और चाहत के दूत तैनात कर दिए थे.मन में बढ़ती अंगड़ाईयां तनहाईयों की जनसँख्या में इज़ाफा कर रही थीं.मन को हर तरफ सौम्या बेबी की परछाईयां नज़र आने लगी थीं.

प्रतीक्षा समाप्त हुई.मैंने अपने नश्वर शरीर का गहन प्रक्षालन किया,सुगन्धित लेप लगाया और करीने से बाल काढ़े.बड़ी सफाई से मैंने अपना वेश-विन्यास किया और कपड़ों पर शीला के द्वारा गिफ़्ट किया हुआ स्प्रे छिड़का.इसके बाद मैंने ख़ुद को आईने में निहारा तो ख़ुद पर ही मोहित हो गया.अपने मन से मैंने कहा,''चल डीयर,अब मैं तैयार हूँ.चलकर सौम्या के साथ वैलेंटाइन-डे को सार्थक करते हैं.''

मेरे मन ने बड़े आत्मविश्वास से कहा,''जाना कहाँ,यार?अपनी कुड़ी इत्थे ही आयेगी.बस आती ही होगी.इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा और सही.'' मैं प्रतीक्षा करने लगा.मेरे सामने से समय के सिपाही एक-एक कर गुज़रने लगे.कई बार मैं बाहर तक देख आया.दूर-दूर तक सौम्या का पता न था.बाहर दूसरे जोड़े बाँहों में बाहें डाले हर तरफ डोलने लगे थे.

एक बड़ा काल-खंड हमारे सामने से गुज़र गया पर सौम्या अवतरित नहीं हुई.मेरा वाचाल मन अवाक था.इंतज़ार की सांसें उखड़ने लगी थीं.मन का बसंत पतझड़ के हवाले होने लगा था.मैंने मन को डाँटते हुए पूछा,''क्या हुआ,बे! कहाँ रह गयी सौम्या?तू तो इस सौम्या की बड़ी तारीफ़ें कर रहा था...बड़ी सीधी है,सरल है,बुद्धिमान है,चरित्रवान है...और भी न जाने क्या-क्या! क्या हुआ बे,अभागे?"

इसके पहले की मन कुछ कहता,मैंने अपने बसंत को झुलसते हुए देखा.मेरा पलाशवन धू-धू कर जलने लगा.हवा में पतझड़ के संकेत दिखने लगे.मैंने बालकनी से देखा की सौम्य...हाँ,वही सीधी-सादी चरित्रवान सौम्या दुश्मन की बाँहों में वैलेंटाइन-डे मना रही थी.मुझे लगा जैसे भरे बसंत में मेरी बाहें बाँझ हो गयी हों.

मेरे मन अपनी हीन भावना का प्रदर्शन करते हुए भुनभुनाया,''मेरे स्थूल आका,सब तुम्हारी ग़लती है.इससे तो कोई चटोरी-लुटेरी ही अच्छी थी.कम से कम आज के दिन नसीब तो हो जाती.''

तभी मुस्कराती हुई,इठलाती हुई,बलखाती हुई और अपना पर्स हिलाती हुई कुरूप-व्यक्तित्वा सुदर्शना प्रगट हुई और ठुनकते हुए बोली,''सौम्या तो गई,बच्चे! मैंने कहा था कि ज्यादा चरित्र के पीछे मत भागो! चरित्र ही बचाना होता तो ये वैलेंटाइन-डे हमारे देश में घुसता ही क्यों,बोल बच्चू? अब बोल,मेरे साथ आता है क्या...मेरे साथ वैलेंटाइन-डे सजाता है क्या?या जाऊं? उधर मंकी-चंकी-डंकी सब मेरी राह देख रहे हैं!''

मैंने मन से पूछा,''क्या बोलता तू? यह चल जाएगी? सोच ले...यह कहाँ तक गिरी है,अभी इसका अंदाज़ नहीं लग पाया है!'' मन ने कहा,''यार स्थूल आका,आज के दिन तो तू नैतिकता को ताक पर रख दे! मेरा वैलेंटाइन-डे ख़राब मत कर,भाई!''

अचानक फिर से बसंत जवान हो गया और मेरा मन नैतिकता के जाल से मुक्त हो अपनी कुलटा-कुरूपा वैलेंटाइन में खो गया.
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Friday, June 17, 2011

छपास और पारिश्रमिक की जुगलबंदी

इस असार संसार में प्रतिभावान मनुष्यों के लिए असंख्य क्षेत्र है.जैसे की डाक्टर बनकर बीमारियों को भुनाया जा सकता है या इंजीनियर बनकर किसी अंतहीन सरकारी परियोजना में बहता पैसा खींचा जा सकता है.यदि मरीजों और देश के सौभाग्य से डाक्टर या इंजिनीयर न बन पाए,तो कम से कम वकील बनकर कानून और संविधान का दोहन तो किया ही जा सकता है.पर यदि इनमे से कोई कुछ भी न बन पाए तो ऐसी विभूतियों के लिए तुलसी दस जी पहले ही कह गए हैं :-''सकल पदारथ हैं जग माहीं,करमहीन नर पावत नाहीं''.

मैं अपने को करमहीन मानकर,अपनी इस काया को धरती का बोझ बनाये हुए निश्चिंत था.मैं अपनी तसल्ली के लिए दास मलूका की ये पंक्तियाँ दिन में एकाध बार गुनगुना लिया करता था :-''अजगर करे न चाकरी,पंछी करें न काम,दास मलूका कह गए,सबके दाता राम!'' पर मैं क्या जानूं कि ''होइहैं वही जो राम रचि राखा!'' इसलिए न जाने किस मनहूस घड़ी में,मेरी इस जन्म-जन्मान्तरों से अतृप्त और अभिशप्त आत्मा में लेखन रूपी महामारी के कीटाणु प्रवेश कर गए.मेरी आत्मा जो है,वह लेखन के कलंक से कलुषित हो गयी.

इस नाचीज़ कि लाइफ में न कोई ट्रेजिडी रही न कामेडी;न कहीं कोई कुंठा या संत्रास और न ही कोई प्यार-व्यार का चक्कर!मेरी सीधी-सादी ज़िंदगी में न कोई घुटन थी न कोई पीड़ा;न कोई सन्नाटा या अकेलापन!यहाँ तक कि किसी लेखक का डोनेट किया हुआ खून भी मेरे इस नश्वर शरीर में कभी नहीं चढ़ाया गया.फिर भी न जाने कैसे लेखन के निष्ठुर और निर्मोही कीटाणु मेरे भीटर घुसपैठ कर गए.

ज्यों-ज्यों इन कीटाणुओं कि हरकतें बढ़ती गयीं,मैं लेखन रूपी बेताल को अपनी आत्मा के कन्धों पर ढोने लगा. मेरे लेखन कि शुरुआत भी श्रृंगार-रस की कविताओं से हुई.अकाद बार ज्यादा श्रृंगार-रस के चक्कर में जब पिटने की नौबत आई,तो मन में विरह-बोध जागा.और विरह-बोध के बाद तो मैं साहित्य के सभी रस-भेद-रूपी बंदरों को सफल मदारी की तरह नचाने लगा.होते-हवाते मेरे भीतर का लेखक साहित्य की उन ऊँचाइयों को छूने लगा,जहाँ कवि की बदजात आत्मा वीर-रस में विरह-गीत और वीभत्स-रस में प्रेम-गीत का सृजन करने लगती है!

मुझे चारो और कविता के मंच ही मंच नज़र आने लगे.किसी मंच पर मैं निराला जी के कान(क्षमा याचना सहित) काट लेता,और किसी मंच पर अपना कविता-पढ़ कर पन्त जी की(क्षमा याचना सहित) नाक कुतर लेता.मेरी औघड़ प्रतिभा को देखकर एक संपादक नामक निकृष्ट जीव मेरे साहित्यिक जीवन में प्रविष्ट होते भये.

उन संपादक का अखबार छोटा था इसलिए सुविधाजनक था.क्योंकि छोटे अख़बारों में संपादन,कम्पोजिंग,प्रूफ-रीडिंग और छपाई से लेकर अखबार बांटने तक का सारा काम एक ही आदमी करता है.ऐसे अखबारों के संपादक बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं.

मेरे विधाता संपादक ने मुझसे कहा,''बरखुरदार,कविता के क्षेत्र में तो तुम अब स्थापित हो ही गए हो,इसलिए कहानियों पर जोर-आजमाइश करो !'' उनकी सलाह मानकर मैं कहानियां लिखने लगा.अब उनका कमाल देखिये कि वे इतनी खूबी से मेरी कहानियों की काट-छांट करते कि बेचारी कहानियां व्यंग्य में बदल जातीं.मुझे हैरान-परेशान देखकर वे मुझसे प्रायः कहते,''बरखुरदार,कहानी-वहानी तुम्हारे वश कि बात नहीं!तुम तो व्यंग्य लिखो,व्यंग्य!तुम्हारे भीतर मैं व्यंग्य-लेखन की जन्मजात प्रतिभा देखता हूँ!दूसरों को गाली देना और हर मामले में अपनी नाक घुसेड़ना ,ये इस देश में सबसे बड़ी प्रतिभाएं हैं!बस,देखते जाओ!हरिशंकर परसाई(क्षमा याचना सहित) के ऊपर उठने के पहले ही मैंने तुम्हे ऊपर न उठा दिया,तो कहना!''

अपनी छपास की तृप्ति होते देख मैं भी व्यंग्य में उसी तरह घुसने लगा जैसे अरहर के खेत में भैंसा घुसता है. धीरे-धीरे यह साबित होने लगा कि मैं सच्चे अर्थों में भारतीय हूँ. क्योंकि दूसरों कि छीछालेदर एवं दह-संस्कार में मुझे आत्मिक सुख मिलने लगा.मेरे संपादक संतुष्ट नज़र आये और बोले,''बहुत खूब,बरखुरदार!तुम तो पूरे शहर में काले मेघों की तरह छाते जा रहे हो! बस,समझ लो कि देश के सारे व्यंग्यकार अब गए तेल लेने!''

मेरा प्रशंसा-लोलुप क्षुद्र मन द्रुत गति से वक्री होकर हवा में उड़ने लगा.पर अपने इस अधम शरीर में स्थित,तीन ताल में निबद्ध,इस आत्मा का मैं क्या करता?यह बेचारी निरंतर दुखी रहने लगी,ठीक उस सास की तरह,जो अपनी बहू को अपनी नाक के नीचे फलता-फूलता हुआ देखकर दुखी रहती है.एक दिन मैंने अपनी आत्मा से प्रश्न किया,''अरी पगली,आत्मा!अपने क्लेश का कारण मुझसे कह तो जरा?भगवद्गीता के अनुसार तो तू नश्वर है.न तो अग्नि तुझे जला सकती है न शस्त्र तुझे छेद सकते हैं.तेरे तो मज़े ही मज़े हैं फिर इस दुःख का प्रयोजन क्या है?''

मेरी आत्मा मुझे धिक्कारते हुए बोली,''तेरे जैसे मूर्ख के शरीर में किराये का मकान लेने के तो दुःख ही अनंत हैं!अरे,नराधम,छपास की तृप्ति से ही तो पेट नहीं भरता न?साथ में पारिश्रमिक का गुड़ भी तो चाहिए!देखता नहीं,वह नरपिशाच संपादक किस तरह से तेरी रचनाओं को भुना रहा है.तू भी उससे पारिश्रमिक मांग,बुद्धू!''

आत्मा की प्रेरणा ले मैं संपादक के पास पहुंचा.मुझे देखते ही वे चहक पड़े,''वाह भाई,वाह!अपने पिछले व्यंग्य में क्या खूब करारी चोट की है तुमने!पूरा पुलिस-महकमा सन्न है!छा गए, बरखुरदार,तुम अब छा गए!साहित्याकाश अब तुम्हारे विचरण के लिए खुला हुआ है!''

मेरी आत्मा ने नेपथ्य से मेरा हौसला बढ़ाया कि मूर्ख,इसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में मत आ!अपना पारिश्रमिक मांग,पारिश्रमिक!अपने फेफड़ों में मैंने हवा भरकर कहा,''संपादक महोदय,मेरी छपास पर बड़ी तेजी से पारिश्रमिक हावी हो रहा है!मेरी आत्मा चाहती है कि मुझे पारिश्रमिक भी मिले!और चूँकि धन मिलने का मामला है,इसलिए अपनी आत्मा की बात न मानना मुझे शोभा नहीं देता!''

संपादक ने तुरंत रंग बदला,''यार,तुम्हारे घर पर अख़बार की मुफ्त प्रति भिजवा तो रहे हैं!वैसे भी इधर तुमने पुलिस-महकमे पर ज्यादा व्यंग्य लिखे हैं,जिससे शहर की पुलिस तेज़ी से इमानदार हो रही है.इसकी वज़ह से शहर में चोरी और राहजनी की घटनाएं कम होने लगी हैं!तुम समझते क्यों नहीं की इससे हमारी न्यूज़-आइटमें घटने लगी हैं!''

विना विचलित हुए मैंने कहा,''महोदय,यदि मेरा व्यक्तिगत मामला होता,तो कोई और बात थी!पर सवाल मेरी आत्मा का है!मैं उसके मामले में दखल नहीं दे सकता!पारिश्रमिक तो मुझे जरुर चाहिए,चाहे आप रोकर दें या गाकर!समझे?''

संपादक व्यंग्य से मुस्कराए,''ठीक है,बंधू!जब पारिश्रमिक के बदले तुम अपनी आत्मा को गिरवी रखना ही चाहते हो,तो मैं क्या करूँ?पर एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा,बरखुरदार!तुम्हारे व्यंग्य क़ाबिले-तारीफ़ तो हो गए हैं,पर क़ाबिले-पारिश्रमिक नहीं हुए हैं अभी!इसलिए अपने व्यंग्यों में ज़रा और पैनापन लाओ!ज़रा और नुकीला बनाओ अपने व्यंग्यों को!समझे,बरखुरदार?''

मैं कुछ दिनों तक पशोपेश में रहा.ऐसा क्या करूँ की व्यंग्यों में अतिरिक्त नुकीलापन आए?मैंने अपनी दुविधा आत्मा को बताई,तो आत्मा बोली,''अरे,उल्लू के चरखे,वह संपादक तुझे उल्लू बना रहा है!रे खल-कामी,इतना तो समझ कि इस देश के भेजों में नुकीली सुई चुभाना व्यर्थ है!इन भेजों के लिए तो वज़नदार हथौड़े चाहिए!फिर भी तू कोशिश कर के देख!निखालिस गालियां लिख,गालियां!अपने देश की देशी और स्थापित गालियां!जितनी पैनी गालियां,उतना ही व्यंग्य में पैनापन!''

मैं फिर आत्मा की बात मान हर भाषा और हर तहजीव की गालियां अपने व्यंग्यों में फिट करने लगा.अगली बार मिलते ही संपादक ने गले लगा लिया,''तुमने तो कमाल कर दिया,यार!क्या खींचा है सभी को!यत्र-तत्र-सर्वत्र सभी क्षत-विक्षत होकर तिलमिला रहे हैं!अब तो तुम सुपर व्यंग्यकार हो गए,बरखुरदार!''

मैंने धीरे से पूछा,''तो क्या अब मेरे व्यंग्य क़ाबिले-पारिश्रमिक हो गए हैं?'संपादक जी का जैसे अचानक फ्यूज उड़ गया.वे बोले,''बरखुरदार,तुम्हारी इतनी तारीफ़ें,इतना नाम,फिर भी तुम पारिश्रमिक जैसी तुच्छ चीज़ के पीछे पड़े हो!अरे अभी तो राजनीतिक पुट आया ही नहीं तुम्हारे व्यंग्यों में!बिना इसके भी कोई व्यंग्यकार कभी पूर्ण माना जा सकता है भला!इसलिए जाओ और अपने व्यंग्यों को थोडा पालिटिकल बनाओ!''

मैं परेशान होकर फिर आत्मा की शरण में गया.आत्मा ने समझाया,''घबरा मत,निशाचर!पहले जमकर सत्ता-पक्ष के खिलाफ लिख!वे मारने-पीटने आयें,तो उनसे कुछ ले-देकर विपक्ष को भ्रष्टाचारी साबित कर! यही तो इस देश में राजनीतिक व्यंग्य कहलाता है,पगले!''

मैं एकबार फिर अपनी कलम लेकर सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पिल पड़ा.कमीशन के हिसाब से मैं दोनों पक्षों के बीच पेंडुलम बन गया.संपादक इस बार मिलते ही सीधे मेरे पैरों पर गिरकर बोले,''बरखुरदार,तुम तो गुरु निकले!मुझे अपने चरणों की रज ले ही लेने दो!अब,तो बस समझ लो कि स्थापित हो गए तुम!''

मेरी आत्मा ने मुझे उत्साहित किया,''अबे लपड़बोंग,तू पारिश्रमिक मांग!संपादक कि चापलूसी को भाड़ में जाने दे!''मैंने संपादक की धूर्त आँखों में ऑंखें डालकर कहा,''तो अब तो पारिश्रमिक मिलेगा न मुझे?''

संपादक तिलमिला गए,''इतना बड़ा संपादक तुम्हारे पैरों की धूल अपने माथे से लगा रहा है!इससे बड़ा पारिश्रमिक और तुम्हे क्या चाहिए,बरखुरदार?''

मेरी आत्मा ने मुझे ललकारा,''बेटा,आज तू सारे लाज के बंधन तोड़ दे और इस संपादक के हलक़ से पारिश्रमिक उगलवा ले!आज अपना सारा दब्बूपन,सारे संस्कार,सारी सभ्यता और सारा आक्रोश अपने भीतर से निकालकर पटक दे इस संपादक पर!''मैं अपने व्यंग्यों से भी ज्यादा नुकीला बनकर चीख़ा,''संपादक के बच्चे,मुझे पारिश्रमिक चाहिए,समझे?वर्ना अपने व्यंग्यों का पैनापन आज तेरे भीतर घुसेड़ न दिया,तो कहना!''

संपादक आहिस्ता से उठे.फिर उन्होंने अपने माथे पर लगी मेरी चरण-रज को झाडा.फिर इत्मीनान से बोले,''बरखुरदार,यदि पारिश्रमिक ही देना होता,तो इस शहर में क्या तुम्ही एक लेखक हो?एक से बढ़कर एक लेखक मेरे अखबार में लिखने के लिए तरस रहे हैं! तुम्हारे घटिया व्यंग्यों ने तो मेरे अख़बार का स्तर ही चौपट कर दिया है!हुंह!ऊपर से पारिश्रमिक भी दूँ,है न?अरे,तुम्हारे जैसे लोभी लेखकों ने ही साहित्य को बदनाम कर राखा है!"

मुझे हतप्रभ छोड़ संपादक चले गए.मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा और गुनगुनाता रहा :''वो देखो मुझसे रूठकर,मेरा पारिश्रमिक जा रहा है!''

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Sunday, June 12, 2011

तलाश एक अदद वल्दियत की

वर्षा-ऋतु की भीनी भीनी फुहारों का आनंद लेने वाले भारतमाता की सभी वल्दियतविहीन संतानों को मेरा शत शत नमन.प्यारे भारतवासियो,तुम क्या जानो की यह बात कहते हुए मैं कितनी पीड़ा और दीनभावना से भरा
हुआ हूँ. कमबख्त बारिश ने कदम रखते ही एक अजीब उलझन मेरे गले में डाल दी! मेरा ह्रदय घनघोर विषाद से भर गया है. यदि यह मेरा व्यक्तिगत दर्द होता तो मैं कदापि विचलित नहीं होता.पर समस्या तो भारतमाता की समूची संतानों की है.इसलिए मेरा दुःख असीम और असहनीय है.

कहानी यह है की मेरे मोहल्ले में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पागल रहता है(किस मोहल्ले में पागल नहीं रहते!).वह नैसर्गिक प्रतिभा वाला और तन-मन-धन सेपागलहै.पागलपन के सभी स्थापित मापदंडों के
अनुसार वह उत्कृष्टतम है.मेरे साथ उस पागल की ज़रा ज्यदा ही छनती है(और भला किससे छनेगी मेरी!).कल रात उसने अचानक मुझे घेर लिया और ठहाका लगाकर बोला-''हम सब भारतवासी अपनी भारतमाता की संतानें हैं कि नहीं?जल्दी बताओ-हैं कि नहीं?'' उससे पीछा छुड़ाने के लिए मैं बोला-''इसमें तो कोई शक नहीं कि हम सब भारतमाता कि संतानें हैं!''

पागल ने इस बार और एक घातक ठहाका लगाया और अपनी ऑंखें मटकाते हुए बोला-''तो अब बताओ बच्चू कि इन संतानों का बाप कौन है?मेरा बाप कौन है?तुम्हारा बाप कौन है?हम सब भारतवासियों का बाप कौन है?जल्दी बताओ?बोलते क्यों नहीं?'' मैंने किसी तरह पागल से पीछा तो छुड़ा लिया,पर उसका यक्ष-प्रश्न क़र्ज़ उगाहने वाले की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है.हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं की हम सब भारतमाता की संतानें हैं.जब माता है तो बाप भी होना ही चाहिए.पर बाप आखिर है कहाँ?चाचा नेहरू ने भी जेल के भीतर 'भारत एक खोज' के चिंतन-मनन-लेखन में सारा समय बर्बाद कर दिया.उन्होंने भी भारतवासियों की वल्दियत तलाशने की कोशिश नहीं की.हो सकता है,उन्होंने सोचा हो कि राष्ट्रपिता तो हैं ही,बापू कि संतानों को वल्दियत कि क्या जरुरत!

अब समझ में आया न भारतवासियो कि मैंने तुम सभी को वल्दियत-विहीन कहकर क्यों संबोधित किया है.अब कहाँ जाकर तलाश करूं सभी कि वल्दियत को?सभी मुझे बिना बाप की संतानें नज़र
आ रहे हैं और मेरी हीन भावना को बढ़ा रहें हैं.मेरा मन जब बहुत भारी हो गया तो मैं अपने एक डाक्टर मित्र के पास जा पहुंचा.मेरे इस मित्र ने डाक्टर बनने के बाद ऐसी ख्याति अर्जित की है कि इसके
इलाज़ाधीन मरीजों को मरने के लिए ज्यदा परिश्रम और इंतजार नहीं करना पड़ता है.

यूँ तो यह मेरे बचपन का दोस्त है.पर चूँकि इसके पिताश्री धर्मपरिवर्तन के सहारे 'फादर' की नस्ल में आ गए थे,इसलिए इसने सुविधाओं का बहुत दुरूपयोग किया है.सरकार से वजीफ़ा लेते समय यह अनुसूचित बन जाता था.शेष अवसरों पर इसे और इसके परिवार को सलीब और ताबूत के फायदे होते रहते थे.इसे आसानी से मेडिकल में दाखिला मिल गया और डाक्टर बनते ही यह मरीजों को सलीबों पर टांगने लगा.मैं इसके क्लीनिक में पंहुंचा तो देखा की वह अपने क्लीनिक के सामने फैले हुए कब्रिस्तान को बड़ी हसरत भरी नज़रों से निहार रहा था.मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोला-''यार,कुछ भी कहो,इन अंग्रेजों को रहने का सलीका आता था! देखो न,कितना ख़ूबसूरत कब्रिस्तान है यह!और जब मैं यहाँ के गाँव-बस्तियों को देखता हूँ तो मुझे उबकाई आती है.व्हाट अ डर्टी पीपल,यार!''

उसकी बातें सुनकर मैं और भी ज्यादा पीड़ित हो गया.इसे अंग्रेजों के बनवाए कब्रिस्तान ख़ूबसूरत लगते हैं.ऐसा लगना स्वाभाविक भी है,क्योंकि इसने अपने पेशे को कब्रिस्तान से जो जोड़ रखा
है.अंग्रेजियत ही इसकी वल्दियत है.मैंने अपने इस मित्र को भारी मन से बधाई दी-''यार,डाक्टर,तू भाग्यवान है की तुझे वल्दियत मिल गयी.पर अभी मुझे बाकि लोगों की वल्दियत तलाश करनी है,इसलिए चलूँ.''

अपने एक चिड़ीमार एक दोस्त को अपनी परेशानी बताई तो वह मुझ पर दंगों की तरह भड़क उठा-''ददुआ,तेरे साथ यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है!तू चट से भारतमाता की सभी संतानों की फ़िक़र में लग जाता है!अरे,आज के ज़माने में अपनी सोच,अपनी!जाकर पहले अपनी बपौती ढूंढ़,समझा?इस देश में सभी ने अपना अपना एक अदद बाप ढूंढ़ रखा है.और इस तरह बाप-बेटे का हर जोड़ा भारतमईया को तरह तरह से नोंच-खसोट रहा है.तू भी बाप तलाश कर बहती गंगा में हाथ धो.''

मैं रात अपने घर लौट रहा था कि एक अँधेरे कोने में एक पढ़े-लिखे सज्जन ने मुझे छुरा दिखाते हुए आदेश दिया-''निकल बे,क्या है तेरे पास?जल्दी कर!''मैंने दयनीय मुद्रा बनाकर कहा-''भाई,मुझे माफ़ करना.तेरी सेवा में अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.अभी तो मेरा एक अदद बाप भी तैयार नहीं हुआ है.मैं बहुत ही निर्धन हूँ,मेरे दोस्त.पर तूने तो अपना बाप तलाश ही लिया होगा,तभी तो अँधेरे में छुरा चमका रहा है.है न?''

मेरी स्थिति पर अफ़सोस जताते हुए वह बोला-''अरे! राम! राम!! बाप का न होना बहुत तकलीफ़देह बात है.अपुन ने तो यहाँ के थानेदार को अपना बाप बना रखा है और चैन से चोरी कर रहा हूँ.तू भी उन्ही कि शरण में चला जा.जो जाकी सरनन गहे,ताहि ताहि कि लाज!'' मैं सीधे थानेदार उद्दंड सिंह जी के पास जाकर शरणागत होता भया-''साहिबजी,मैं आपको अपना बाप बनाने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहता हूँ.कई दुखी वल्दियत-विहीन असामाजिक तत्व आपकी छत्र-छाया में चैन कि बंसी बजा रहे हैं.मुझे भी आप अपनी शरण में ले लीजिये?''

वे थानेदाराना लहजे में स्नेहपूर्वक बोले-''ठीक है,ठीक है!ज्यादा पट-पट करने का नईं,क्या?पहले बता,तुझे चोरी-वोरी,लूटमार वगैरह का कोई अनुभव है कि नहीं?कुछ पुराना एक्सपीरिएंस,कोई पुराना रिकार्ड?''मैं उनके चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए बोला-''सब कुछ सीख लूँगा,माई-बाप!बस,आपका आशीर्वाद चाहिए!सर पर किसी बाप का साया न हो तो बड़ा दुःख होता है,सर जी!''

उद्दंड सिंह जी बोले-''क्यों बे,हमने कोई टरेनिंग सकूल खोल रखा है क्या?हम नौसीखियों के बाप नहीं बनते.क्या समझा?तू थ्रू प्रापर-चैनेल आदरणीय गृहमंत्री के पास चला जा.वे हम सब पुलिसवालों के आदरणीय बाप हैं.शायद वे तुझे शरण दे दें.''

मैं डी.एम्. के थ्रू गृहमंत्री आदरणीय जामवंत जी के पास पहुंचा.वे शर्म से अपने घुटनों में अपना सर छिपाए बैठे थे.एकपाद होकर मैंने उनकी स्तुति कि-''माननीय,आप मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं!सच्चा,सस्ता और टिकाऊ बाप बनने के सभी गुण आपमें मौजूद हैं.अस्तु आप स्वयं को मेरा बाप घोषित कर मुझे अनुगृहीत करें,आर्य?नहीं तो मेरा जीवन,बस समझिये कि गया तेल लेने.''

जामवंत जी उदासी भरे स्वरों में बोले-''वत्स,यहाँ तो खुद मेरी बपौती ख़तरे में पड़ गयी है.विरोधियों ने मेरे बेटे के होटल में छापा मरवाकर उसमे होने वाला कैबरे बंद करवा दिया है!माननीय मुख्यमंत्री जी बहुत नाराज़ हैं.वे कह रहे थे कि जब वे इस स्थान का दौरा करेंगे,तो कैबरे कहाँ देखेंगे.अब तुम्ही कहो,वत्स,जिसकी ख़ुद कि लुटिया डूब रही हो,वह तुम्हारा पूजनीय बाप कैसे बन सकता है?''मैंने पूछा-''तो आप कुछ तो रह सुझाइए?कहें तो मैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पास चला जाऊं?''

वे गंभीर होकर बोले-''नहीं वत्स,वे भी अपना कोई पंगा सुलझाने महाराजधानी की और गए है.तात,इस देश में राष्ट्रपिता नहीं रहे,'बापू' नाम विलीन हो गया और महात्मा शब्द भी खो गया.पर ''गाँधी'' अभी जिन्दा हैं.सभी इस वल्दियत को ढो रहे हैं.सत्ता-पक्ष वाले चरणामृत लेते हैं और विपक्ष वाले उनका पिंडदान करने पर उतारू हैं.इसलिए तू भी यहीं कहीं कोई लोकल बाप तलाश ले.ज्यादा ऊँची महत्वाकांक्षा अच्छी नहीं होती,वत्स!''

जामवंत जी की सलाह मानकर अभी मैं लोकल सर्वे कर ही रहा था कि विपक्ष वालों ने मुझे घेरकर धमकाया-''हमने सुना है कि तुम सत्ता-पक्ष में अपना बाप तलाशते फिर रहे हो?बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हरक़त है यह!और क्या हम बेवकूफ़ है जो सत्ता-पक्ष की बपौती ख़त्म करने पर तुले हुए हैं?याद रक्खो,यदि अगले दो दिनों के भीतर तुमने हमें अपना बाप नहीं बनाया,तो हम तुम्हे
ऐसा बना देंगे कि तुम बाप रखने लायक ही न रहो!''

भय के मरे मैं विपक्ष कि शरण में जाने कि सोच ही रहा था कि सत्ता-धारी आए और धमका गए-''बरखुरदार,हम तुम पर बराबर नज़र रखे हुए हैं!यदि तुम हमारे विरोधियों के बहकावे में आए,तो हम तुम्हारी नाक में दम कर देंगे!''

तो इस तरह,हे मेरे प्यारे देशवासियो,मैं एक नयी झंझट में फँस गया हूँ.इस देश में तो मुझे वल्दियत की कोई समस्या ही नज़र नहीं आती.सभी के अपने अपने बाप हैं;अपनी अपनी बपौती है.कोई भी मुझे वल्दियतविहीन नहीं लगता.बुरा हो उस साले पागल दोस्त का,जिसने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया.

अभी हल ही में फिर मिला था वह पागल दोस्त.मुझे देखते ही चहककर बोला-''वाह भाई वाह,खोज लिया तूने भारत मां की संतानों का बाप?आखिर नहीं मिला न?हुंह!चला था बाप खोजने!अपने को बहुत होशियार समझता है,है न?अरे,मैं तो सालों से एक अदद बाप की आस लगाये बैठा हूँ!जब मुझे अभी तक नहीं मिला,तो तुझ जैसे पागल को कैसे मिल जायेगा इतनी जल्दी बाप,बोल?अब बोल,असली पागल कौन,तू कि मैं?''

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Monday, May 30, 2011

वसंत-गाथा

मौसमों के पंछी निरंतर उड़ते रहते हैं और समय बीतता रहता है.कुछ मौसम बेहद शालीन होते हैं जो इत्मीनान से हमारे ऊपर से गुजर जाते हैं.पर यह जो नासपीटा वसंत है,यह हमारे ऊपर से इतना धीरे-धीरे गुजरता है,जैसे पंद्रह टन का बोझ लादे कोई ट्रक गुज़र रहा हो हमारे ऊपर से.

तन-मन में एक अजीब-सी टीस जगाता हुआ आता है वसंत.वासंती बयार जब अपनी तर्जनी से हमारे कपोलों को सहलाती है,तो समूचा वातावरण इस क़दर रोमांटिक हो उठता है कि यदि शुद्ध साहित्यिक भाषा में कहा जाये,तो अपने-अपने हिस्से कि गधी भी परी नज़र आने लगती है.भाईयो,यह अतिशयोक्ति नहीं है.गधी में परी कि संभावनाएं खोजना एक अनूठे किस्म का सौंदर्य-बोध है.वसंत ही इस सौंदर्य-बोध का विटामिन है.

सचमुच की परियां तो परी-कथाओं में ही होती हैं.चंद्रमुखी और मृगलोचनी भी केशवदास जी के ज़माने में हुआ करती थीं जो उन्हें 'बाबा' कहकर चिढ़ाया करती थीं.आधुनिक काल में परियों की दो ही प्रजातियाँ बच रही हैं : मां-रूपा परी और बेटी-रूपा परी.हमारे भीतर प्रवेश कर वसंत हमें आवारा किस्म के छैला का रूप दे देता है,और हम इन परियों का पीछा करने लगते हैं.मज़े ले-लेकर ये परियां आपस में चुहल करती हैं और एक दुसरे से कहती हैं,"जानती है,संध्या डीयर,आजकल वसंत चौबीसों घंटे मेरे पीछे पड़ा रहता है ! सच्ची यार,बड़ा ही क्यूट है ! और परसों तो मैंने उसे डांट ही दिया कि क्यों गधों कि तरह मेरे पीछे पड़े रहते हो !''

हो गया न सारा सौंदर्य-बोध चौपट ! जब इन परियों को हम गधे नज़र आते हैं तो हम तो गए काम से.हम सहनशीलता ओढ़े गधी को परी समझ रहे हैं और परियां इस क़दर अहसान-फ़रामोश कि वे हमें गधे की श्रेणी में रख रही हैं.खैर,सौंदर्य-बोध की यह सुविधा सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो बंधनों की बंदिशों से मुक्त हैं.शादी के बाद जब पत्नी-बोध होता है तो सारा सौंदर्य-बोध भाग खड़ा होता है.और इस खुशनुमा,मनभावन एवं चिरप्रतीक्षित वसंत में बस एक ही बोध बच रहता है : इन्कम-टैक्स रूपी सुरसा के मुंह का फैलता आकार,सभी कुछ निगल जाने को बेताब !

काली और घनी बदलियों के बीच से धीरे-धीरे निकलता हुआ भरा-पूरा चाँद कितना सुखदायक लगता है.पर वसंत के क्षितिज पर धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ इन्कम-टैक्स का गंजा चाँद ज्यों-ज्यों बढ़ता है;यह विषपायी मन डूबने लगता है.अपने आंचल में इन्कम-टैक्स की पीड़ा छिपाए रहता है यह वसंत.ऐसे में गुलमोहर और अमलतास भी मुसीबतों के दरख़्त बन जाते हैं जो दर्द के फूल लुटाने लगते हैं.

लगभग परंपरा ही बन गयी है कि मार्च का हरजाई महीना;मधुर छंदों से पूर्ण मनोहारी वसंत के बाद ही आता है.और दरख्तों से पत्ते धीरे-धीरे झड़ना शुरू हो जाते हैं.कवि-ह्रदय पति,पत्नी से कहता है,"सुप्रिये,वसंत अपनी अंगनाई में चहलकदमी कर रहा है ! मेरा फागुन मन तुम्हे देखकर बौराने लगा है,क्योंकि तुम्हारा महुआ-तन वनकन्या का श्रृंगार ओढ़े हुए है.पर बच्चों कि पढ़ाई सर पर है.परीक्षा-फीस के मेंढक टर्राने लगे है.और वह देखो,आंगन के नीम कि कुछ पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं !''

देश में शिक्षा का स्तर इतना उर्ध्व-गमन कर चुका है कि साल भर में इतने दिन कक्षाएं नहीं लगतीं,जितनी बार फ़ीस देनी पड़ती है.शिक्षण-संस्थाओं का स्तर सुधर रहा है,मास्टर-मास्टरनियां अपनी हैसियत सुधार रही हैं.छात्र-छात्राएं ज्ञान में कम,परीक्षा पास करने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं.

बच्चों कि फ़ीस से फारिग होकर पति का कवि-मन कहता है,''हे प्राण-सुधे,हमारा सपना कि इस निर्मोही शहर में 'एक बंगला बने न्यारा' अब साकार हो गया है.अपने इस नीड़ में हम तोता-मैना कि तरह खुश हैं.अपना घर खरीदकर हमने मकान-मालिकों के नखरों को दुलत्ती मार दी है.पर नगर-निगम कि मांदों से चीते निकालने ही वाले हैं,ताकि हाउस-टैक्स के नाखूनों से हमें क्षत-विक्षत कर सकें ! सारा वसंत ही लहू-लुहान होने वाला है,प्रिये !''

'होम,माय स्वीट होम !' मुहावरा विदेशों से आयात किया हुआ लगता है.यहाँ तो टैक्स भरने के बाद मन सोचता है कि काश ! यह मुआ मकान अपना न होता ! करें क्या,वसंत को तो धीरे-धीरे पतझड़ के हाथों रेहन होना ही है.

कुछ निश्चिन्त होकर पति की कोमल आत्मा कहती है,''हे रस-माधुरी,घर में रोशनी का जश्न देखता हूँ,तो तुम्हारी झील-सी गहरी आँखों में एक साथ कई-कई दीपक जल उठते हैं.पर शहर के रोशनी के ठेकेदार नींद से जागने ही वाले हैं.कहीं ऐसा न हो कि बिजली के बिलों में घुसे हुए चूहे हमारा कनेक्शन काट दें !''

इस मौसम में यदि किसी को फांसी का सम्मन मिल जाये तो वह जरा भी नहीं घबराएगा.पर बिजली का बिल देखकर आत्मा चीख़ उठती है.रोशनी का भर ढोता हुआ हर व्यथित मन वसंत कि जगह पतझड़ का बोझ ढोने लगता है अपने कन्धों पर.

अभी भी पेड़ों पर कुछ पत्तियां शेष हैं.पति अपनी पत्नी को पुचकारता है,''हे सहभागिनी,माना कि सारा साल तूने पास के हैण्ड-पम्प से बाल्टियाँ भर-भर कर तीसरी मंजिल तक चढ़ाया है,और तुझे भीगी साड़ी में देखकर मेरा चंचल मन कई-कई बार झरने-झरने हुआ है.पर कारपोरशन का पानी का बिल तो अछे-अच्छों को पानी पिला देता है.वह देखो,अब नीम के पेड़ पर कुछ ही पत्तियां रह गयी हैं.यदि पानी का बिल नहीं दिया,तो हे प्राणबल्लभे,बरसात में हम नल से गन्दगी,कीचड और केंचुओं का आनंद कैसे लेंगे ?''

सिसीफस कि तरह जब किसी तरह हम पत्थर को पहाड़ के ऊपर तक ले जाते हैं,तभी रास्ता रोक लेता है इनकम-टैक्स का तिलिस्म.जितनी आय है उससे कही ज्यादा व्यय.पर गनीमत है कि आय पर ही टैक्स लगता है.व्यय पर तो मंहगाई का टैक्स है ही ! इनकम-टैक्स के बाद सिसीफस के हाथों से फिसलकर पत्थर फिर लुढ़ककर नीचे आ जाता है.वसंत धराशायी हो जाता है और पतझड़ की बेटियां एकदम जवान नज़र आने लगती हैं.

आकंठ परिस्थितियों में डूबा पति-मन उद्गार प्रकट करता है,"हे सौंदर्य-विहीने,देखो अब नीम की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं.मैं भी अब नंगे ठूंठ की तरह दिखने लगा हूँ.अहा ! पलाश-वन अब दहकने लगे हैं !काश,हमारे वसंत में आग लगाने वाले खलनायकों का मुंह भी किंशुक-कुसुम की तरह झुलस जाता तो कितना अच्छा होता !''

प्रसाशन सजग है.ऐसे नाजुक समय में मुग़ल-गार्डेन खोल दिया जाता है ताकि जले पर नमक छिड़का जा सके.जनता की छाती पर जितने तरह के टैक्स,उससे भी ज्यादा किस्मों के दिलफरेब रंग-बिरंगे फूल.सर पर मंडराते कर्जों की याद दिलाते हरजाई फव्वारे.किसी विधवा का श्रृंगार भी क्या इतना ख़ूबसूरत होता होगा?

इसलिए,माय डीयर वसंत,अब न तेरा आना अच्छा लगता है न तेरा जाना.तुझे बुरा मानना है तो मान ले.पद्माकर महाशय को हर तरफ वसंत-ऋतु में हरियाली दिखलाई पड़ती थी.यदि उन्हें इनकम-टैक्स देना पड़ता न,तो उन्हें मालूम पड़ता की यह 'बनन और बागन में' बसंत नहीं बगरो है बल्कि चहुँओर पतझड़ ही पतझड़ पसरो है !

@@@सर्वाधिकार सुरक्षित@@@ (श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)